Iran US Embassy Hostage Crisis (4 November 1979) History Explained; Follow Operation Eagle Claw, CIA Jimmy Carter Military Operation Latest News On Dainik Bhaskar.
गिड़गिड़ाता रहा अमेरिका, छुड़ाने गए 8 कमांडोज की लाश लौटी; 444 दिनों के जद्दोजहद की कहानीवॉशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दफ्तर का फोन बजा। कॉल ईरान से थी। वहां अमेरिकी दूतावास की पॉलिटिकल ऑफिसर एलिजाबेथ ऐन स्विफ्ट ने हांफते हुए कहा- हमला हो गया है। भीड़ दीवार फांदकर दूतावास के अंदर घुस रही है और दूतावास पर कभी भी कब्जा हो सकता है। एलिजाबेथ के आखिरी शब्द थे- ‘वी आर गोइंग डाउन’। यहीं से शुरू हुई इतिहास की सबसे बड़ी 'होस्टेज क्राइसिस'। अमेरिका ने अपने बंधकों को छुड़ाने के लिए ईरान पर प्रतिबंध लगाए, मिलिट्री ऑपरेशन चलाए, कूटनीति का सहारा लिया, लेकिन बात नहीं बनी। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ी। आखिर अमेरिकी दूतावास पर कब्जा क्यों किया गया, सुपरपावर अमेरिका कुछ ईरानी छात्रों के आगे बेबस क्यों हो गया, CIA को क्यों लेना पड़ा हॉलीवुड का सहारा और अंततः कैसे हुई बंधकों की रिहाई, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… 1925 में ईरान में पहलवी वंश का शासन आया। पहले शासक रजा शाह अमेरिका और ब्रिटेन से प्रभावित थे। 1941 में उनके बेटे मोहम्मद रजा शाह सत्ता में आए। वो भी पश्चिमी देशों के तौर-तरीके और महिलाओं के बराबरी के हक को समझते थे। उन्होंने…1967 में ईरान के पर्सनल लॉ में भी सुधार किया गया जिसमें महिलाओं को बराबरी के हक मिले।शाह के दौर में ईरान की महिलाओं को पहनावे की आजादी थी। शियाओं के धार्मिक नेता आयतुल्लाह रुहोल्ला खोमैनी ने शाह की इन नीतियों का विरोध किया। 1978 में उनके नेतृत्व में 20 लाख लोग शाह के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए शाहयाद चौक में जमा हुए। इसे ही इस्लामिक रिवोल्यूशन कहा जाता है। इसमें महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।शाह के भागने के बाद खोमैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बने। दर-दर भटक रहे बीमार शाह को अमेरिका ने कैंसर के इलाज के लिए शरण दे दी। ईरानियों ने इसे अपमान माना और शाह की वापसी की मांग तेज होने लगी। और फिर आई 4 नवंबर 1979 की वो तारीख, जिसके बाद दुनिया ने अमेरिका की बेबसी देखी। तेहरान की सर्द सुबह…। करीब साढ़े दस बजे का वक्त। अमेरिकी दूतावास के दफ्तर में बैठीं पॉलिटिकल ऑफिसर एलिजाबेथ ऐन स्विफ्ट को अचानक एक शोर सुनाई देता है। कुछ ही मिनटों में सैकड़ों ईरानी प्रदर्शनकारी दूतावास की दीवारें लांघकर अंदर घुस आते हैं। दूतावास के अधिकारी आनन-फानन में सीक्रेट डॉक्युमेंट्स जलाने में लग जाते हैं। दोपहर तक प्रदर्शनकारियों ने इमारत की पहली मंजिल में आग लगा दी, ताकि अंदर मौजूद अधिकारी डरकर बाहर निकल जाएं। 12 बजकर 20 मिनट पर, हालात काबू से बाहर हो गए। दूतावास का मेन गेट तोड़ दिया गया। स्विफ्ट ने वॉशिंगटन को आखिरी कॉल किया।आंखों पर पट्टी और हाथ पीछे बंधे अमेरिकी दूतावास के अधिकारी। अफरातफरी के बीच 6 अमेरिकी अधिकारी दूतावास के पीछे के रास्ते से भागने में सफल हुए थे, जिनके बारे में प्रदर्शनकारियों को भनक नहीं लगी। दूतावास से कुल 66 लोगों को बंधक बनाया गया। इसमें कुछ स्थानीय कर्मचारी थे, जिन्हें जल्दी छोड़ दिया गया। बाकी बचे 53 बंधकों में डिप्टी एंबेसडर से लेकर टेक्निकल स्टाफ, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट और सुरक्षा स्टाफ के सदस्य भी थे। पीछे के रास्ते भागने में सफल हुए 6 अमेरिकी अधिकारी पहले ब्रिटिश और फिर कनाडाई दूतावास से संपर्क करते हैं। उन्हें हर पल इस बात का डर सता रहा था कि अगर ईरानी प्रदर्शनकारियों को पता चल गया, तो उनकी जान भी जा सकती है। आखिरकार उन्हें कनाडाई राजदूत केन टेलर और उनके डिप्टी जॉन शेरडाउन ने अपने घरों में शरण दी। यहां ये 6 लोग करीब 79 दिनों तक छिपे रहे। इस बीच वॉशिंगटन में CIA को सूचना मिली कि ये 6 लोग बेहद खतरनाक स्थिति में फंसे हुए हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी आलाकमान एंबेसी में फंसे अधिकारियों को बचाने के लिए ईरान से बातचीत और सौदेबाजी में लगे थे। तभी दूसरी तरफ एंबेसी से भागे इन 6 अधिकारियों को निकालने की योजना भी बनाई जाने लगी थी। ये जिम्मेदारी उस दौर में CIA के सबसे कुशल अंडरकवर एजेंट टोनी मेंडेज को सौंपी गई। ये काम था बगैर हिंसा के इन 6 लोगों को तेहरान से बाहर निकालने का। मिशन को अंजाम देने के लिए CIA ने एक बेहद यूनीक प्लान तैयार किया, जिसे Canadian Capar या ऑपरेशन आर्गो के नाम से जाना जाता है। मेंडेज ने लॉस एंजिलिस में एक फर्जी मूवी प्रोडक्शन कंपनी बनाई- Studio Six Productions। फर्जी ऑफिस, फोन नंबर, बिजनेस कार्ड और अखबार के लिए विज्ञापन, सब कुछ असली जैसा तैयार किया गया। फिल्म की स्क्रिप्ट खरीदी गई, एक साइंस-फिक्शन मूवी Argo के नाम पर। प्लान था कि फिल्म ईरान में शूट की जा रही है और मेंडेज खुद लोकेशन स्काउटिंग के लिए फिल्म के कनाडाई प्रोडक्शन मैनेजर बनकर ईरान जाएंगे। कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जो क्लार्क और उनकी कैबिनेट ने खुद इस मिशन की मंजूरी दी थी।25 जनवरी 1980 को टोनी मेंडेज और उनका एक साथी ऑपरेटिव जूलियन तेहरान पहुंचे। अगले तीन दिनों में उन्होंने छिपे हुए छह अमेरिकियों को फिल्म क्रू के मेंबर्स, लोकेशन स्काउट्स, असिस्टेंट डायरेक्टर्स और स्क्रिप्ट एडवाइजर्स के रूप में नई पहचान दी। कनाडा ने उन्हें असली कनाडाई पासपोर्ट भी जारी किए, जिससे उनकी पहचान और पुख्ता दिखे। 28 जनवरी 1980 की सुबह, ये फर्जी फिल्म टीम तेहरान एयरपोर्ट पहुंची। चेकिंग, इंटरव्यू और सिक्योरिटी टेस्ट के कई चरणों के बाद उन्होंने स्विसएयर फ्लाइट 363 से उड़ान भरी और तेहरान से सुरक्षित स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख पहुंच गए। यह मिशन CIA और कनाडा का जॉइंट ऑपरेशन था। परिस्थितियों को देखते हुए CIA की भूमिका तब गुप्त रखी गई। उस समय सारी सराहना कनाडा के हिस्से आई। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने औपचारिक रूप से कनाडा के साहस की तारीफ की, लेकिन CIA की भागीदारी 1997 में ही सार्वजनिक हुई, जब यह ऑपरेशन डी-क्लासिफाई हुआ। मिशन की सफलता के तुरंत बाद कनाडाई राजनयिक भी ईरान छोड़ गए और दूतावास बंद कर दिया गया। बाकी बचे बंधकों की रिहाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लगातार कूटनीतिक कोशिशें चल रही थीं, लेकिन हालात हर गुजरते हफ्ते के साथ और खराब होते जा रहे थे। 6 नवंबर 1979 को ईरान के अस्थायी प्रधानमंत्री मेहदी बाजारगान ने इस्तीफा दे दिया, अब ईरान की सत्ता पूरी तरह आयतुल्लाह खोमैनी के हाथ में थी, इससे बातचीत के सारे औपचारिक रास्ते लगभग बंद हो गए। 7 नवंबर को राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने संकट सुलझाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे, पर खोमैनी समर्थकों ने उन्हें मिलने की इजाजत नहीं दी। 12 नवंबर को ईरान के विदेश मंत्री अबोलहसन बनिसद्र ने कहा कि अगर अमेरिका बीमार शाह को वापस भेज दे, तो बंधकों को छोड़ा जा सकता है।इसकी 3 संभावित वजहें निकलकर सामने आती हैं… शाह को वापस भेजने से उन्हें मार दिए जाने या गिरफ्तार करके कड़ी सजा देने का खतरा था, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन जैसा दिखता।अमेरिका को डर था कि शाह की वापसी से ईरानी गुस्से में वृद्धि होगी और बंधकों की सुरक्षा और कठिन हो जाएगी। यही वजह थी कि शाह की वापसी के बजाय अमेरिका ने दूसरा रास्ता अपनाया। 14 नवंबर को अमेरिका ने ईरान की सभी सरकारी और बैंक संपत्तियां फ्रीज कर दीं। इसके बाद 17 नवंबर को खोमैनी ने कुछ चुनिंदा 13 बंधकों की रिहाई का आदेश दिया, जिनमें 5 महिलाएं भी शामिल थीं। अब यह साफ हो गया था कि ईरान अब इस संकट को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इसके बाद 29 नवंबर 1979 को बचे हुए 53 बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने ईरान के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में केस दायर किया और दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने मध्यस्थता की कोशिशें शुरू कीं, लेकिन कोई ठोस डेवलपमेंट नहीं हो पाया। 1980 की फरवरी में कई गुप्त वार्ताएं हुईं, मगर नतीजा फिर वही। सितंबर 1980 तक इंटरनेशनल प्रेशर बढ़ चुका था, फिर भी ईरान टस से मस नहीं हुआ। इन असफल प्रयासों और लगातार विरोध के चलते, जब कूटनीति ने जवाब दे दिया, तब अमेरिका ने आखिरी उपाय के तौर पर सैन्य रेस्क्यू मिशन ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ को मंजूरी दी। अप्रैल 1980 में जिमी कार्टर ने सैन्य कार्रवाई का फैसला लिया। नाम रखा ऑपरेशन ईगल क्लॉ। तेहरान में बंधकों को गुप्त तरीके से छुड़ाने का मिशन शुरू होने से पहले ही बिखर गया। ऑपरेशन ईगल क्लॉ बेहद जटिल था। अमेरिकी फोर्सेस को ओमान के मसीराह द्वीप से उड़ान भरकर पहले ईरान के रेगिस्तान ‘डेजर्ट वन’ तक पहुंचना था, जहां से हेलिकॉप्टरों को तेहरान जाकर अमेरिकी बंधकों को छुड़ाना था। हर हेलिकॉप्टर में सीमित सैनिक और सामान ही जा सकते थे, इसलिए कुल 8 हेलिकॉप्टर भेजे गए थे, लेकिन नियम के अनुसार मिशन तभी आगे बढ़ सकता था, जब कम से कम 6 हेलिकॉप्टर चालू हालत में हों। इसका कारण था - बंधकों और सैनिकों को निकालने के लिए पर्याप्त जगह बनाए रखना और बाकी हेलिकॉप्टरों को लॉजिस्टिक और फ्यूल सपोर्ट के लिए रिजर्व रखना। हेलिकॉप्टरों के साथ मिशन में शामिल C-130 हरक्यूलिस, अमेरिकी वायुसेना का ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट था, जो ओमान के मसीराह एयरबेस से उड़ाया गया था। इसका काम था - कमांडो, फ्यूल और उपकरणों को डेजर्ट वन तक पहुंचाना और हेलिकॉप्टरों में फ्यूल भरना। लेकिन रास्ते में आए भीषण रेत के तूफानों और तकनीकी खराबियों की वजह से दो हेलिकॉप्टर बीच रास्ते में ही फेल हो गए। वहीं तीसरे के रोटर ब्लेड में खराबी आ गई। कार्टर को संदेश भेजा गया कि 6 की बजाय सिर्फ पांच हेलिकॉप्टर बचे हैं। नियम साफ था- छह से कम हेलिकॉप्टर हुए तो मिशन रद्द कर दिया जाएगा। कुछ देर बाद ऑपरेशन रोकने का आदेश भी भेज दिया गया। लेकिन ऑपरेशन रद्द होने के बाद जब वापसी की तैयारी शुरू हुई, तभी एक हेलिकॉप्टर का ब्लेड एक C-130 विमान से टकरा गया। इससे जबरदस्त विस्फोट हुआ और आग की लपटें सैकड़ों फीट ऊपर तक उठीं।इस दुर्घटना में 8 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई। 25 अप्रैल 1980 को ऑपरेशन ईगल क्लॉ हमेशा के लिए खत्म हो गया। इस हादसे में एक ईरानी ट्रक चालक और स्थानीय निवासी की भी मौत हुई थी। रेगिस्तान में जली मशीनों की राख के साथ अमेरिका की इज्जत भी झुलस गई। कार्टर ने बाद में अपनी आत्मकथा मेंं भी लिखा किईरान ने इस मिशन के बाद बंधकों की सुरक्षा और कड़ी कर दी। अमेरिका ने जवाब में ईरान से सभी आर्थिक और राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए और ईरानी संपत्तियां फ्रीज रखीं। दुनियाभर में अमेरिका की साख पर असर पड़ा और कार्टर की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ने लगीं। मई से नवंबर 1980 के बीच अल्जीरिया ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी शुरू की। यूएन ने भी कई बार अपील की, लेकिन खोमैनी शासन अडिग रहा। वो चाहते थे कि अमेरिका शाह को लौटाए और ईरान के मामलों में दखल न दे। 20 जुलाई 1980 को ईरान-इराक युद्ध शुरू हुआ, जिससे ईरान की स्थिति कमजोर पड़ी। अब ईरान के लिए बंधक संकट को खत्म करना एक जरूरत बन गया था, ताकि वो युद्ध पर ध्यान दे सके। नवंबर 1980 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुए और रोनाल्ड रीगन ने जिमी कार्टर को हराया। खोमैनी सरकार ने अमेरिका के साथ बातचीत फिर शुरू की, लेकिन इस बार अल्जीरिया के जरिए गुप्त चैनलों से। 19 जनवरी 1981 को दोनों देशों के बीच Algiers Accords नाम के समझौते पर सहमति बनी, जिसके तहत अमेरिका ने वादा किया…अमेरिका ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली। और सिर्फ 20 मिनट बाद, तेहरान एयरपोर्ट से 53 अमेरिकी बंधक रिहा कर दिए गए। ठीक उसी दिन जब कार्टर का कार्यकाल समाप्त हुआ। बंधकों को पहले अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स ले जाया गया, फिर वहां से विएना और वाशिंगटन डीसी। अमेरिका ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को ईरान को कभी नहीं लौटाया। अमेरिका ने कुछ समय तक उनका इलाज न्यूयॉर्क में कराया, लेकिन दिसंबर 1979 में अमेरिका ने शाह से चुपचाप देश छोड़ने को कहा, ताकि तनाव और न बढ़े। इसके बाद शाह पनामा चले गए, फिर वहां से ईजिप्ट। वहीं, काहिरा में 27 जुलाई 1980 को उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार मिस्र में हुआ और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने उन्हें राजकीय सम्मान दिया।यानी कुल 444 दिन बाद यह संकट खत्म हुआ, लेकिन इसने अमेरिका-ईरान संबंधों को ऐसी खाई में डाल दिया, जो आज तक पूरी तरह पाटी नहीं जा सकी। ऑपरेशन आर्गो की सफलता के लिए टोनी मेंडेज को CIA का Intelligence Star Medal दिया गया। उनकी किताब The Master of Disguise और Argo: How the CIA and Hollywood Pulled Off the Most Audacious Rescue in History में उन्होंने पूरी कहानी लिखी। 2012 में हॉलीवुड डायरेक्टर बेन एफ्लेक ने इसी पर फिल्म Argo बनाई, जिसने 2013 के ऑस्कर अवार्ड्स में ‘Best Picture’ का खिताब जीता। वहीं, ईगल क्लॉ मिशन की विफलता के बाद अमेरिकी सेना ने महसूस किया कि स्पेशल फोर्सेस के बीच कोऑर्डिनेशन की भारी कमी थी। यही वजह बनी कि बाद में अमेरिका ने Delta Force और Joint Special Operations Command बनाई, जो आज तक अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस की रीढ़ हैं।86 साल के खामेनेई की कहानी, एक मौलवी से कैसे बने ईरान के सुप्रीम लीडर; इजराइल उनको मारना क्यों चाहता ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई कहते हैं कि अमेरिका 'बड़ा शैतान' है और इजराइल 'कैंसर ट्यूमर', जिसे काटकर फेंकना जरूरी है। उधर, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या से जंग खत्म हो जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी कहा- हमें पता है कि वो कहां छिपे हैं, लेकिन हम उन्हें मारेंगे नहीं, फिलहाल तो नहीं।जोधपुर में अचानक बारिश, बूंदाबांदी और रिमझिम से बदला मौसमकोटा में बारिश का येलो अलर्ट जारीसवाई माधोपुर में कल बारिश का येलो अलर्टझारखंड में दस्तक दे रही है सर्दीश्योपुर में फसलें बर्बाद, शिवराज से मिले भाजपा नेता.
गिड़गिड़ाता रहा अमेरिका, छुड़ाने गए 8 कमांडोज की लाश लौटी; 444 दिनों के जद्दोजहद की कहानीवॉशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकी विदेश मंत्रालय के दफ्तर का फोन बजा। कॉल ईरान से थी। वहां अमेरिकी दूतावास की पॉलिटिकल ऑफिसर एलिजाबेथ ऐन स्विफ्ट ने हांफते हुए कहा- हमला हो गया है। भीड़ दीवार फांदकर दूतावास के अंदर घुस रही है और दूतावास पर कभी भी कब्जा हो सकता है। एलिजाबेथ के आखिरी शब्द थे- ‘वी आर गोइंग डाउन’। यहीं से शुरू हुई इतिहास की सबसे बड़ी 'होस्टेज क्राइसिस'। अमेरिका ने अपने बंधकों को छुड़ाने के लिए ईरान पर प्रतिबंध लगाए, मिलिट्री ऑपरेशन चलाए, कूटनीति का सहारा लिया, लेकिन बात नहीं बनी। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को अपनी कुर्सी तक गंवानी पड़ी। आखिर अमेरिकी दूतावास पर कब्जा क्यों किया गया, सुपरपावर अमेरिका कुछ ईरानी छात्रों के आगे बेबस क्यों हो गया, CIA को क्यों लेना पड़ा हॉलीवुड का सहारा और अंततः कैसे हुई बंधकों की रिहाई, जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में… 1925 में ईरान में पहलवी वंश का शासन आया। पहले शासक रजा शाह अमेरिका और ब्रिटेन से प्रभावित थे। 1941 में उनके बेटे मोहम्मद रजा शाह सत्ता में आए। वो भी पश्चिमी देशों के तौर-तरीके और महिलाओं के बराबरी के हक को समझते थे। उन्होंने…1967 में ईरान के पर्सनल लॉ में भी सुधार किया गया जिसमें महिलाओं को बराबरी के हक मिले।शाह के दौर में ईरान की महिलाओं को पहनावे की आजादी थी। शियाओं के धार्मिक नेता आयतुल्लाह रुहोल्ला खोमैनी ने शाह की इन नीतियों का विरोध किया। 1978 में उनके नेतृत्व में 20 लाख लोग शाह के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए शाहयाद चौक में जमा हुए। इसे ही इस्लामिक रिवोल्यूशन कहा जाता है। इसमें महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।शाह के भागने के बाद खोमैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बने। दर-दर भटक रहे बीमार शाह को अमेरिका ने कैंसर के इलाज के लिए शरण दे दी। ईरानियों ने इसे अपमान माना और शाह की वापसी की मांग तेज होने लगी। और फिर आई 4 नवंबर 1979 की वो तारीख, जिसके बाद दुनिया ने अमेरिका की बेबसी देखी। तेहरान की सर्द सुबह…। करीब साढ़े दस बजे का वक्त। अमेरिकी दूतावास के दफ्तर में बैठीं पॉलिटिकल ऑफिसर एलिजाबेथ ऐन स्विफ्ट को अचानक एक शोर सुनाई देता है। कुछ ही मिनटों में सैकड़ों ईरानी प्रदर्शनकारी दूतावास की दीवारें लांघकर अंदर घुस आते हैं। दूतावास के अधिकारी आनन-फानन में सीक्रेट डॉक्युमेंट्स जलाने में लग जाते हैं। दोपहर तक प्रदर्शनकारियों ने इमारत की पहली मंजिल में आग लगा दी, ताकि अंदर मौजूद अधिकारी डरकर बाहर निकल जाएं। 12 बजकर 20 मिनट पर, हालात काबू से बाहर हो गए। दूतावास का मेन गेट तोड़ दिया गया। स्विफ्ट ने वॉशिंगटन को आखिरी कॉल किया।आंखों पर पट्टी और हाथ पीछे बंधे अमेरिकी दूतावास के अधिकारी। अफरातफरी के बीच 6 अमेरिकी अधिकारी दूतावास के पीछे के रास्ते से भागने में सफल हुए थे, जिनके बारे में प्रदर्शनकारियों को भनक नहीं लगी। दूतावास से कुल 66 लोगों को बंधक बनाया गया। इसमें कुछ स्थानीय कर्मचारी थे, जिन्हें जल्दी छोड़ दिया गया। बाकी बचे 53 बंधकों में डिप्टी एंबेसडर से लेकर टेक्निकल स्टाफ, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एजेंट और सुरक्षा स्टाफ के सदस्य भी थे। पीछे के रास्ते भागने में सफल हुए 6 अमेरिकी अधिकारी पहले ब्रिटिश और फिर कनाडाई दूतावास से संपर्क करते हैं। उन्हें हर पल इस बात का डर सता रहा था कि अगर ईरानी प्रदर्शनकारियों को पता चल गया, तो उनकी जान भी जा सकती है। आखिरकार उन्हें कनाडाई राजदूत केन टेलर और उनके डिप्टी जॉन शेरडाउन ने अपने घरों में शरण दी। यहां ये 6 लोग करीब 79 दिनों तक छिपे रहे। इस बीच वॉशिंगटन में CIA को सूचना मिली कि ये 6 लोग बेहद खतरनाक स्थिति में फंसे हुए हैं। एक तरफ जहां अमेरिकी आलाकमान एंबेसी में फंसे अधिकारियों को बचाने के लिए ईरान से बातचीत और सौदेबाजी में लगे थे। तभी दूसरी तरफ एंबेसी से भागे इन 6 अधिकारियों को निकालने की योजना भी बनाई जाने लगी थी। ये जिम्मेदारी उस दौर में CIA के सबसे कुशल अंडरकवर एजेंट टोनी मेंडेज को सौंपी गई। ये काम था बगैर हिंसा के इन 6 लोगों को तेहरान से बाहर निकालने का। मिशन को अंजाम देने के लिए CIA ने एक बेहद यूनीक प्लान तैयार किया, जिसे Canadian Capar या ऑपरेशन आर्गो के नाम से जाना जाता है। मेंडेज ने लॉस एंजिलिस में एक फर्जी मूवी प्रोडक्शन कंपनी बनाई- Studio Six Productions। फर्जी ऑफिस, फोन नंबर, बिजनेस कार्ड और अखबार के लिए विज्ञापन, सब कुछ असली जैसा तैयार किया गया। फिल्म की स्क्रिप्ट खरीदी गई, एक साइंस-फिक्शन मूवी Argo के नाम पर। प्लान था कि फिल्म ईरान में शूट की जा रही है और मेंडेज खुद लोकेशन स्काउटिंग के लिए फिल्म के कनाडाई प्रोडक्शन मैनेजर बनकर ईरान जाएंगे। कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जो क्लार्क और उनकी कैबिनेट ने खुद इस मिशन की मंजूरी दी थी।25 जनवरी 1980 को टोनी मेंडेज और उनका एक साथी ऑपरेटिव जूलियन तेहरान पहुंचे। अगले तीन दिनों में उन्होंने छिपे हुए छह अमेरिकियों को फिल्म क्रू के मेंबर्स, लोकेशन स्काउट्स, असिस्टेंट डायरेक्टर्स और स्क्रिप्ट एडवाइजर्स के रूप में नई पहचान दी। कनाडा ने उन्हें असली कनाडाई पासपोर्ट भी जारी किए, जिससे उनकी पहचान और पुख्ता दिखे। 28 जनवरी 1980 की सुबह, ये फर्जी फिल्म टीम तेहरान एयरपोर्ट पहुंची। चेकिंग, इंटरव्यू और सिक्योरिटी टेस्ट के कई चरणों के बाद उन्होंने स्विसएयर फ्लाइट 363 से उड़ान भरी और तेहरान से सुरक्षित स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख पहुंच गए। यह मिशन CIA और कनाडा का जॉइंट ऑपरेशन था। परिस्थितियों को देखते हुए CIA की भूमिका तब गुप्त रखी गई। उस समय सारी सराहना कनाडा के हिस्से आई। अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने औपचारिक रूप से कनाडा के साहस की तारीफ की, लेकिन CIA की भागीदारी 1997 में ही सार्वजनिक हुई, जब यह ऑपरेशन डी-क्लासिफाई हुआ। मिशन की सफलता के तुरंत बाद कनाडाई राजनयिक भी ईरान छोड़ गए और दूतावास बंद कर दिया गया। बाकी बचे बंधकों की रिहाई को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच लगातार कूटनीतिक कोशिशें चल रही थीं, लेकिन हालात हर गुजरते हफ्ते के साथ और खराब होते जा रहे थे। 6 नवंबर 1979 को ईरान के अस्थायी प्रधानमंत्री मेहदी बाजारगान ने इस्तीफा दे दिया, अब ईरान की सत्ता पूरी तरह आयतुल्लाह खोमैनी के हाथ में थी, इससे बातचीत के सारे औपचारिक रास्ते लगभग बंद हो गए। 7 नवंबर को राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने संकट सुलझाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे, पर खोमैनी समर्थकों ने उन्हें मिलने की इजाजत नहीं दी। 12 नवंबर को ईरान के विदेश मंत्री अबोलहसन बनिसद्र ने कहा कि अगर अमेरिका बीमार शाह को वापस भेज दे, तो बंधकों को छोड़ा जा सकता है।इसकी 3 संभावित वजहें निकलकर सामने आती हैं… शाह को वापस भेजने से उन्हें मार दिए जाने या गिरफ्तार करके कड़ी सजा देने का खतरा था, जो मानवाधिकारों के उल्लंघन जैसा दिखता।अमेरिका को डर था कि शाह की वापसी से ईरानी गुस्से में वृद्धि होगी और बंधकों की सुरक्षा और कठिन हो जाएगी। यही वजह थी कि शाह की वापसी के बजाय अमेरिका ने दूसरा रास्ता अपनाया। 14 नवंबर को अमेरिका ने ईरान की सभी सरकारी और बैंक संपत्तियां फ्रीज कर दीं। इसके बाद 17 नवंबर को खोमैनी ने कुछ चुनिंदा 13 बंधकों की रिहाई का आदेश दिया, जिनमें 5 महिलाएं भी शामिल थीं। अब यह साफ हो गया था कि ईरान अब इस संकट को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। इसके बाद 29 नवंबर 1979 को बचे हुए 53 बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने ईरान के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में केस दायर किया और दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र समेत कई देशों ने मध्यस्थता की कोशिशें शुरू कीं, लेकिन कोई ठोस डेवलपमेंट नहीं हो पाया। 1980 की फरवरी में कई गुप्त वार्ताएं हुईं, मगर नतीजा फिर वही। सितंबर 1980 तक इंटरनेशनल प्रेशर बढ़ चुका था, फिर भी ईरान टस से मस नहीं हुआ। इन असफल प्रयासों और लगातार विरोध के चलते, जब कूटनीति ने जवाब दे दिया, तब अमेरिका ने आखिरी उपाय के तौर पर सैन्य रेस्क्यू मिशन ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ को मंजूरी दी। अप्रैल 1980 में जिमी कार्टर ने सैन्य कार्रवाई का फैसला लिया। नाम रखा ऑपरेशन ईगल क्लॉ। तेहरान में बंधकों को गुप्त तरीके से छुड़ाने का मिशन शुरू होने से पहले ही बिखर गया। ऑपरेशन ईगल क्लॉ बेहद जटिल था। अमेरिकी फोर्सेस को ओमान के मसीराह द्वीप से उड़ान भरकर पहले ईरान के रेगिस्तान ‘डेजर्ट वन’ तक पहुंचना था, जहां से हेलिकॉप्टरों को तेहरान जाकर अमेरिकी बंधकों को छुड़ाना था। हर हेलिकॉप्टर में सीमित सैनिक और सामान ही जा सकते थे, इसलिए कुल 8 हेलिकॉप्टर भेजे गए थे, लेकिन नियम के अनुसार मिशन तभी आगे बढ़ सकता था, जब कम से कम 6 हेलिकॉप्टर चालू हालत में हों। इसका कारण था - बंधकों और सैनिकों को निकालने के लिए पर्याप्त जगह बनाए रखना और बाकी हेलिकॉप्टरों को लॉजिस्टिक और फ्यूल सपोर्ट के लिए रिजर्व रखना। हेलिकॉप्टरों के साथ मिशन में शामिल C-130 हरक्यूलिस, अमेरिकी वायुसेना का ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट था, जो ओमान के मसीराह एयरबेस से उड़ाया गया था। इसका काम था - कमांडो, फ्यूल और उपकरणों को डेजर्ट वन तक पहुंचाना और हेलिकॉप्टरों में फ्यूल भरना। लेकिन रास्ते में आए भीषण रेत के तूफानों और तकनीकी खराबियों की वजह से दो हेलिकॉप्टर बीच रास्ते में ही फेल हो गए। वहीं तीसरे के रोटर ब्लेड में खराबी आ गई। कार्टर को संदेश भेजा गया कि 6 की बजाय सिर्फ पांच हेलिकॉप्टर बचे हैं। नियम साफ था- छह से कम हेलिकॉप्टर हुए तो मिशन रद्द कर दिया जाएगा। कुछ देर बाद ऑपरेशन रोकने का आदेश भी भेज दिया गया। लेकिन ऑपरेशन रद्द होने के बाद जब वापसी की तैयारी शुरू हुई, तभी एक हेलिकॉप्टर का ब्लेड एक C-130 विमान से टकरा गया। इससे जबरदस्त विस्फोट हुआ और आग की लपटें सैकड़ों फीट ऊपर तक उठीं।इस दुर्घटना में 8 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई। 25 अप्रैल 1980 को ऑपरेशन ईगल क्लॉ हमेशा के लिए खत्म हो गया। इस हादसे में एक ईरानी ट्रक चालक और स्थानीय निवासी की भी मौत हुई थी। रेगिस्तान में जली मशीनों की राख के साथ अमेरिका की इज्जत भी झुलस गई। कार्टर ने बाद में अपनी आत्मकथा मेंं भी लिखा किईरान ने इस मिशन के बाद बंधकों की सुरक्षा और कड़ी कर दी। अमेरिका ने जवाब में ईरान से सभी आर्थिक और राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए और ईरानी संपत्तियां फ्रीज रखीं। दुनियाभर में अमेरिका की साख पर असर पड़ा और कार्टर की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ने लगीं। मई से नवंबर 1980 के बीच अल्जीरिया ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी शुरू की। यूएन ने भी कई बार अपील की, लेकिन खोमैनी शासन अडिग रहा। वो चाहते थे कि अमेरिका शाह को लौटाए और ईरान के मामलों में दखल न दे। 20 जुलाई 1980 को ईरान-इराक युद्ध शुरू हुआ, जिससे ईरान की स्थिति कमजोर पड़ी। अब ईरान के लिए बंधक संकट को खत्म करना एक जरूरत बन गया था, ताकि वो युद्ध पर ध्यान दे सके। नवंबर 1980 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुए और रोनाल्ड रीगन ने जिमी कार्टर को हराया। खोमैनी सरकार ने अमेरिका के साथ बातचीत फिर शुरू की, लेकिन इस बार अल्जीरिया के जरिए गुप्त चैनलों से। 19 जनवरी 1981 को दोनों देशों के बीच Algiers Accords नाम के समझौते पर सहमति बनी, जिसके तहत अमेरिका ने वादा किया…अमेरिका ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली। और सिर्फ 20 मिनट बाद, तेहरान एयरपोर्ट से 53 अमेरिकी बंधक रिहा कर दिए गए। ठीक उसी दिन जब कार्टर का कार्यकाल समाप्त हुआ। बंधकों को पहले अल्जीरिया की राजधानी अल्जीयर्स ले जाया गया, फिर वहां से विएना और वाशिंगटन डीसी। अमेरिका ने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को ईरान को कभी नहीं लौटाया। अमेरिका ने कुछ समय तक उनका इलाज न्यूयॉर्क में कराया, लेकिन दिसंबर 1979 में अमेरिका ने शाह से चुपचाप देश छोड़ने को कहा, ताकि तनाव और न बढ़े। इसके बाद शाह पनामा चले गए, फिर वहां से ईजिप्ट। वहीं, काहिरा में 27 जुलाई 1980 को उनकी मृत्यु हो गई। उनका अंतिम संस्कार मिस्र में हुआ और मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने उन्हें राजकीय सम्मान दिया।यानी कुल 444 दिन बाद यह संकट खत्म हुआ, लेकिन इसने अमेरिका-ईरान संबंधों को ऐसी खाई में डाल दिया, जो आज तक पूरी तरह पाटी नहीं जा सकी। ऑपरेशन आर्गो की सफलता के लिए टोनी मेंडेज को CIA का Intelligence Star Medal दिया गया। उनकी किताब The Master of Disguise और Argo: How the CIA and Hollywood Pulled Off the Most Audacious Rescue in History में उन्होंने पूरी कहानी लिखी। 2012 में हॉलीवुड डायरेक्टर बेन एफ्लेक ने इसी पर फिल्म Argo बनाई, जिसने 2013 के ऑस्कर अवार्ड्स में ‘Best Picture’ का खिताब जीता। वहीं, ईगल क्लॉ मिशन की विफलता के बाद अमेरिकी सेना ने महसूस किया कि स्पेशल फोर्सेस के बीच कोऑर्डिनेशन की भारी कमी थी। यही वजह बनी कि बाद में अमेरिका ने Delta Force और Joint Special Operations Command बनाई, जो आज तक अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस की रीढ़ हैं।86 साल के खामेनेई की कहानी, एक मौलवी से कैसे बने ईरान के सुप्रीम लीडर; इजराइल उनको मारना क्यों चाहता ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई कहते हैं कि अमेरिका 'बड़ा शैतान' है और इजराइल 'कैंसर ट्यूमर', जिसे काटकर फेंकना जरूरी है। उधर, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या से जंग खत्म हो जाएगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी कहा- हमें पता है कि वो कहां छिपे हैं, लेकिन हम उन्हें मारेंगे नहीं, फिलहाल तो नहीं।जोधपुर में अचानक बारिश, बूंदाबांदी और रिमझिम से बदला मौसमकोटा में बारिश का येलो अलर्ट जारीसवाई माधोपुर में कल बारिश का येलो अलर्टझारखंड में दस्तक दे रही है सर्दीश्योपुर में फसलें बर्बाद, शिवराज से मिले भाजपा नेता
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