प्रस्तुत संग्रह की कहानियां परिवार, गांव, मोहल्ले के परिवेश में रची-बसी हैं, जिनके पात्र असल जिंदगी से उठाए गए हैं। ये कहानियां पठनीयता, रुचि, नैतिकता, आदर्श, मूल्यों की बात सहजता के साथ बिना किसी वाग्जाल के कह जाती हैं। सामान्य जीवन में लोग अपना सुख-दुख अपने ढंग से जीते हैं, बयां करते हैं, जीवन का यही सार गोविंद उपाध्याय की कहानियों में देखने को मिलता है।
किताबें मिलीं: ‘तुम ऐसी तो नहीं थी’, ‘चचंला चोर’ और ‘कथक विनियोग’ जनसत्ता March 3, 2019 5:08 AM ‘तुम ऐसी तो नहीं थी’ और ‘चचंला चोर’ तुम ऐसी तो नहीं थी… ‘समय चक्र’ कहानी रिटायर्ड बासठ वर्षीय तारक बाबू की कहानी है, जिनकी एक ही बेटी है-अंतरा। उसका पति पूना में नौकरी करता है। एक दिन अचानक उनका दामाद फोन पर उन्हें सूचना देता है कि उसे फ्रांस में दूसरी नौकरी मिल गई है। इससे वे खासे बेचैन हो जाते हैं। ‘तीन औरतें’ कहानी भड़भूजे का काम करने वाली रमेसरी, नेताइन और मास्टरनी की कहानी है। ‘मेड़कटवा’ निरंजन की कहानी है, जिनका पड़ोसी तारकेश्वर मेढ़कटवा के नाम से मशहूर है। जिसका भी खेत उसके खेत से सटा होता है, वह चुपचाप मेढ़ काट कर खेत की जमीन अपने खेत में मिलाकर जमीन हड़प जाता है। यह छोटी-सी कहानी गांव के भाईचारे को बयां करती है। ‘तुम तो ऐसी न थी’ एक सामान्य लड़की ‘कर्णिका’ की कहानी है, जिसे दुर्भाग्य से एक अयोग्य परिवार में ब्याह दिया जाता है। बेटियों की ससुराल में होने वाली दुर्दशा का मार्मिक चित्रण इस कहानी में किया गया है।चचंला चोर सपने सदा से क्षणभंगुर समझे जाते हैं और वास्तविकता काल की कुंडली की तरह लपलप। यह भी तो हो सकता है कि हमारी कथित वास्तविकताएं लंबे सपनों का उलझा जाल हों और जो प्यास से टूटती नींद में पानी जैसा चमककर लुप्त हो जाता है वही कुआं खोदने का हौसला देने वाला असल हो। इस खयाल की मिट्टी से शिवेंद्र ने एक ऐसे लड़को को बनाने की कोशिश की है जो एक स्वतंत्रचेता औरत या मां के अरमानों का मूर्त रूप है। सजीव और इतना व्याकुल कि दुनिया चाहती है कि उसे महीना आए। महीना तो नहीं आता लेकिन पीड़ा की वैसी ही घुमड़न के साथ आठ साल की दो चोटी वाली, आंखों में धूप धरे, बित्ता चमकाती चंचला चोर का सपना आने लगता है। अंधेरगर्दी के संसार में कुलांचे भरती इस जिद्दी, निडर छोकरी के तलवों से फूटती रोशनी में हम देखते हैं कि प्रेमियों की कामना समेत हर रहने लायक जगह में पाई जाने वाली हर औरत अधूरी और लकवाग्रस्त है। सभ्यता और पितृसत्ता उसे वैसी नहीं रहने देते जैसी वह पैदा हुई थी। वे उसकी आजादी से डरते हैं इसलिए नए-पुराने रंगों के कई तरह के पुतले बना देते हैं लेकिन वह रहती है फकत औरत ही।…नर्तन का प्रथम दर्शक स्वयं नर्तक ही होता है। ऐतरेय उपनिषद् के ऐसे दर्शक ने भारतीय नृत्यचेतना का आलोकवर्शी समय देखा है। ऋषि भरत का आकर ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ इस नृत्यचेतन की ऐसी अक्षुण्ण थाती है जिसकी वेत प्रकाशवंत छाया औपनिषादिक दर्शक को नृत्य रत्नावली में भी दिख सकती है और जयपुर घराने में भी, और हां, लोकतत्त्वों में भी। तत्त्वदर्शी नृत्यांगना शाम्भवी शुक्ला के लिए यह मुश्किल तो था कि नृत्य, विशेषकर कथक के ऐसे व्यापक फलक को दर्शकों के साथ-साथ पारखियों और पाठकों के लिए पारदर्शी बनाए किंतु उन्होने ऐसी अध्ययन शैली से इसे संभव किया है जो अपना आधार पंचमवेद की व्यावहारिकता में भी देख पाती है और नृत्यचेतना के स्वयं अपने अवचेतन में भी। शास्त्र और सिद्धांत को घराने की बारीक चीजों से जोड़कर उन्हें प्रस्तुत करना और कथक से संबंधित चुनौतियों का सामना करना शाम्भवी की मुख्य ताकत है। कथक और लोकतत्त्व, कथक और नाट्यशास्त्र, जयपुर घराना और जयपुर घराने की बारीकियां शाम्भवी के अध्ययन के मुख्य विषय हैं। उनकी यह पुस्तक कथक पर इन सभी विषयों पर गंभीर विमर्श की रचना करती है। कथक विनियोग : शाम्भवी शुक्ला मिश्रा; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 400 रुपए। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App.
किताबें मिलीं: ‘तुम ऐसी तो नहीं थी’, ‘चचंला चोर’ और ‘कथक विनियोग’ जनसत्ता March 3, 2019 5:08 AM ‘तुम ऐसी तो नहीं थी’ और ‘चचंला चोर’ तुम ऐसी तो नहीं थी… ‘समय चक्र’ कहानी रिटायर्ड बासठ वर्षीय तारक बाबू की कहानी है, जिनकी एक ही बेटी है-अंतरा। उसका पति पूना में नौकरी करता है। एक दिन अचानक उनका दामाद फोन पर उन्हें सूचना देता है कि उसे फ्रांस में दूसरी नौकरी मिल गई है। इससे वे खासे बेचैन हो जाते हैं। ‘तीन औरतें’ कहानी भड़भूजे का काम करने वाली रमेसरी, नेताइन और मास्टरनी की कहानी है। ‘मेड़कटवा’ निरंजन की कहानी है, जिनका पड़ोसी तारकेश्वर मेढ़कटवा के नाम से मशहूर है। जिसका भी खेत उसके खेत से सटा होता है, वह चुपचाप मेढ़ काट कर खेत की जमीन अपने खेत में मिलाकर जमीन हड़प जाता है। यह छोटी-सी कहानी गांव के भाईचारे को बयां करती है। ‘तुम तो ऐसी न थी’ एक सामान्य लड़की ‘कर्णिका’ की कहानी है, जिसे दुर्भाग्य से एक अयोग्य परिवार में ब्याह दिया जाता है। बेटियों की ससुराल में होने वाली दुर्दशा का मार्मिक चित्रण इस कहानी में किया गया है।चचंला चोर सपने सदा से क्षणभंगुर समझे जाते हैं और वास्तविकता काल की कुंडली की तरह लपलप। यह भी तो हो सकता है कि हमारी कथित वास्तविकताएं लंबे सपनों का उलझा जाल हों और जो प्यास से टूटती नींद में पानी जैसा चमककर लुप्त हो जाता है वही कुआं खोदने का हौसला देने वाला असल हो। इस खयाल की मिट्टी से शिवेंद्र ने एक ऐसे लड़को को बनाने की कोशिश की है जो एक स्वतंत्रचेता औरत या मां के अरमानों का मूर्त रूप है। सजीव और इतना व्याकुल कि दुनिया चाहती है कि उसे महीना आए। महीना तो नहीं आता लेकिन पीड़ा की वैसी ही घुमड़न के साथ आठ साल की दो चोटी वाली, आंखों में धूप धरे, बित्ता चमकाती चंचला चोर का सपना आने लगता है। अंधेरगर्दी के संसार में कुलांचे भरती इस जिद्दी, निडर छोकरी के तलवों से फूटती रोशनी में हम देखते हैं कि प्रेमियों की कामना समेत हर रहने लायक जगह में पाई जाने वाली हर औरत अधूरी और लकवाग्रस्त है। सभ्यता और पितृसत्ता उसे वैसी नहीं रहने देते जैसी वह पैदा हुई थी। वे उसकी आजादी से डरते हैं इसलिए नए-पुराने रंगों के कई तरह के पुतले बना देते हैं लेकिन वह रहती है फकत औरत ही।…नर्तन का प्रथम दर्शक स्वयं नर्तक ही होता है। ऐतरेय उपनिषद् के ऐसे दर्शक ने भारतीय नृत्यचेतना का आलोकवर्शी समय देखा है। ऋषि भरत का आकर ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ इस नृत्यचेतन की ऐसी अक्षुण्ण थाती है जिसकी वेत प्रकाशवंत छाया औपनिषादिक दर्शक को नृत्य रत्नावली में भी दिख सकती है और जयपुर घराने में भी, और हां, लोकतत्त्वों में भी। तत्त्वदर्शी नृत्यांगना शाम्भवी शुक्ला के लिए यह मुश्किल तो था कि नृत्य, विशेषकर कथक के ऐसे व्यापक फलक को दर्शकों के साथ-साथ पारखियों और पाठकों के लिए पारदर्शी बनाए किंतु उन्होने ऐसी अध्ययन शैली से इसे संभव किया है जो अपना आधार पंचमवेद की व्यावहारिकता में भी देख पाती है और नृत्यचेतना के स्वयं अपने अवचेतन में भी। शास्त्र और सिद्धांत को घराने की बारीक चीजों से जोड़कर उन्हें प्रस्तुत करना और कथक से संबंधित चुनौतियों का सामना करना शाम्भवी की मुख्य ताकत है। कथक और लोकतत्त्व, कथक और नाट्यशास्त्र, जयपुर घराना और जयपुर घराने की बारीकियां शाम्भवी के अध्ययन के मुख्य विषय हैं। उनकी यह पुस्तक कथक पर इन सभी विषयों पर गंभीर विमर्श की रचना करती है। कथक विनियोग : शाम्भवी शुक्ला मिश्रा; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 400 रुपए। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App
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