92 बरस की उम्र में भी पहले की तरह खूबसूरत हैं कामिनी कौशल

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92 बरस की उम्र में भी पहले की तरह खूबसूरत हैं कामिनी कौशल
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कामिनी कौशल ऐसी हीरोइन रही हैं जो शादी के बाद भी नायिका के रूप में बेहद सफल रहीं.

अपनी 'बिराज बहू' फिल्म के लिए तो सन 1956 में सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेत्री का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला. बाद में कामिनी कौशल ने उपकार, वारिस, दो रास्ते, यादगार, पूरब और पश्चिम, उपहार, शोर, रोटी कपडा और मकान, संन्यासी, प्रेम नगर और स्वर्ग नर्क जैसी बहुत सी फिल्मों में चरित्र भूमिकाओं में अपनी दूसरी पारी खेली.

अब भी वह यदा कदा सीरियल और फ़िल्में करती रहती हैं. कुछ बरस पहले कामिनी जी 'लागा चुनरी में दाग' और पीछे शाहरुख़ खान की फिल्म 'चेन्नई एक्सप्रेस' में भी वह एक विशिष्ट भूमिका में नज़र आयीं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी कामिनी कौशल बेशक 92 बरस की हो गयी हैं, लेकिन आज भी वह पहले की तरह खूबसूरत हैं और फिट भी. इस महान अभिनेत्री से मुझे बात करके हमेशा अच्छा लगता रहा है. पिछले दिनों मैंने एक अरसे बाद उनके मुंबई स्थित घर में जाकर उनसे ख़ास मुलाकात की. उनसे हुई बातचीत की कुछ ख़ास बातें आपसे साझा कर रहा हूँ-अपना जन्म दिन बस अपने परिवार के साथ मनाया. जन्म दिन के पहले बहुत हंगामे हो चुके हैं, अब तो शान्ति से ही मनाना पसंद है. शांत रहने का समय है. इसी में आनंद आता है. पीछे मैंने बच्चों के कहने पर अपना जन्म दिन क्लब हाउस में बड़ी पार्टी देकर मनाया था. पर मैंने देखा तब शोर शराबा ज्यादा हो जाता है. ऐसे में मेहमानों के साथ क्या अपने परिवार के सदस्यों तक से बातचीत नहीं हो सकती. इसलिए जन्मदिन की शाम को सिर्फ परिवार के साथ घर पर ही सेलिब्रेशन हुआ.मुझे किचन से दूर रखा गया है. वैसे मैं खुद कुकिंग करती रहती हूँ. केक भी खुद बनाती हूँ. लेकिन मेरे बेटे राहुल ने कहा है मैं खुद कुछ नहीं बनाउंगी. सिर्फ आराम करुँगी. इसलिए जो भी बनेगा बच्चे ही बनवायेंगे. मुझे ख़ुशी है कि मुझे बहुत अच्छे बच्चे मिले हैं. मेरा सभी बहुत ख्याल रखते हैं. दो बेटे अमेरिका और इंग्लैंड में रहते हैं. लेकिन मुझे बराबर फ़ोन करते हैं. लन्दन में सबसे छोटा बेटा है विदुर.वह तो हर रोज सुबह बिना नागा किये फ़ोन करता है. मेरे दिन की शुरुआत उसीके फ़ोन से होती है. अब भी जन्म दिन की शुभकामनाएं दी हैं सभी ने. पिछली बार तो मुझे याद है आपको अमिताभ बच्चन ने भी अपनी शुभकामनाओं के साथ बहुत लम्बा चौड़ा पेड़नुमा गुलदस्ता भेजा था! हँसते हुए..हाँ बिलकुल पेड़ सा था वह. अमिताभ बच्चन मुझे बहुत सम्मान देते हैं. अपनी इतनी व्यस्तताओं के बीच भी उन्हें मेरा जन्म दिन याद रहना और शुभकामनाएं भेजना अच्छा लगता है. असल में उनके परिवार और हमारे बीच पुराने सम्बन्ध हैं. उनकी माँ तेजी बच्चन और मेरी बड़ी बहन उषा लाहौर में कॉलेज के जमाने से अच्छी दोस्त थीं. फिर जया भादुड़ी ने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण लेने के बाद मुंबई लौटने पर जो अपनी पहली फिल्म 'उपहार' की थी, उसमें भी आप उनके साथ थीं! हाँ 'उपहार' में तो साथ थी ही बाद में भी उनके साथ फिल्म की. जया और अभिषेक के साथ 'लागा चुनरी में दाग' भी की. लेकिन मैं आपको बताऊँ, पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में भी जया का सलेक्शन मैंने ही किया था. मैं तब उनकी सलेक्शन कमेटी में थी. तब उनकी अमिताभ से शादी भी नहीं हुई थी. हालांकि आज उनसे ज्यादा मिलना जुलना नहीं हो पाता. लेकिन हम जब भी कभी मिलते हैं तो अच्छे से मिलते हैं.मेरी ज्यादा दोस्ती फिल्म इंडस्ट्री में किसी से नहीं रही. सिर्फ शादी समारोह में ही लोगों से मिलना हो पाता है. वैसे भी मैं मालाबार हिल पर रहती हूँ, इधर अब फ़िल्मी दुनिया के लोग बहुत कम ही रहे, जो दो चार थे, अब वे भी नहीं रहे. फिर किसी मिलने का सोचा जाए तो सब दूर दूर रहते हैं. हाँ अभी पेडर रोड पर राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय का उदघाटन हुआ तो उसमें मुझे बुलाया तो मैं गयी थी. तब कई नए-पुराने लोगों से मिलना हुआ. मनोज कुमार भी मिले थे. जिनके साथ मैंने बहुत सी फ़िल्में की हैं.मुलाकात हुई तो लेकिन दो मिनट की, कुछ लोगों ने मोदी जी और मेरे फोटो भी लिए. असल में तब हर कोई मोदी जी से मिलना चाहता था. प्रधानमंत्री मोदी बहुत ही अच्छे और पॉजिटिव इंसान हैं. उनका काम भी मैं पसंद करती हूँ.दिलीप साहब तो अब काफी बीमार रहते हैं. उन्हें मिलकर क्यों तकलीफ दी जाए. वैसे भी वह लोगों से ज्यादातर मिलते नहीं. जब वे ठीक थे तो कभी कभार मिलना हो जाता था. इन दिनों आपकी क्या दिनचर्या रहती है. पहले तो आप अपने सीरियल भी बना रही थीं. पपेट भी आपने बहुत बनायीं, पपेट शो भी किये. अब भी क्या पपेट आदि बनाती हैं? नहीं अब पपेट नहीं बनाती. मेरे पास अभी भी मेरी बनायी बहुत सी पपेट हैं. लेकिन नयी अब नहीं बनाती. मैं वैसे कुछ न कुछ करती रहती हूँ. मुझे पेट्स पालने का भी पुराना शौक है. इन दिनों मैंने एक बिल्ली को पाला हुआ है. हालांकि इस बिल्ली को मैंने इसलिए रखा कि मेरे ड्राइंग रूम में दो कौवों ने अपना घर बना लिया है. वे मेरे गार्डेन में आते थे तो मैंने उनको कुछ खाना देना शुरू कर दिया. लेकिन यह देख उन्होंने मेरे घर में ही अपना ठिकाना जमा लिया. इससे मैं अब ढंग से सो भी नहीं पाती, बैठ भी नहीं पाती. दोनों कौवे बहुत शोर करते हैं. मैंने इसलिए बिल्ली रखी कि कौवे उससे डर कर भाग जायेंगे लेकिन बिल्ली औए कौवों में दोस्ती हो गयी है. कौवे बिल्ली से डरते ही नहीं, बिल्ली उल्टा उनकी मदद करती है.बिलकुल करती हूँ. हालांकि वह सब मेरा बेहद निजी मामला है. मैं भगवान् की पूजा का प्रदर्शन नहीं करती. मैंने घर में अपना छोटा सा मंदिर भी अपने बेडरूम में बनवाया हुआ है. मैं किसी को उसकी फोटोग्राफी भी नहीं करने देती. लेकिन मैं आपको बताऊँ मेरे मंदिर में आज भी वह शिवलिंग है जो मेरे पापा गोमुख से लाये थे.वह गोमुख जाने वाले पहले लोगों में से थे. तब हम लाहौर में रहते थे. लेकिन जब विभाजन के बाद हम इधर आए तो मैं वह शिवलिंग अपने साथ ले आई. वह शिवलिंग अब 100 साल पुराना हो गया होगा, लेकिन मैंने आज भी उसे बहुत श्रद्दा से अपने पास रखा है. लाहौर से आपकी बहुत सी यादें जुडी हैं, आपका जन्म वहां हुआ, वहीँ आप पलीं-पढ़ीं. आज पाकिस्तान जिस तरह भारत में आए दिन आतंकवादी गतिविधियाँ कर रहा है उसे देख आपको क्या महसूस होता है ? यह सब देखकर बहुत बुरा लगता है वहां के लोग प्यार और शान्ति से क्यों नहीं रहते. जैसे यहाँ भारत में रहते हैं. फर्क क्या है दोनों में सब तालीम एक जैसी है.समझ ही नहीं आता उन्हें तकलीफ क्या है. यह सब वह क्यों कर रहे हैं. हम जब वहां रहते थे हिन्दू -मुस्लिम में कोई फर्क नहीं था. सभी एक दूसरे के त्योहारों में शरीक होते थे. लेकिन हालात ऐसे हो जायेंगे यह कभी नहीं सोचा था.

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