एक ट्रांसजेंडर से महिला बनी शख़्स को क्या महिला माना जाए या नहीं.. इस मामले पर एक ऐतिहासिक फ़ैसला ऑस्ट्रेलिया की अदालत ने दिया है. क्या है वो फ़ैसला आइए जानते हैं.
ऑस्ट्रेलिया की अदालत ने यह फ़ैसला एक ट्रांसजेंडर महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. ट्रांसजेंडर महिला ने अपनी याचिका में सोशल मीडिया ऐप पर लिंग आधारित भेदभाव की शिकायत की थी. उनका आरोप था कि सिर्फ़ महिलाओं के लिए बने एक सोशल मीडिया ऐप ने उन्हें पुरुष मानते हुए उन्हें उस प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं रहने दिया.
ऑस्ट्रेलियाई फे़डरल कोर्ट ने कहा है कि ट्रांसजेंडर महिला रोक्सेन टिकल के साथ कोई सीधे तौर पर भेदभाव नहीं हुआ लेकिन अप्रत्यक्ष तरीके़ से वो भेदभाव का शिकार हुई हैं. कोर्ट ने सोशल मीडिया ऐप पर टिकल को दस हज़ार ऑस्ट्रेलियन डॉलर के साथ केस पर हुए ख़र्च को भी देने का आदेश सुनाया.कोलकाता रेप और मर्डर केस: वो 5 सवाल जिनके जवाब मिलने अभी बाक़ी हैंइमेज कैप्शन,लिंग पहचान के मामले में और ख़ासकर महिला क्या होती है जैसे विवादास्पद मामले में ऑस्ट्रेलियाई फ़ेडरल कोर्ट के इस फै़सले को एक ऐतिहासिक फै़सला माना जा रहा है 2021 में टिकल ने “गिगल फॉर गर्ल्स” नाम की एक सोशल मीडिया ऐप डाउनलोड किया था जो सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही बनाया गया था.इस ऐप पर पुरुषों की एंट्री नहीं थी ताकि महिलाएं एक सुरक्षित स्पेस में खुलकर अपनी बातें और अनुभव शेयर कर सकें. इस ऐप की सदस्यता हासिल करने के लिए अन्य किसी भी महिला की तरह टिकल को भी खुद के महिला होने के सबूत के तौर पर अपनी एक सेल्फ़ी अपलोड करनी पड़ी. इस ऐप पर अपलोड की गई सारी सेल्फ़ियों की छानबीन लिंग पहचान के लिए बने एक विशेष सॉफ्टवेयर से की जाती है ताकि पुरुषों को इस ऐप से बाहर रखा जा सके.इसके ख़िलाफ़ टिकल का दावा था कि चूंकि वो कानूनी तौर पर महिलाओं को मिले सारे अधिकारों के इस्तेमाल के लिए अधिकृत हैं इसलिए इस मामले में वो लिंग आधारित भेदभाव का शिकार हुई हैं. इस फै़सले के खिलाफ़ टिकल ने सोशल मीडिया ऐप की सीईओ सॉल ग्रोवर के खिलाफ़ केस फ़ाइल करते हुए दो लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर हर्जाने की मांग की. हर्जाने के लिए टिकल ने सोशल मीडिया ऐप को "लगातार गलतफहमी" के कारण उनके मन में अक्सर घबराहट, चिंता और सुसाइडल ख्यालों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया. अपने हलफनामे में टिकल का आरोप है, “इस मामले में ग्रोवर के सार्वजनिक बयान मेरे लिए परेशान, हतोत्साहित, शर्मनाक और आहत करने वाले रहे हैं जिसके कारण लोगों ने मेरे प्रति ऑनलाइन नफ़रती कमेन्ट किये.” हालांकि सोशल मीडिया ऐप गिगल की कानूनी टीम ने पूरे मामले में लिंग की एक जैविक अवधारणा होने के तर्क को आगे बढ़ाते हुए टिकल को पुरुष मानने के कारण सिर्फ महिलाओं के लिए बनाए गए इस प्लेटफ़ॉर्म को एक्सेस करने की अनुमति नहीं देने को पूरी तरह से कानूनसंगत बताया. लेकिन जज रॉबर्ट ब्रोमविच ने गिगल के तर्कों को खारिज करते हुए शुक्रवार को अपने फैसले में कहा कि सेक्स "परिवर्तनशील है और ज़रूरी नहीं कि बाइनरी" है. कोर्ट के फैसले पर टिकल ने कहा कि आदेश से साफ है कि महिलायें किसी भी तरह के भेदभाव से सुरक्षित हैं और यह फैसला ट्रांसजेंडर्स और अन्य लोगों के हित में होगा. वहीं सोशल मीडिया एप के सीईओ ग्रोवर ने एक्स पर लिखा कि दुर्भाग्य से यह फैसला हमारे पक्ष में नहीं आया है लेकिन महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई जारी है. “टिकल बनाम गिगल” के नाम से मशहूर यह केस ऑस्ट्रेलिया में इस तरह का पहला केस है जिसमें लिंग आधारित भेदभाव के मामले में किसी अदालत में सुनवाई की गई हो. इस केस से यह भी पता चलता है कि कैसे ट्रांस समावेश बनाम सेक्स-आधारित अधिकार जैसे तीखी वैचारिक बहसों पर भी बहस की जा सकती है.इमेज कैप्शन, सिर्फ महिलाओं के लिए बनी सोशल मीडिया ऐप की सीईओ सॉल ग्रोवर कहती हैं कि वो सिर्फ महिलाओं के लिए एक सुरक्षित ऐप बनाना चाहती थीं टिकल का जन्म तो पुरुष के रूप में हुआ था लेकिन 2017 से वो अपना लिंग परिवर्तन कराकर एक महिला के रूप में रह रही हैं.लेकिन ग्रोवर का मानना है कि जन्म के समय मिले लिंग को कोई भी इंसान लिंग परिवर्तन कराकर अपना जेंडर बदल नहीं सकता. अदालत में ग्रोवर से जिरह करते हुए टिकल के वकील जॉर्जिया कोसटेलों केसी ने पूछा, "आप उन्हें महिला क्यों नहीं स्वीकारते जो जन्म के समय तो पुरुष थे लेकिन बाद में लिंग परिवर्तन की सर्जरी कराने के बाद महिलाओं जैसा जीवन जीते हैं." "पुरुषों के चेहरे जैसे बालों से छुटकारा पा जाते हैं, चेहरे के बदलाव से गुज़रते हैं, अपने बालों को लंबा कर लेते है, महिला की तरह मेकअप कर लेते हैं, महिलाओं के कपड़े भी पहनने लगते है. और खुद को एक महिला के रूप में ही परिचय देने के साथ साथ एक महिला के रूप में ही पेश करते है. यहाँ तक की महिला चेंजिंग रूम का ही उपयोग करते है, अपना जन्म प्रमाण पत्र तक बदल लेते हैं – फिर भी आप उसे महिला क्यों नहीं मानते?"उसने यह भी कहा कि चूंकि टिकल का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ था इसलिए उसे वो एक महिला के रूप में संबोधित नहीं करेंगी. ग्रोवर स्व-घोषित ट्रांस एक्सक्लुज़नरी रेडिकल फेमिनीनिस्ट 'टीईआरएफ' की विचारधारा से प्रभावित हैं जिसे ट्रांस लोगों के लिए विरोधपूर्ण माना जाता है. सोशल मीडिया साइट एक्स पर ग्रोवर लिखती हैं कि 'मुझे एक वो आदमी कोर्ट ले जा रहा है जो है तो पुरुष लेकिन दावा करता है महिला होने का.. क्योंकि वो एक महिलाओं के लिए बने ऐप को जॉइन करना चाहता है." इस ऐप को स्टार्ट करने के बारे में वो कहती हैं कि हॉलिवुड में स्क्रीन राइटर के रूप में काम करते हुए सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ पुरुषों के अपमानजनक टिप्पणियों से आहत होकर उन्होंने 2020 में महिलाओं के लिए विशेष तौर पर “गिगल फॉर गर्ल्स” नाम का एक ऐप बनाया.वो कहती हैं कि सिर्फ एक कानूनी प्रावधान के कारण टिकल महिला हो सकती हैं लेकिन बायोलॉजीकल रूप से वो एक पुरुष ही हैं और हमेशा वही रहेंगे. हमने यह स्टैन्ड महिलाओं की सुरक्षा के साथ साथ एक ज़मीनी सच्चाई के रूप में लिया है जिसे कानून में भी दिखना चाहिएसमलैंगिक विवाह को सुप्रीम कोर्ट की ना, पांच जजों की बेंच में किसने क्या कहा?जिस तरह का मीडिया अटेन्शन इस केस को सुनवाई में मिला है उसके लिहाज़ से यह तय माना जा रहा है कि इसका वैश्विक प्रभाव देखने को मिलेगा इस मामले में आए फ़ैसले का असर दुनिया के दूसरे देशों में लिंग पहचान अधिकारों और लिंग आधारित अधिकारों के मामले में एक कानूनी मिसाल कायम कर सकता है. अदालत में गिगल के वकीलों का तर्क था कि ऑस्ट्रेलिया संयुक्त राष्ट्र संघ में पारित कन्वेंशन ऑन द एलिमिनेशन ऑफ ऑल फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन अगेंस्ट वूमेन संधि पर सहमति देने वाला देश है. इसलिए ऑस्ट्रेलिया को एक लिंग विशेष के लिए बने प्लेटफ़ॉर्म पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य करता है. महिलाओं के प्रति भेदभाव को रोकने और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के मक़सद से संयुक्त राष्ट्र संघ में सीईडीएडब्लू संधि 1979 में पारित की गई थी. इस लिहाज़ से इस मामले पर टिकल के पक्ष में आए फै़सले का असर इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले ब्राज़ील से लेकर भारत और दक्षिण अफ्रीका समेत सभी 189 देशों में पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय संधियों को इंटरप्रेट करने की स्थिति में किसी भी देश की अदालत अक्सर इस बात पर ध्यान देती है कि दूसरे देशों में इन संधियों पर क्या रुख़ रहा है. इसलिए जिस तरह का मीडिया अटेन्शन इस केस को सुनवाई में मिला है उसके लिहाज़ से यह तय माना जा रहा है कि इसका वैश्विक प्रभाव देखने को मिलेगा. और अगर इस तरह के केस बढ़ते हैं तो ऑस्ट्रेलिया कोर्ट का यह फैसला अन्य देशों में भी इस तरह के मामले में उदाहरण बनेगा.समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता देने का अधिकार संसद और विधानसभाओं का: सुप्रीम कोर्टपीएम मोदी के यूक्रेन दौरे पर कैसे समझौते हुए, क्या कह रहा है वहां का मीडियापीएम मोदी के यूक्रेन दौरे के मायने, भारत शांति के लिए क्या रूस को मना सकता है?जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस साथ-साथ, अमित शाह ने पूछे ये सवालनेपाल की नदी में गिरी महाराष्ट्र के यात्रियों से भरी बस, कम से कम 27 की मौतपीएम मोदी के यूक्रेन दौरे पर कैसे समझौते हुए, क्या कह रहा है वहां का मीडियाजम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस साथ-साथ, अमित शाह ने पूछे ये सवालम्यांमार: गांव के गांव बने सेना की ज़्यादतियों के गवाह, प्रत्यक्षदर्शियों ने सुनाईं सामूहिक हत्याओं की दर्दनाक कहानियांबांग्लादेश ने अगर शेख़ हसीना को वापस भेजने के लिए कहा तो भारत क्या करेगा?एक सेक्स वर्कर की कहानी- 'मेरे पहुंचने से पहले वो ड्रग्स ले रहे थे, मुझे लगा मैं बच नहीं पाऊंगी'
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