एम्स दिल्ली में 26 ऑपरेशन थिएटर, 81 आईसीयू और 843 बेड खाली पड़े हैं, जिसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। संसदीय समिति ने रिपोर्ट में चिंता जताई और बंद पड़े ऑपरेशन थिएटर और बेड को तुरंत चालू करने की सिफारिश की है। समिति ने कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और ट्रॉमा विभागों में बेड बढ़ाने की भी सिफारिश की है, साथ ही डॉक्टरों के एम्स छोड़ने के कारणों की जांच की मांग की है। समिति ने दिल्ली-एनसीआर में सैटेलाइट सेंटर बनाने की भी सिफारिश की है ताकि मरीजों का दबाव कम हो सके।
नई दिल्ली: एम्स दिल्ली के 26 मेजर ऑपरेशन थियेटर , 81 आईसीयू और 843 बेड ्स खाली पड़े हैं। एम्स प्रशासन इनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। इसका खुलासा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में किया है। रिपोर्ट में कहा कि एक तरफ मरीजों को ऑपरेशन के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ ओटी बंद पड़े हैं। समिति ने एम्स को तुरंत कदम उठाकर बंद पड़े ऑपरेशन थियेटर और बेड चालू करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और ट्रॉमा विभागों में बेड की संख्या बढ़ाने की तुरंत जरूरत है। क्योंकि भारत में लगभग 30% मौतें दिल की बीमारियों और ब्रेन स्ट्रोक के कारण होती हैं। हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक और सड़क दुर्घटनाओं में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए 'गोल्डन आवर' के अंदर सही इलाज जरूरी है।स्वतंत्र रूप से काम की अनुमति क्यों नहीं?पिछले कुछ सालों में दर्जनों सीनियर डॉक्टर ों ने एम्स छोड़ कर प्राइवेट रूप से सेवा देना शुरू कर दिया है, जिसमें से कई एचओडी पद पर तैनात थे। कई कार्डियोलॉजी विभाग की फैकल्टी ने भी एम्स से नाता तोड़ लिया है। संसदीय समिति ने इस मामले को भी गंभीरता से लिया है और अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि इसकी जांच की जाए कि अनुभवी कार्डियोलॉजिस्ट एम्स क्यों छोड़ रहे हैं या उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति क्यों नहीं मिल रही है? सूत्रों का कहना है कि मामला बहुत गंभीर है, इसकी जांच जरूर होनी चाहिए और वजह का खुलासा भी होना चाहिए। सैटेलाइट सेंटर से AIIMS की 'भीड़' का होगा 'इलाज' एम्स दिल्ली में मरीजों का दबाव कम करने और मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराने की दिशा में संसदीय समिति ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स को दिल्ली-एनसीआर में एम्स के सैटेलाइट सेंटर बनाने की सिफारिश की है। समिति के अनुसार, दिल्ली के पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के अलावा एनसीआर के विभिन्न क्षेत्रों में 100 से 150 बेड वाले छोटे-छोटे एम्स सैटेलाइट सेंटर बनाए जा सकते हैं।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की संसदीय समिति ने की सिफारिशदरअसल, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने एम्स दिल्ली में मरीजों को होने वाली परेशानी, मौजूदा स्थिति और समस्या का हल निकालने के मकसद से अपनी रिपोर्ट दी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली में मरीजों को अक्सर 50-60 किलोमीटर तक सफर करना पड़ता है, जिससे इमरजेंसी की स्थिति में इलाज में देरी हो जाती है। 'गोल्डन आवर' का महत्वऐसे में गुरुग्राम, सोनीपत, बागपत, फरीदाबाद और गाजियाबाद और नोएडा जैसे क्षेत्रों में कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और ट्रॉमा सेंटर स्थापित करना जरूरी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक और सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में 'गोल्डन आवर' के अंदर इलाज मिलना जान बचाने के लिए बहुत जरूरी है। समिति का मानना है कि इन केंद्रों की अनुमानित लागत 150 से 200 करोड़ रुपये हो सकती है। सैटेलाइट केंद्रों में रेजिडेंट डॉक्टर ों की तैनाती रोटेशन के आधार पर की जाए एम्स से जुड़े होने के कारण इन केंद्रों को आम जनता में आसानी से स्वीकार्यता मिलेगी। समिति ने सुझाव दिया है कि इन सैटेलाइट केंद्रों में रेजिडेंट डॉक्टर ों की तैनाती रोटेशन के आधार पर की जाए। ये केंद्र एम्स नई दिल्ली के विस्तार के रूप में काम करेंगे और मरीजों को ओपीडी, जांच और फॉलोअप जैसी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराएंगे।.
नई दिल्ली: एम्स दिल्ली के 26 मेजर ऑपरेशन थियेटर , 81 आईसीयू और 843 बेड्स खाली पड़े हैं। एम्स प्रशासन इनका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। इसका खुलासा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में किया है। रिपोर्ट में कहा कि एक तरफ मरीजों को ऑपरेशन के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ ओटी बंद पड़े हैं। समिति ने एम्स को तुरंत कदम उठाकर बंद पड़े ऑपरेशन थियेटर और बेड चालू करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और ट्रॉमा विभागों में बेड की संख्या बढ़ाने की तुरंत जरूरत है। क्योंकि भारत में लगभग 30% मौतें दिल की बीमारियों और ब्रेन स्ट्रोक के कारण होती हैं। हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक और सड़क दुर्घटनाओं में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए 'गोल्डन आवर' के अंदर सही इलाज जरूरी है।स्वतंत्र रूप से काम की अनुमति क्यों नहीं?पिछले कुछ सालों में दर्जनों सीनियर डॉक्टरों ने एम्स छोड़ कर प्राइवेट रूप से सेवा देना शुरू कर दिया है, जिसमें से कई एचओडी पद पर तैनात थे। कई कार्डियोलॉजी विभाग की फैकल्टी ने भी एम्स से नाता तोड़ लिया है। संसदीय समिति ने इस मामले को भी गंभीरता से लिया है और अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि इसकी जांच की जाए कि अनुभवी कार्डियोलॉजिस्ट एम्स क्यों छोड़ रहे हैं या उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने की अनुमति क्यों नहीं मिल रही है? सूत्रों का कहना है कि मामला बहुत गंभीर है, इसकी जांच जरूर होनी चाहिए और वजह का खुलासा भी होना चाहिए।सैटेलाइट सेंटर से AIIMS की 'भीड़' का होगा 'इलाज'एम्स दिल्ली में मरीजों का दबाव कम करने और मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराने की दिशा में संसदीय समिति ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स को दिल्ली-एनसीआर में एम्स के सैटेलाइट सेंटर बनाने की सिफारिश की है। समिति के अनुसार, दिल्ली के पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के अलावा एनसीआर के विभिन्न क्षेत्रों में 100 से 150 बेड वाले छोटे-छोटे एम्स सैटेलाइट सेंटर बनाए जा सकते हैं।केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की संसदीय समिति ने की सिफारिशदरअसल, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने एम्स दिल्ली में मरीजों को होने वाली परेशानी, मौजूदा स्थिति और समस्या का हल निकालने के मकसद से अपनी रिपोर्ट दी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली में मरीजों को अक्सर 50-60 किलोमीटर तक सफर करना पड़ता है, जिससे इमरजेंसी की स्थिति में इलाज में देरी हो जाती है। 'गोल्डन आवर' का महत्वऐसे में गुरुग्राम, सोनीपत, बागपत, फरीदाबाद और गाजियाबाद और नोएडा जैसे क्षेत्रों में कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और ट्रॉमा सेंटर स्थापित करना जरूरी है। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक और सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में 'गोल्डन आवर' के अंदर इलाज मिलना जान बचाने के लिए बहुत जरूरी है। समिति का मानना है कि इन केंद्रों की अनुमानित लागत 150 से 200 करोड़ रुपये हो सकती है। सैटेलाइट केंद्रों में रेजिडेंट डॉक्टरों की तैनाती रोटेशन के आधार पर की जाएएम्स से जुड़े होने के कारण इन केंद्रों को आम जनता में आसानी से स्वीकार्यता मिलेगी। समिति ने सुझाव दिया है कि इन सैटेलाइट केंद्रों में रेजिडेंट डॉक्टरों की तैनाती रोटेशन के आधार पर की जाए। ये केंद्र एम्स नई दिल्ली के विस्तार के रूप में काम करेंगे और मरीजों को ओपीडी, जांच और फॉलोअप जैसी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराएंगे।
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