आखिरी वोटिंग के साथ मतगणना की तैयारियां शुरू | DW | 19.05.2019

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आखिरी वोटिंग के साथ मतगणना की तैयारियां शुरू | DW | 19.05.2019
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LokSabhaElections2019 के आखिरी चरण में 10.1 करोड़ मतदाता 59 सीटों के लिए अपने नुमाइंदों का चुनाव कर रहे हैं.

वोट देने से पहले जान लें कैसे काम करती है ईवीएम1982 में केरल विधानसभा के उपचुनावों में पहली बार 50 मतदान केंद्रों में ईवीएम का इस्तेमाल किया गया. यह एक टेस्ट फेज था. फिर 1998 में 16 विधानसभा क्षेत्रों में ईवीएम लगाई गईं.

इनमें से पांच मध्य प्रदेश में, पांच राजस्थान में और छह दिल्ली में थीं. ये मशीनें 1989 से 1990 के बीच बनाई गई थीं. साल 2000 के बाद से तीन लोकसभा चुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल हो चुका है.भारत में इस्तेमाल होने वाली वोटिंग मशीनें वाईफाई या किसी भी तरह के नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती हैं और ना ही एक मशीन दूसरी से कनेक्टेड होती है. चुनाव आयोग के अनुसार इस वजह से इन पर हैकिंग का खतरा नहीं रहता है. हर मशीन अपने आप में एकल डिवाइस है. एक मशीन के खराब होने का पूरी चुनावी प्रक्रिया पर कोई असर नहीं होता.वोटिंग का सारा डाटा एक माइक्रो चिप में सुरक्षित होता है. इस चिप के साथ ना तो कोई छेड़छाड़ की जा सकती है और ना ही रीराइट किया जा सकता है. यही ईवीएम को फूल प्रूफ भी बनाता है. लेकिन बावजूद इसके 2014 के लोकसभा चुनावों में धांधली के आरोप लगते रहे हैं. हालांकि इन्हें सिद्ध नहीं किया जा सका है.जिस किसी ने ईवीएम इस्तेमाल किया है या फिर उसकी तस्वीर देखी है, वह समझ सकता है कि हर पार्टी के निशान के सामने एक बटन होता है. एक व्यक्ति एक ही बार बटन दबा सकता है. इसके बाद मशीन लॉक हो जाती है. बार बार बटन दबाने से वोटिंग दोबारा नहीं होती है.हर मशीन में एक बैलेटिंग यूनिट होती है और एक कंट्रोल यूनिट. बैलेटिंग यूनिट के जरिए मतदाता अपना वोट देता है और कंट्रोल यूनिट के जरिए पोलिंग अधिकारी मशीन को लॉक करता है. मतदान पूरा होने के बाद जो लॉक का बटन दबाया जाता है, उसके बाद मशीन कोई डाटा नहीं स्वीकारती.एक ईवीएम में अधिकतम 3,840 वोट जमा किए जा सकते हैं. मतदान केंद्रों की योजना इस तरह से बनाई जाती है कि एक केंद्र में 1400 से ज्यादा मतदाताओं को आने की जरूरत ना पड़े. इस तरह से लोगों को घंटों लंबी लाइनों में नहीं लगना पड़ता है. और इसका मतलब यह भी है कि हर मशीन बूथ की क्षमता से दोगुना से भी ज्यादा लोगों के वोट जमा कर सकती है.एक मशीन में 16 उम्मीदवार दर्ज किए जा सकते हैं. लेकिन अगर उम्मीदवारों की सूची इससे लंबी हो तो एक और मशीन को साथ में जोड़ा जा सकता है. इसी तरह अगर 32 में भी सूची पूरी ना हो रही हो तो एक तीसरी और चौथी मशीन को भी कनेक्ट किया जा सकता है. लेकिन ईवीएम की सीमा 64 है यानी पांचवीं मशीन को नहीं जोड़ा जा सकता. वैसे, अब तक इसकी जरूरत भी नहीं पड़ी है.वोटिंग मशीन हो या फिर बैलेट पेपर, पार्टी के निशान किस क्रम में लगाए जाएंगे ये इस पर निर्भर करता है कि नामांकन कब दाखिल किया गया था और कब उसकी जांच पूरी हुई. इस प्रक्रिया को पहले से निर्धारित नहीं किया जा सकता. इसलिए पहले से किसी के लिए भी पार्टी के क्रम को जानना और मशीन को उस हिसाब से सेट करना संभव नहीं होता.कौन सी मशीनें किस मतदान केंद्र में पहुंचेंगी इसकी जानकारी भी गुप्त रखी जाती है. मशीनें दो चरणों में चुनी जाती हैं और वो भी बेतरतीब ढंग से ताकि योजनाबद्ध उन्हें किसी एक केंद्र में ना भेजा जा सके. पहला चरण कंप्यूटर के हाथ में होता है और दूसरा पोलिंग अधिकारी के हाथ में.हर मशीन का एक क्रमांक होता है. इनके आधार पर एक सूची बनाई जाती है. फिर पहले चरण में कंप्यूटर इस सूची में से अनियमित रूप से कुछ मशीनों को चुनता है. इसे फर्स्ट लेवेल रैंडमाइजेशन कहा जाता है. दूसरे चरण में अधिकारी अपने पोलिंग बूथ के लिए कुछ मशीनों को साथ ले कर जाता है. ये सेकंड लेवेल रैंडमाइजेशन कहलाता है.2010 में चुनाव आयोग ने वीवीपैट यानी वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल की शुरुआत की. इसके तहत वोट डालने के बाद हर मतदाता को उम्मीदवार के नाम और चुनाव चिह्न वाली एक पर्ची मिलती है ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वोट सही डला है. वीवीपैट का इस्तेमाल पहली बार 2013 में नागालैंड के उपचुनाव में हुआ. जून 2014 में चुनाव आयोग ने इसे 2019 लोकसभा चुनावों में हर पोलिंग बूथ पर लागू करने का आदेश दिया.दुनिया भर के 31 देशों में ईवीएम का इस्तेमाल हो चुका है. लेकिन भारत के अलावा केवल ब्राजील, भूटान और वेनेजुएला ही देश भर में इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. जर्मनी, नीदरलैंड्स और पराग्वे में इनका इस्तेमाल शुरू किया गया और फिर रोक लगा दी गई. जर्मनी और नीदरलैंड्स के अलावा इंग्लैंड और फ्रांस में भी ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता है. हालांकि वहां इस पर रोक नहीं लगाई गई है.2009 में जर्मनी की एक अदालत ने कहा कि कंप्यूटर आधारित इस सिस्टम को समझने के लिए प्रोग्रामिंग की जानकारी होना जरूरी है, जो आम नागरिकों के पास नहीं हो सकती, इसलिए मतदान का यह तरीका पारदर्शी नहीं है. अमेरिका में फैक्स या ईमेल के जरिए ई-वोटिंग की जा सकती है लेकिन मशीनों का इस्तेमाल वहां भी नहीं होता.

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