गुवाहाटी: असम विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के नेतृत्व में बने विपक्षी गठबंधन की परीक्षा राज्य के विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच होगी। ऊपरी और निचले असम में अलग-अलग चुनौतियाँ हैं, जबकि विकास और नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दे भी नतीजों पर असर डालेंगे।
गुवाहाटी : असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस समेत 6 विपक्षी दलों ने मिलकर जो गठबंधन तैयार किया है, वह रणनीतिक तौर पर भले मजबूत दिखता हो, लेकिन उसकी परीक्षा राज्य के अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण ों के बीच होगी। 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े कांग्रेस के लिए उम्मीद और चुनौती, दोनों का संकेत देते हैं। उस समय असम जातीय परिषद और रायजोर दल ने अलग चुनाव लड़कर करीब 5% वोट हासिल किए थे। इस बार इन दलों का गठबंधन में शामिल होना कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है।ऊपरी असम से उम्मीदक्षेत्रीय आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। पिछले चुनाव में ऊपरी असम की 28 सीटों में से BJP और उसके सहयोगियों ने 23 पर जीत दर्ज की थी। वहीं, कांग्रेस गठबंधन को महज 3 सीटों पर जीत मिली थी। यह क्षेत्र BJP का मजबूत गढ़ बनकर उभरा था। इसके उलट निचले असम में कांग्रेस और सहयोगियों का प्रदर्शन बेहतर रहा था, जहां उसने 43 में से 25 सीटें अपने नाम की थीं। अपर और डाउन असम का समीकरणऊपरी असम में इस बार विपक्षी गठबंधन को कुछ नई उम्मीदें हैं। यहां अहोम समुदाय का प्रभाव है और गठबंधन के तीन प्रमुख चेहरे - गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिनज्योति गोगोई इसी समुदाय से आते हैं। इससे कांग्रेस को सामाजिक आधार मजबूत करने में मदद मिल सकती है। निचले असम में कांग्रेस पारंपरिक रूप से मजबूत रही है, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। यहां विपक्षी गठबंधन को एकजुट वोट मिलने की संभावना ज्यादा है, लेकिन BJP इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण की राजनीति के जरिए चुनौती पेश करती रही है। ऐसे में कांग्रेस को अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए सामाजिक संतुलन साधना होगा। बराक घाटी भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी। यहां बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दे यहां पहले भी असर डाल चुके हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को फिर से उठा सकती है।JMM से वोटों का बंटवाराविकास का मुद्दा पूरे असम में BJP के पक्ष में जाता दिख रहा है। पिछले 10 वर्षों में सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचे में सुधार ने खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा प्रभाव डाला है। कई परियोजनाओं की शुरुआत भले ही कांग्रेस शासन में हुई हो, लेकिन उनका राजनीति क लाभ BJP को मिल रहा है। इसके अलावा चाय बागान श्रमिकों को भूमि पट्टा देने जैसे फैसले BJP के लिए बड़े चुनावी हथियार हैं। वहीं, कांग्रेस के लिए एक और चिंता झारखंड मुक्ति मोर्चा है, जिसने 18 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में JMM की मौजूदगी वोटों का बंटवारा कर सकती है, जिससे कांग्रेस और BJP - दोनों के समीकरण प्रभावित होंगे।असम में कांग्रेस का हालसीट बंटवारे के तहत कांग्रेस 126 में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि बाकी सीटें सहयोगी दलों को दी गई हैं। यह कांग्रेस की प्रमुख भूमिका को दर्शाता है, लेकिन यह भी जरूरी है कि गठबंधन के सभी दल जमीनी स्तर पर पूरी मजबूती से एक-दूसरे का समर्थन करें। कुल मिलाकर, असम में कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ गठबंधन बनाने भर का नहीं, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से लागू करने की चुनौती का भी है।.
गुवाहाटी : असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस समेत 6 विपक्षी दलों ने मिलकर जो गठबंधन तैयार किया है, वह रणनीतिक तौर पर भले मजबूत दिखता हो, लेकिन उसकी परीक्षा राज्य के अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के बीच होगी। 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े कांग्रेस के लिए उम्मीद और चुनौती, दोनों का संकेत देते हैं। उस समय असम जातीय परिषद और रायजोर दल ने अलग चुनाव लड़कर करीब 5% वोट हासिल किए थे। इस बार इन दलों का गठबंधन में शामिल होना कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है।ऊपरी असम से उम्मीदक्षेत्रीय आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। पिछले चुनाव में ऊपरी असम की 28 सीटों में से BJP और उसके सहयोगियों ने 23 पर जीत दर्ज की थी। वहीं, कांग्रेस गठबंधन को महज 3 सीटों पर जीत मिली थी। यह क्षेत्र BJP का मजबूत गढ़ बनकर उभरा था। इसके उलट निचले असम में कांग्रेस और सहयोगियों का प्रदर्शन बेहतर रहा था, जहां उसने 43 में से 25 सीटें अपने नाम की थीं। अपर और डाउन असम का समीकरणऊपरी असम में इस बार विपक्षी गठबंधन को कुछ नई उम्मीदें हैं। यहां अहोम समुदाय का प्रभाव है और गठबंधन के तीन प्रमुख चेहरे - गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिनज्योति गोगोई इसी समुदाय से आते हैं। इससे कांग्रेस को सामाजिक आधार मजबूत करने में मदद मिल सकती है। निचले असम में कांग्रेस पारंपरिक रूप से मजबूत रही है, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। यहां विपक्षी गठबंधन को एकजुट वोट मिलने की संभावना ज्यादा है, लेकिन BJP इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण की राजनीति के जरिए चुनौती पेश करती रही है। ऐसे में कांग्रेस को अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए सामाजिक संतुलन साधना होगा। बराक घाटी भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाएगी। यहां बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम जैसे मुद्दे यहां पहले भी असर डाल चुके हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को फिर से उठा सकती है।JMM से वोटों का बंटवाराविकास का मुद्दा पूरे असम में BJP के पक्ष में जाता दिख रहा है। पिछले 10 वर्षों में सड़कों, पुलों और बुनियादी ढांचे में सुधार ने खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा प्रभाव डाला है। कई परियोजनाओं की शुरुआत भले ही कांग्रेस शासन में हुई हो, लेकिन उनका राजनीतिक लाभ BJP को मिल रहा है। इसके अलावा चाय बागान श्रमिकों को भूमि पट्टा देने जैसे फैसले BJP के लिए बड़े चुनावी हथियार हैं। वहीं, कांग्रेस के लिए एक और चिंता झारखंड मुक्ति मोर्चा है, जिसने 18 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में JMM की मौजूदगी वोटों का बंटवारा कर सकती है, जिससे कांग्रेस और BJP - दोनों के समीकरण प्रभावित होंगे।असम में कांग्रेस का हालसीट बंटवारे के तहत कांग्रेस 126 में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि बाकी सीटें सहयोगी दलों को दी गई हैं। यह कांग्रेस की प्रमुख भूमिका को दर्शाता है, लेकिन यह भी जरूरी है कि गठबंधन के सभी दल जमीनी स्तर पर पूरी मजबूती से एक-दूसरे का समर्थन करें। कुल मिलाकर, असम में कांग्रेस के लिए यह चुनाव सिर्फ गठबंधन बनाने भर का नहीं, बल्कि उसे प्रभावी तरीके से लागू करने की चुनौती का भी है।
असम चुनाव कांग्रेस विपक्षी गठबंधन क्षेत्रीय समीकरण BJP
