World Politics: 2024 एक चुनावी साल रहा है। दुनिया के 10 सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से आठ में 2024 चुनावी साल है। इनमें भी भारत समेत कई देशों में चुनाव संपन्न हो चुके हैं।
इस साल किन बड़े देशों में चुनाव हुए? 2024 एक चुनावी साल रहा है। टाइम्स पत्रिका की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल विश्व स्तर पर इतिहास में पहले से कहीं अधिक मतदाता चुनाव में भाग लेंगे। अकेले यूरोप में कम से कम 64 देशों में राष्ट्रीय चुनाव हैं, जो दुनिया में लगभग 49% लोगों की कुल आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुनिया के 10 सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से आठ में 2024 में चुनाव में निर्धारित थे। ये देश हैं - बांग्लादेश, ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, मैक्सिको, पाकिस्तान, रूस और अमेरिका। हालांकि, इनमें से ज्यादातर देशों में चुनाव संपन्न हो चुके हैं। इसके अलावा, फ्रांस, ब्रिटेन, ईरान और यूरोपीय संघ के चुनाव भी इसी साल हुए हैं। कहां कैसे रहे नतीजे? फ्रांस: फ्रेंच मतदाताओं ने 30 जून और 7 जुलाई को दो चरणों में नेशनल असेंबली सांसदों के चुनाव के लिए मतदान किया। यहां संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली की कुल 577 सीटों पर चुनाव हुए जिनमें बहुमत के लिए 289 सीटें जरूरी होती हैं। फ्रांस के इस चुनाव में तमाम बड़े दल गठबंधन के तहत उतरे थे। रविवार को हुए दूसरे दौर के मतदान के बाद वामपंथी गठबंधन न्यू पॉपुलर फ्रंट ने फ्रांसीसी संसद में सर्वाधिक सीटें जीत लीं। इसने दक्षिणपंथी गठबंधन को पटखनी दी। वामपंथी न्यू पॉपुलर फ्रंट ने 182 सीटें जीतीं, जबकि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के मध्यमार्गी एनसेम्बल गठबंधन ने 163 सीटें जीतीं। वहीं पहले चरण में बढ़त हासिल करने वाली अति दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली और उसके सहयोगी दल 143 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर खिसक गए। नेशनल रैली पार्टी का नेतृत्व अति दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन कर रही हैं। इन नतीजों के बाद फ्रांस राजनीतिक अनिश्चितता में फंस गया है, क्योंकि कोई भी गठबंधन पूर्ण बहुमत हासिल करने के करीब नहीं पहुंच पाया है। ईरान: पिछले हफ्ते ईरान की जनता ने भी अपना जनादेश सुनाया। देश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए 28 जून और 5 जुलाई को मतदान कराए गए, जिसमें सुधारवादी नेता मसूद पेजेशकियन ने जीत हासिल की। 19 मई को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मृत्यु के बाद ईरान में समय से पहले चुनाव हुए। चार उम्मीदवारों ने चुनाव के पहले दौर में चुनाव लड़ा, जिसमें 6 जुलाई को आए नतीजों में सुधारवादी मसूद पेजेशकियन ने कट्टरपंथी नेता सईद जलीली को हराकर जीत हासिल की। इस जीत के साथ ही पेजेशकियन ने ईरान के नए राष्ट्रपति का पद संभाल लिया है। ब्रिटेन: 4 जुलाई को ब्रिटेन में 650 संसदीय सीटों के लिए मतदान हुआ। ये चुनाव यूनाइटेड किंगडम के सभी हिस्सों इंग्लैंड, उत्तरी आयरलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स में हुए। 6 जुलाई को ब्रिटेन चुनाव के अंतिम नतीजे घोषित किए गए। इन चुनावों में कुल 392 पंजीकृत पार्टियां रहीं लेकिन मुख्य मुकाबला ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव और मुख्य विपक्षी नेता कीर स्टार्मर की लेबर पार्टी के बीच हुआ। विपक्षी लेबर पार्टी ने 650 में से 412 सीटें जीत ली हैं। वहीं मौजूदा सत्ताधारी दल कंजर्वेटिव महज 121 सीटें जीत सकी। वहीं अन्य छोटे दलों की बात करें तो लिबरल डेमोक्रेट्स ने 71, स्कॉटिश नेशनल पार्टी नौ, सिन फेन सात, डेमोक्रेटिक यूनियनिस्ट पार्टी पांच और रिफॉर्म पार्टी ने चार सीटें जीतीं। बड़े विपक्षी दल लेबर ने 2005 के बाद ब्रिटिश चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज की। लेबर पार्टी को भारी जीत दिलाने के बाद कीर स्टार्मर देश के नए प्रधानमंत्री बन गए हैं। यूरोपीय संघ: कुल 27 देशों वाले यूरोपीय संघ में लोगों ने 6-9 जून को वोट किया। 44 करोड़ से अधिक आबादी वाले यूरोपीय संघ में कुल 720 यूरोपीय संसद सदस्य चुने जाते हैं। 9 जून 2024 को उर्सुला वॉन डेर लेयेन के नेतृत्व वाली यूरोपीय पीपुल्स पार्टी ने यूरोपीय संसद में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। इन चुनावों में मध्यमार्गी, उदारवादी और पर्यावरणवादी पार्टियों को नुकसान हुआ, जबकि दक्षिणपंथी दलों को फायदा हुआ। दक्षिणपंथी यूरोपीय कंजर्वेटिव और सुधारवादी समूह ने मध्यमार्गी रिन्यू यूरोप समूह को पछाड़ा। पाकिस्तान: पड़ोसी देश में 8 फरवरी को नेशनल असेंबली के लिए वोट डाले गए थे। नेशनल असेंबली पाकिस्तान की संसद का निचला सदन है जो सरकार के प्रति जवाबदेह होता है। 24 करोड़ वाले पकिस्तान में चुनाव से पहले कार्यवाहक सरकार चल रही थी। ये चुनाव पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के प्रधानमंत्री इमरान खान को अविश्वास प्रस्ताव के जरिए पद से हटाए जाने के बाद दो साल बाद ये चुनाव हुए थे। इसके बाद इमरान खान को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया और दोषी ठहराया गया और पांच साल के लिए राजनीति से प्रतिबंधित कर दिया गया। चुनावों से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने पीटीआई से उनके चुनाव चिह्न को भी छीन लिया। इन सब घटनाक्रमों के बावजूद चुनाव नतीजे आए तो मौजूदा सरकार के खिलाफ उतरे पीटीआई समर्थित निर्दलीय उम्मीदवारों को सबसे ज्यादा 93 सीटें आईं। इसके बाद पाकिस्तान मुस्लिम लीग को 75 और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को 54 सीटें मिलीं। नेशनल असेंबली में किसी भी पार्टी को बहुमत हासिल नहीं होने पर, पीपीपी, पीएमएल-एन समेत अन्य छोटे दलों के समर्थन से शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बने। बांग्लादेश: देश में इस साल की शुरुआत में 7 जनवरी को ही आम चुनाव हुए थे। 17 करोड़ से अधिक आबादी वाले बांग्लादेश में राष्ट्रीय संसद के लिए लोगों ने मतदान किया। इस चुनाव में प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने लगातार चौथी बार चुनाव जीता। हसीना की अवामी लीग केंद्र और मध्य-वामपंथी पार्टी मानी जाती है। राजनीतिक असंतोष पर हुई कार्रवाई के विरोध में देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया। मध्य-दक्षिणपंथी दल का मानना था कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में असमर्थ है। .
..तो क्या दुनियाभर में किसी खास विचारधारा की हार या जीत हो रही है? जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफेसर संजय पांडे कहते हैं, 'ब्रिटेन में लेबर पार्टी की जीत हुई है जिसे वामपंथी नहीं कहा जा सकता है। जेरेमी कोर्बिन होते तो उन्हें वामपंथी कहा जाता। फ्रांस में भी अति वामपंथी दलों को बहुमत नहीं मिला है। यदि इन्हें सरकार बनाना है तो अन्य विचारधारा वाले लोगों से गठबंधन करना होगा। ऐसे में इन्हें अपनी नीतियां भी बदलनी होगी। इसके अलावा ईरान में सुधारवादी नेता मसूद पेजेशकियन की जीत हुई है लेकिन ये मानना कि वो ईरान की सत्ता से अलग हटकर सुधार कर देंगे, मुझे ऐसा नहीं लगता। क्योंकि यहां गार्जियन काउंसिल की अनुमति के बिना कोई कानून नहीं बनता जिस पर ईरान के सर्वोच्च नेता पर प्रभाव होता है। एक तरह से ये मध्यमार्गी सरकारें होंगी।' दुनियाभर में किसी विचारधारा की हार या जीत के प्रश्न पर प्रोफेसर संजय कहते हैं, 'हाल के चुनाव कोई ऐसा ट्रेंड नहीं दिखता है कि दुनियाभर में किसी खास विचारधारा के लोग हार रहे हैं। इसे सरकारों के खिलाफ गुस्सा के तौर पर देखा जाना चाहिए। अपने 10 साल तक शासन किया, लोगों की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए तो लोगों ने बदलाव के लिए मतदान किया है। भारत और दक्षिण अफ्रीका में सरकारें दोबारा आई हैं लेकिन बहुमत से दूर रही हैं। इन्हें बाकी दलों का सहारा लेना पड़ा है जो नीतियों में असर डालता है।'
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