UP News : स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा-अंग्रेजी जानकर विद्वान नहीं बना जा सकता...विद्या केवल संस्कृत से ही आती है

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Meerut News मेरठ के भामाशाह पार्क में श्रीराम कथा के छठे दिन स्वामी रामभद्राचार्य महाराज ने संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने राम-केवट संवाद का वर्णन किया और कहा कि भगवान राम का स्वभाव अद्वितीय है। स्वामी जी ने जीवन में विद्या दान और धर्म के महत्व को...

जागरण संवाददाता, मेरठ। दिव्य शक्ति ट्रस्ट द्वारा भामाशाह पार्क में आयोजित श्रीराम कथा के छठे दिन शनिवार को पद्म विभूषण स्वामी रामभद्राचार्य महाराज ने शनिवार को एक बार फिर दोहराया कि भारतीय संस्कृति को जानने के लिए संस्कृत बहुत आवश्यक है। कहा कि संस्कृत के बिना वैदिक संस्कृति को नहीं जान सकते। रामभद्राचार्य जी ने तल्ख लहजे में व्यासपीठ से कहा कि कहां तक मेरा मुंह बंद करोगे और तुम होते कौन हो मेरा मुंह बंद करने वाले। मैं तो संस्कृत और संस्कृति का ऐसे ही प्रचार करता रहूंगा। रामभद्राचार्य जी ने चींटी और कुत्ते की कहानी का किस्सा उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों के बीच जब कोई तुलना ही नहीं है, वो क्या बात करेंगे। रामचरितमानस और वेद से लेकर हनुमान चालीसा तक सबका आधार संस्कृत ही है। विद्या केवल संस्कृत से ही आती है। अंग्रेजी जानकर विद्वान नहीं बना जा सकता। मुक्ति केवल दो ही भाषा दे सकती हैं - देवभाषा और महादेव भाषा । जिस मनुष्य में सात गुण नहीं, वह भार के समान स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि कथा में जो लोग मौजूद रहकर कथा सुनते हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इसकी गंभीरता अलग ही है। भगवान श्रीराम चंद्र जी के स्वभाव जैसा कोई दूसरा नहीं है। भगवान रामचंद्रजी जी को काक भूसुंडी जी ने 27 बार अवतार लेते देखा है। केवट ने भी भगवान राम के चरण 27 बार धोए थे। सभी में राम जी का स्वभाव प्रबल है। राम-केवट प्रसंग को बडे ही सुंदर ढंग से वर्णन किया। कथा में आगे कहा कि जैसे हमारी माला में 108 मोती होते हैं, वैसे ही श्रीरामचरितमानस में 108 प्रसंग हैं। स्वामी जी ने कहा कि राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। जिसके जीवन में विद्या, दान, ज्ञान, शील, आचरण, गुण, धर्म समेत सात तत्व नहीं हैं, वह पृथ्वी पर भार के समान हैं, उसका जीवन व्यर्थ है और वह मनुष्य के रूप में धरती पर घूमने वाले केवल पशु हैं। इस संसार में केवल धर्म ही है जो पत्नी और बहन में अंतर करता है। प्रभाव से भय होता है और स्वभाव से व्यक्ति निर्भय बनता है। स्वामी जी ने कहा कि यह कथा विक्टोरिया पार्क में अग्निकांड की उन मृतक आत्माओं को शांति प्रार्थना और हमारी श्रद्धांजलि है, जिनकी अग्निकांड में असमय जान चली गई थी। पितृ पक्ष में आयोजित हुई इस कथा से सभी दिवंगत आत्माओं को प्रभु श्रीरामचंद्र जी के चरणों में स्थान मिलेगा। कथाव्यास ने अपने जीवनकाल को स्मरण करते हुए कहा कि मुझे दो माह के भीतर जब रामायण को कंठस्थ कराया था, तभी मैंने प्रण लिया था कि कथा का कोई पैसा नहीं लूंगा। यदि मैंने एक पैसा भी अपने उपर खर्च किया कि तो मुझे उतना ही पाप लगे कि जितना आस्तिक मनुष्य को गोमांस छूने से लगता है। महाराज श्री ने कहा कि कथा में भीड का क्या काम, जितने होंगे उतने ही सुनेंगे। जो सबको देने वाले हैं, वह आज केवट से नाव मांग रहे हैं स्वामी रामभद्राचार्य ने शनिवार की कथा में मुख्य रूप से केवट और प्रभु श्रीराम के बीच संवाद को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जो सारे संसार की नैय्या पार करते हैं, आज वही केवट से नाव मांग रहे हैं। जो सबको मंगल देते रहते हैं, जो दान शिरोमणि हैं, वही आज साधारण से केवट के सामने नाव मांग रहे हैं। यह राम जी का प्रभाव नहीं, उनका स्वभाव है। भगवान नाव मांग रहे हैं और केवट जिद पर अडा है। जिनका स्मरण या नाम मात्र से भवसागर पार करा देता है, वह केवट से विनम्र, सहज, सरल होकर गंगा जी पार करने के लिए विनती कर रहे हैं। संवाद करते हुए केवट भी पूरी तल्लीनता से भगवान श्रीरामचंद्र जी के दर्शन कर रहा है। केवट ने कहा कि भगवान आज मैं धन्य हो गया और मैं आपका मर्म भी जान गया। प्रभु श्रीराम चंद्र जी कहते हैं कि मेरे पास उतराई में देने के लिए धन नहीं है। केवट कहता है - नाव में बैठाने से पहले प्रभु मैं आपके चरण पखारूंगा। जब केवट चरण पखारता है और धीरे-धीरे कथा प्रसंग आगे बढ़ते हुए राम जी के गंगा पार तक ले जाने का सत्र संपन्न होता है। यह भजन गाए - - राघव चरण जल जात हो, आज केवट पखारे चरण, छोटे से कठोते में पानी आन गंगाजी को - राघव तुम बिन सूनी मोरी नैय्या, आवहो आवहो आवहो - मेरे राघव जी उतरेंगे पार, गंगा मैय्या धीरे बहो ये रहे मौजूद : आचार्य रामचंद्र दास जी, लाड़लीनंद सरस्वती, पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल, पूर्व विधायक रविंद्र भड़ाना, महावीर अग्रवाल, हर्ष गोयल, नमन अग्रवाल, अखिल मुद्गल, मनीष लोइया, मनोज, ऋषि व अन्य मौजूद रहे।.

जागरण संवाददाता, मेरठ। दिव्य शक्ति ट्रस्ट द्वारा भामाशाह पार्क में आयोजित श्रीराम कथा के छठे दिन शनिवार को पद्म विभूषण स्वामी रामभद्राचार्य महाराज ने शनिवार को एक बार फिर दोहराया कि भारतीय संस्कृति को जानने के लिए संस्कृत बहुत आवश्यक है। कहा कि संस्कृत के बिना वैदिक संस्कृति को नहीं जान सकते। रामभद्राचार्य जी ने तल्ख लहजे में व्यासपीठ से कहा कि कहां तक मेरा मुंह बंद करोगे और तुम होते कौन हो मेरा मुंह बंद करने वाले। मैं तो संस्कृत और संस्कृति का ऐसे ही प्रचार करता रहूंगा। रामभद्राचार्य जी ने चींटी और कुत्ते की कहानी का किस्सा उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों के बीच जब कोई तुलना ही नहीं है, वो क्या बात करेंगे। रामचरितमानस और वेद से लेकर हनुमान चालीसा तक सबका आधार संस्कृत ही है। विद्या केवल संस्कृत से ही आती है। अंग्रेजी जानकर विद्वान नहीं बना जा सकता। मुक्ति केवल दो ही भाषा दे सकती हैं - देवभाषा और महादेव भाषा । जिस मनुष्य में सात गुण नहीं, वह भार के समान स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि कथा में जो लोग मौजूद रहकर कथा सुनते हैं, वह बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इसकी गंभीरता अलग ही है। भगवान श्रीराम चंद्र जी के स्वभाव जैसा कोई दूसरा नहीं है। भगवान रामचंद्रजी जी को काक भूसुंडी जी ने 27 बार अवतार लेते देखा है। केवट ने भी भगवान राम के चरण 27 बार धोए थे। सभी में राम जी का स्वभाव प्रबल है। राम-केवट प्रसंग को बडे ही सुंदर ढंग से वर्णन किया। कथा में आगे कहा कि जैसे हमारी माला में 108 मोती होते हैं, वैसे ही श्रीरामचरितमानस में 108 प्रसंग हैं। स्वामी जी ने कहा कि राष्ट्र के लिए सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। जिसके जीवन में विद्या, दान, ज्ञान, शील, आचरण, गुण, धर्म समेत सात तत्व नहीं हैं, वह पृथ्वी पर भार के समान हैं, उसका जीवन व्यर्थ है और वह मनुष्य के रूप में धरती पर घूमने वाले केवल पशु हैं। इस संसार में केवल धर्म ही है जो पत्नी और बहन में अंतर करता है। प्रभाव से भय होता है और स्वभाव से व्यक्ति निर्भय बनता है। स्वामी जी ने कहा कि यह कथा विक्टोरिया पार्क में अग्निकांड की उन मृतक आत्माओं को शांति प्रार्थना और हमारी श्रद्धांजलि है, जिनकी अग्निकांड में असमय जान चली गई थी। पितृ पक्ष में आयोजित हुई इस कथा से सभी दिवंगत आत्माओं को प्रभु श्रीरामचंद्र जी के चरणों में स्थान मिलेगा। कथाव्यास ने अपने जीवनकाल को स्मरण करते हुए कहा कि मुझे दो माह के भीतर जब रामायण को कंठस्थ कराया था, तभी मैंने प्रण लिया था कि कथा का कोई पैसा नहीं लूंगा। यदि मैंने एक पैसा भी अपने उपर खर्च किया कि तो मुझे उतना ही पाप लगे कि जितना आस्तिक मनुष्य को गोमांस छूने से लगता है। महाराज श्री ने कहा कि कथा में भीड का क्या काम, जितने होंगे उतने ही सुनेंगे। जो सबको देने वाले हैं, वह आज केवट से नाव मांग रहे हैं स्वामी रामभद्राचार्य ने शनिवार की कथा में मुख्य रूप से केवट और प्रभु श्रीराम के बीच संवाद को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जो सारे संसार की नैय्या पार करते हैं, आज वही केवट से नाव मांग रहे हैं। जो सबको मंगल देते रहते हैं, जो दान शिरोमणि हैं, वही आज साधारण से केवट के सामने नाव मांग रहे हैं। यह राम जी का प्रभाव नहीं, उनका स्वभाव है। भगवान नाव मांग रहे हैं और केवट जिद पर अडा है। जिनका स्मरण या नाम मात्र से भवसागर पार करा देता है, वह केवट से विनम्र, सहज, सरल होकर गंगा जी पार करने के लिए विनती कर रहे हैं। संवाद करते हुए केवट भी पूरी तल्लीनता से भगवान श्रीरामचंद्र जी के दर्शन कर रहा है। केवट ने कहा कि भगवान आज मैं धन्य हो गया और मैं आपका मर्म भी जान गया। प्रभु श्रीराम चंद्र जी कहते हैं कि मेरे पास उतराई में देने के लिए धन नहीं है। केवट कहता है - नाव में बैठाने से पहले प्रभु मैं आपके चरण पखारूंगा। जब केवट चरण पखारता है और धीरे-धीरे कथा प्रसंग आगे बढ़ते हुए राम जी के गंगा पार तक ले जाने का सत्र संपन्न होता है। यह भजन गाए - - राघव चरण जल जात हो, आज केवट पखारे चरण, छोटे से कठोते में पानी आन गंगाजी को - राघव तुम बिन सूनी मोरी नैय्या, आवहो आवहो आवहो - मेरे राघव जी उतरेंगे पार, गंगा मैय्या धीरे बहो ये रहे मौजूद : आचार्य रामचंद्र दास जी, लाड़लीनंद सरस्वती, पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल, पूर्व विधायक रविंद्र भड़ाना, महावीर अग्रवाल, हर्ष गोयल, नमन अग्रवाल, अखिल मुद्गल, मनीष लोइया, मनोज, ऋषि व अन्य मौजूद रहे।

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