Success Story: बिना पैसा लगाए करोड़पति... कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़ने के बाद किया ये काम, आइडिया हो गया हिट

शिशिर कुमार जेना कौन हैं News

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शिशिर कुमार जेना ओडिशा के मयूरभंज जिले के रहने वाले हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट करियर छोड़कर अपनी अलग पहचान बनाई है। कला और शिल्प के प्रति अपने जुनून को शिशिर ने एक सफल वेंचर में बदल दिया है। यह पारंपरिक कलाओं को दोबारा जिंदा कर रहा है। बिना किसी पूंजी के उन्‍होंने इसकी शुरुआत की...

नई दिल्‍ली: यह कहानी शिशिर कुमार जेना की है। उन्‍होंने सुरक्षित कॉर्पोरेट करियर को छोड़कर कला और शिल्प के प्रति अपने जुनून को सफल उद्यम में बदल दिया। ओडिशा के मयूरभंज जिले के रहने वाले शिशिर बचपन से ही अपने शिक्षक पिता को कैनवास पर पेंटिंग करते देखते थे। उन्होंने पट्टचित्र की ट्रेनिंग भी ली। लेकिन, फॉर्मल एजुकेशन के कारण यह पीछे रही। उन्होंने केमिस्ट्री में ऑनर्स और 2008 में एमबीए की डिग्री पूरी की। मुंबई में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और इंडसइंड बैंक में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी करने के बावजूद शिशिर हमेशा बेचैन रहते थे। 2012 में उन्होंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर पैतृक गांव लौटने का फैसला किया। वहां उन्‍होंने 'आर्ट गोदाम' नाम के एक वेंचर की शुरुआत की। इसका उद्देश्य पारंपरिक कलाओं को मॉनेटाइज करना और कारीगरों को स्‍टेबल इनकम प्रदान करना था। उनका यह आइडिया हिट साबित हुआ। जिस वेंचर को उन्‍होंने बिना किसी पूंजी के शुरू किया, वही आज छप्‍परफाड़ कमाई का जरिया बन गया है। आइए, यहां शिशिर कुमार जेना की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।कॉर्पोरेट करियर से कला की ओर वापसी कॉर्पोरेट करियर से कला की ओर वापसी' imgsize='22802' >शिशिर कुमार जेना ने अपने शिक्षक पिता कुशनाथ जेना से प्रेरणा लेते हुए कला के प्रति अपना झुकाव विकसित किया। गुरु कलामणि रवींद्रनाथ साहू से पारंपरिक पट्टचित्र की ट्रेनिंग ली। कला में रुचि होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी। केमिस्ट्री में ऑनर्स के बाद 2008 में एमबीए किया। इसके बाद उन्होंने मुंबई में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और फिर इंडसइंड बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के रूप में दो साल काम किया। हालांकि, कॉर्पोरेट जीवन में उन्हें बेचैनी महसूस हुई। 2012 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर कला और शिल्प के जुनून को उद्यमशीलता में बदलने का फैसला किया। वह अपने गांव बाउलखालाडी लौट आए। वहीं, उन्‍होंने 'आर्ट गोदाम' की शुरुआत की।बिना पूंजी के शुरू किया काम बिना पूंजी के शुरू किया काम ' imgsize='60022' >शिशिर ने अपने वेंचर की शुरुआत शून्य निवेश के साथ की। इसमें उन्होंने प्लास्टिक की बोतलों, नारियल के खोल और कागज जैसे कबाड़ का इस्‍तेमाल करके सजावटी सामान और कलाकृतियां बनाना शुरू किया। शुरुआती एक साल तक उन्हें खरीदार खोजने में संघर्ष करना पड़ा। हालांकि, 2013 में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने काम को पोस्ट करना शुरू किया। इसके बाद उनके हाथ से बने पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को ग्राहकों ने खूब पसंद क‍िया। 2014-15 में उनका टर्नओवर 4 लाख रुपये तक पहुंच गया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज 'आर्ट गोदाम' का सालाना टर्नओवर लगभग 50 लाख रुपये है। शिशिर ने बैंक लोन की मदद से फ्रेमिंग और प्रिंटिंग यूनिट जैसे विभिन्न सेगमेंट स्थापित किए हैं।कला और कारीगरों को मिल रहा समर्थन कला और कारीगरों को मिल रहा समर्थन' imgsize='33856' >शिशिर कुमार जेना के वेंचर का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को लगातार आय प्रदान करके कला और शिल्प रूपों का मॉनेटाइजेशन करना है, जो अक्सर अपनी रचनात्मकता के बावजूद आर्थिक रूप से संघर्ष करते हैं। नौकरी छोड़ने के बाद शिशिर ने ओडिशा भर की यात्रा की। विभिन्न कला रूपों की बारीकियों को सीखा। कारीगरों से संपर्क साधा। उनके आर्किटेक्ट भाई समीर कुमार जेना ने भी इस उद्यम को बढ़ाने में योगदान दिया। इस यात्रा के दौरान शिशिर ने टेराकोटा, ढोकरा, सबई घास शिल्प, पत्थर की नक्काशी और लकड़ी की नक्काशी सहित 24 विभिन्न शिल्प रूपों पर आधारित 100 से ज्‍यादा उत्पाद विकसित किए। आर्ट गोदाम में अब 10 लोग काम करते हैं। इनमें पांच आदिवासी कारीगर भी शामिल हैं। इन्‍हें अनुभवी कारीगरों की मदद से प्रशिक्षित किया जाता है। उन्हें 8,000 रुपये से 25,000 रुपये तक की मासिक आय मिलती है।सिंपल है मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी सिंपल है मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी' imgsize='59876' >शिशिर की मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी मुख्य रूप से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर केंद्रित है। 2014 से ही आर्ट गोदाम अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म के साथ जुड़ा हुआ है। उसका लगभग 80% व्यापार इन्हीं माध्यमों से होता है। वह 65 से ज्‍यादा तरह के उत्पाद ऑनलाइन बेचते हैं। इसमें वॉल क्लॉक से लेकर फैशन एक्सेसरीज और कॉर्पोरेट उपहार तक शामिल हैं। इनकी कीमत 3,000 रुपये से अधिक तक जाती है। स्टेट ललित कला अकादमी से सीएसएसी अवार्ड प्राप्त कर चुके शिशिर को अपनी उद्यमशीलता पर पूरा भरोसा है। उनका लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में उनके वेंचर का सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपये को पार कर जाए, जिससे पारंपरिक कलाओं और कारीगरों के लिए बड़ा बाजार स्थापित हो सके।.

नई दिल्‍ली: यह कहानी शिशिर कुमार जेना की है। उन्‍होंने सुरक्षित कॉर्पोरेट करियर को छोड़कर कला और शिल्प के प्रति अपने जुनून को सफल उद्यम में बदल दिया। ओडिशा के मयूरभंज जिले के रहने वाले शिशिर बचपन से ही अपने शिक्षक पिता को कैनवास पर पेंटिंग करते देखते थे। उन्होंने पट्टचित्र की ट्रेनिंग भी ली। लेकिन, फॉर्मल एजुकेशन के कारण यह पीछे रही। उन्होंने केमिस्ट्री में ऑनर्स और 2008 में एमबीए की डिग्री पूरी की। मुंबई में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और इंडसइंड बैंक में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी करने के बावजूद शिशिर हमेशा बेचैन रहते थे। 2012 में उन्होंने अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर पैतृक गांव लौटने का फैसला किया। वहां उन्‍होंने 'आर्ट गोदाम' नाम के एक वेंचर की शुरुआत की। इसका उद्देश्य पारंपरिक कलाओं को मॉनेटाइज करना और कारीगरों को स्‍टेबल इनकम प्रदान करना था। उनका यह आइडिया हिट साबित हुआ। जिस वेंचर को उन्‍होंने बिना किसी पूंजी के शुरू किया, वही आज छप्‍परफाड़ कमाई का जरिया बन गया है। आइए, यहां शिशिर कुमार जेना की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।कॉर्पोरेट करियर से कला की ओर वापसी कॉर्पोरेट करियर से कला की ओर वापसी' imgsize='22802' >शिशिर कुमार जेना ने अपने शिक्षक पिता कुशनाथ जेना से प्रेरणा लेते हुए कला के प्रति अपना झुकाव विकसित किया। गुरु कलामणि रवींद्रनाथ साहू से पारंपरिक पट्टचित्र की ट्रेनिंग ली। कला में रुचि होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी। केमिस्ट्री में ऑनर्स के बाद 2008 में एमबीए किया। इसके बाद उन्होंने मुंबई में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल और फिर इंडसइंड बैंक में असिस्टेंट मैनेजर के रूप में दो साल काम किया। हालांकि, कॉर्पोरेट जीवन में उन्हें बेचैनी महसूस हुई। 2012 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर कला और शिल्प के जुनून को उद्यमशीलता में बदलने का फैसला किया। वह अपने गांव बाउलखालाडी लौट आए। वहीं, उन्‍होंने 'आर्ट गोदाम' की शुरुआत की।बिना पूंजी के शुरू किया काम बिना पूंजी के शुरू किया काम ' imgsize='60022' >शिशिर ने अपने वेंचर की शुरुआत शून्य निवेश के साथ की। इसमें उन्होंने प्लास्टिक की बोतलों, नारियल के खोल और कागज जैसे कबाड़ का इस्‍तेमाल करके सजावटी सामान और कलाकृतियां बनाना शुरू किया। शुरुआती एक साल तक उन्हें खरीदार खोजने में संघर्ष करना पड़ा। हालांकि, 2013 में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने काम को पोस्ट करना शुरू किया। इसके बाद उनके हाथ से बने पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों को ग्राहकों ने खूब पसंद क‍िया। 2014-15 में उनका टर्नओवर 4 लाख रुपये तक पहुंच गया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज 'आर्ट गोदाम' का सालाना टर्नओवर लगभग 50 लाख रुपये है। शिशिर ने बैंक लोन की मदद से फ्रेमिंग और प्रिंटिंग यूनिट जैसे विभिन्न सेगमेंट स्थापित किए हैं।कला और कारीगरों को मिल रहा समर्थन कला और कारीगरों को मिल रहा समर्थन' imgsize='33856' >शिशिर कुमार जेना के वेंचर का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों को लगातार आय प्रदान करके कला और शिल्प रूपों का मॉनेटाइजेशन करना है, जो अक्सर अपनी रचनात्मकता के बावजूद आर्थिक रूप से संघर्ष करते हैं। नौकरी छोड़ने के बाद शिशिर ने ओडिशा भर की यात्रा की। विभिन्न कला रूपों की बारीकियों को सीखा। कारीगरों से संपर्क साधा। उनके आर्किटेक्ट भाई समीर कुमार जेना ने भी इस उद्यम को बढ़ाने में योगदान दिया। इस यात्रा के दौरान शिशिर ने टेराकोटा, ढोकरा, सबई घास शिल्प, पत्थर की नक्काशी और लकड़ी की नक्काशी सहित 24 विभिन्न शिल्प रूपों पर आधारित 100 से ज्‍यादा उत्पाद विकसित किए। आर्ट गोदाम में अब 10 लोग काम करते हैं। इनमें पांच आदिवासी कारीगर भी शामिल हैं। इन्‍हें अनुभवी कारीगरों की मदद से प्रशिक्षित किया जाता है। उन्हें 8,000 रुपये से 25,000 रुपये तक की मासिक आय मिलती है।सिंपल है मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी सिंपल है मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी' imgsize='59876' >शिशिर की मार्केटिंग स्‍ट्रैटेजी मुख्य रूप से ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर केंद्रित है। 2014 से ही आर्ट गोदाम अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्म के साथ जुड़ा हुआ है। उसका लगभग 80% व्यापार इन्हीं माध्यमों से होता है। वह 65 से ज्‍यादा तरह के उत्पाद ऑनलाइन बेचते हैं। इसमें वॉल क्लॉक से लेकर फैशन एक्सेसरीज और कॉर्पोरेट उपहार तक शामिल हैं। इनकी कीमत 3,000 रुपये से अधिक तक जाती है। स्टेट ललित कला अकादमी से सीएसएसी अवार्ड प्राप्त कर चुके शिशिर को अपनी उद्यमशीलता पर पूरा भरोसा है। उनका लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में उनके वेंचर का सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपये को पार कर जाए, जिससे पारंपरिक कलाओं और कारीगरों के लिए बड़ा बाजार स्थापित हो सके।

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