नई दिल्ली: भोपाल की डॉ.
नई दिल्ली: भोपाल की डॉ. बसु चौधरी ने कमाल कर दिया है। सीमित संसाधनों के साथ उन्होंने सिर्फ 400 रुपये के शुरुआती निवेश से ऐसा उद्यम स्थापित किया जो आज 60 लाख रुपये का सालाना कारोबार कर रहा है। बीएससी पूरी करने के बाद बसु ने भारी पूंजी की जरूरत वाले व्यवसायों से बचकर मशरूम की खेती को चुना। उन्होंने 2011 में हिमाचल प्रदेश के सोलन से 400 रुपये में 5 किलो ऑयस्टर मशरूम के स्पॉन खरीदे। अपने घर के एक कमरे में 50 बैग लगाए। इससे उन्हें 30,000 रुपये की आय हुई। ज्ञान को बढ़ाने के लिए उन्होंने एमएससी में दाखिला लिया। फिर 2014 में राज्य सरकार से 2 लाख रुपये की सब्सिडी लेकर 100 वर्ग फीट की मशरूम स्पॉन लैब स्थापित की। आज वह शीटके, लायन्स मेन, रीशी, और कॉर्डिसेप्स जैसे महंगे और औषधीय मशरूम की किस्में और उनके बीज पूरे भारत में बेचकर जमकर कमा रही हैं। आइए, यहां डॉ.
बसु चौधरी की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।छोटे ट्रायल से उद्यम की शुरुआत छोटे ट्रायल से उद्यम की शुरुआत' imgsize='37090' >डॉ. बसु चौधरी ने 2011 में अपनी उद्यमिता यात्रा की शुरुआत की। तब उन्होंने भारी निवेश के बजाय विज्ञान पर आधारित छोटे व्यवसाय को प्राथमिकता दी। उन्होंने सोलन से 5 किलो ऑयस्टर मशरूम स्पॉन 400 रुपये में मंगवाए। फिर अपने घर में गेहूं के भूसे से भरे 50 बैग में इसका प्रयोग किया। इस पहले ट्रायल से उन्हें 150 किलो मशरूम प्राप्त हुए। इन्हें उन्होंने स्थानीय बाजार में 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचकर 30,000 रुपये कमाए। इस प्रारंभिक सफलता ने उन्हें प्रेरित किया। 2013 में उन्होंने मशरूम के बारे में ज्यादा जानने के लिए एमएससी में दाखिला लिया। साथ ही, उसी वर्ष उन्होंने 20 किलो स्पॉन का इस्तेमाल करके 600 किलो ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन किया। यही नहीं, इन्हें स्थानीय बिक्री के साथ पाउडर के रूप में सुखाकर लंबी शेल्फ लाइफ के लिए भी तैयार किया।सरकारी लोन लेकर बनाई लैब सरकारी लोन लेकर बनाई लैब' imgsize='24204' >पोस्ट-ग्रेजुएशन के दौरान डॉ. बसु ने टिश्यू कल्चर और मशरूम फार्मिंग में इंटर्नशिप की। इससे उन्हें एक सफल मशरूम लैब की जरूरतों की गहरी समझ मिली। इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने 2014 में लोन लिया और 100 वर्ग फीट में एक मशरूम स्पॉन प्रयोगशाला स्थापित की। इसके उपकरणों के लिए उन्हें राज्य सरकार से 2 लाख रुपये की सब्सिडी भी मिली। लैब की स्थापना के बाद उन्होंने स्थानीय उत्पादकों को ऑयस्टर मशरूम के स्पॉन की सप्लाई शुरू कर दी। सामाजिक कार्यों में उनके योगदान के लिए उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त हुई। उनका यह प्रयास न केवल व्यवसायिक था, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण और पोषण में सुधार का एक माध्यम भी बना।औषधीय मशरूम से कमाया बड़ा मुनाफा औषधीय मशरूम से कमाया बड़ा मुनाफा' imgsize='42604' >अनुभव बढ़ने के साथ डॉ. बसु ने अपनी लैब का काम पूरे साल सुनिश्चित करने के लिए बटन और मिल्की मशरूम की किस्मों के स्पॉन भी बनाने शुरू किए। उन्होंने बाजार की बढ़ती मांग को देखते हुए शीटके, किंग ऑयस्टर, लायन्स मेन और रीशी जैसे एग्जॉटिक मशरूम की किस्मों पर फोकस किया। 2017 में उन्होंने थाईलैंड से कॉर्डिसेप्स मिलिटेरिस मशरूम का कल्चर प्राप्त किया और इसे सफलतापूर्वक अपनी लैब में बढ़ाया। इस मशरूम को हिमालय में 'कीड़ा जड़ी' कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों के कारण बाजार में 3 लाख रुपये से 3.5 लाख रुपये प्रति किलो तक बिकता है। डॉ. बसु हर तीन महीने में लगभग 20 किलो कॉर्डिसेप्स का उत्पादन करती हैं। इसे सीधे ग्राहकों को खुदरा में बेचकर भारी मुनाफा कमाती हैं। साथ ही थोक में फार्मा कंपनियों को भी सप्लाई करती हैं।अब 60 लाख रुपये का टर्नओवर अब 60 लाख रुपये का टर्नओवर' imgsize='32514' >आज डॉ. बसु चौधरी ने अपनी लैब का क्षेत्र बढ़ाकर 200 वर्ग फीट कर दिया है। वह विभिन्न एग्जॉटिक मशरूम और उनके स्पॉन की बिक्री से 60 लाख रुपये का सालाना कारोबार कर रही हैं। डॉ. बसु मासिक रूप से 500 किलो ऑयस्टर मशरूम स्पॉन तैयार करती हैं और बिक्री के लिए 'ऑर्डर-आधारित' प्रणाली पर काम करती हैं। इससे उत्पादन और बिक्री में निरंतरता बनी रहती है। वह न केवल सूखे मशरूम बेचती हैं, बल्कि कॉर्डिसेप्स का कल्चर टेस्ट ट्यूब सेट के रूप में भी बेचती हैं। इससे उन्हें प्रति माह 70,000 रुपये की अतिरिक्त आय होती है। डॉ. बसु का मानना है कि विदेशी मशरूमों की अनूठी सुगंध,स्वाद और पोषण मूल्य के कारण उनकी मांग लगातार बढ़ रही है। मशरूम कल्टिवेशन भारत के युवाओं के लिए फायदेमंद करियर विकल्प बन सकता है।
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