बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिनेत्री अनीता आडवाणी की वह अपील खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने दिवंगत सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ अपने रिश्ते को शादी जैसा रिश्ता मानते हुए कानूनी दर्जा देने की मांग
‘एक औरत को पहले घर से निकाला जाता है, फिर वर्षों तक अदालतों में रुलाया जाता है’ अनीता ने कहा कि लिव-इन यानी शादी जैसे संबंधों के मामलों में महिलाओं के लिए न्याय पाना बेहद मुश्किल बना दिया गया है। उन्होंने कहा, 'ये जो शादी जैसे संबंध वाला कानून है न, इसे एक औरत के लिए इतना मुश्किल बना दिया गया है कि पहले तो उसे घर से निकाले जाने का नरक झेलना पड़ता है और उसके बाद वर्षों तक अदालतों में रुलाया जाता है। मेरे साथ भी यही हुआ। पहले मुझे उस घर से बाहर किया गया, फिर 14 साल तक मुझे घसीटा गया। 14 साल.
.. सोचिए। और उसके बाद भी ठीक से सुनवाई तक नहीं। मतलब पहले एक औरत को तोड़ दीजिए, फिर उसे वर्षों तक भागाइए... और आखिर में कह दीजिए कि उसे मौका ही नहीं मिलेगा। ये कैसा न्याय है? 'कम से कम मुझे सुन तो लीजिए' सबसे बड़ा दुख यही है कि मुझे अपनी बात साबित करने का मौका ही नहीं दिया गया। मामला लगभग सुनवाई के चरण में था, लेकिन सुनवाई हुई ही नहीं। मैं यही कह रही हूं कि कम से कम मुझे सुन तो लीजिए, मुझे साबित तो करने दीजिए कि मेरा रिश्ता क्या था? मैं उस आदमी के जीवन में क्या थी, मैंने क्या जिया? लेकिन यहां तो जैसे पहले से सब तय करके बैठ जाते हैं। आपको कोशिश करने का मौका तक नहीं दिया जाता।' ‘जो औरत 28 साल साथ नहीं रही, वह आखिर में सिर्फ कानूनी पत्नी बनकर कैसे आ जाती है?’ इंटरव्यू के दौरान अनीता ने सवाल उठाया कि जो महिला वर्षों तक उस आदमी के साथ नहीं थी, वह अंत में सिर्फ कागजों के आधार पर अधिकार कैसे जता सकती है? उन्होंने कहा, 'मैं एक बात पूछना चाहती हूं, जो औरत 28 साल तक उस आदमी के साथ नहीं रही, जिसकी अपनी अलग जिंदगी थी, जो अपनी जिंदगी जी रही थी, वह आखिर में सिर्फ इसीलिए आकर सब कुछ कैसे कह सकती है कि ‘मैं कानूनी पत्नी हूं’? इतने साल कहां थे आप? उस आदमी की जिंदगी में कौन था? उसके साथ कौन था? उसके अच्छे-बुरे वक्त में कौन खड़ा था? ये सवाल कोई क्यों नहीं पूछता? सिर्फ ‘कानूनी पत्नी’ बोल देने से क्या जीवन का सच खत्म हो जाता है? क्या साथ, देखभाल, त्याग और मौजूदगी, इन सबकी कोई कीमत नहीं है?' अनीता की यह टिप्पणी डिंपल कपाड़िया की ओर है। ‘वह आदमी बीच में फंसा हुआ था… न वह आजाद था, न उसे जीने दिया गया’ अनीता ने राजेश खन्ना के निजी जीवन को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, 'वह आदमी सबके बीच में फंसा हुआ था। न वह अपनी जिंदगी खुलकर जी पा रहा था, न उसे किसी रिश्ते को पूरी तरह जीने दिया गया। उसने तलाक नहीं लिया, लेकिन वह जीवन भी नहीं जी रहा था, जो पति-पत्नी का जीवन होता है। वह एक अजीब-सी स्थिति में था। वह न शादी कर सकता था, न अपनी भावनाओं के हिसाब से जीवन जी सकता था। लोग बाहर से चीजों को बहुत आसान समझते हैं, लेकिन जो व्यक्ति उस स्थिति में जी रहा होता है, वह भीतर से कितना टूट रहा होता है, ये कोई नहीं समझता'। ‘बहुत सारे मर्द भी टूटते हैं... उन्हें भी इतना प्रताड़ित किया जाता है कि वे हार मान लेते हैं’ अनीता ने कहा कि ऐसे हालात में सिर्फ महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी गहरे मानसिक तनाव से गुजरते हैं। उन्होंने कहा, 'मैं सिर्फ औरत की पीड़ा की बात नहीं कर रही हूं। मैं ये भी कह रही हूं कि बहुत सारे मर्द भी बहुत टूटते हैं। बहुत सारे पुरुष ऐसे हालात में इतने ज्यादा प्रताड़ित होते हैं कि वे जिंदगी से ही हार मान लेते हैं। लोग सिर्फ एक तरफ की कहानी देखते हैं, लेकिन एक आदमी भी बहुत कुछ झेलता है। अगर कोई औरत उस आदमी के साथ हर सुख-दुख में खड़ी रही, बिना कुछ सोचे, सिर्फ उसका साथ निभाती रही और फिर आखिर में कोई आकर कह दे कि ‘मैं तो कानूनी पत्नी हूं’ तो फिर इतने साल आप कहां थे? जब वह आदमी मानसिक, भावनात्मक और निजी तौर पर संघर्ष कर रहा था, तब कौन उसके साथ था? ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए।' ‘जो औरत हर सुख-दुख में साथ रही, आखिर उसके हिस्से में सिर्फ अपमान क्यों?’ अनीता ने आगे कहा, 'अगर एक औरत किसी आदमी के हर अच्छे-बुरे दौर में उसके साथ खड़ी रही हो, उसकी बीमारी, उसके अकेलेपन और उसके टूटने के समय में भी उसका साथ निभाया हो, तो आखिर में उसे ‘तुम कुछ नहीं हो’ कह देना सबसे ज्यादा दुख देता है। मुझे घर से बाहर किया गया। मेरे हिस्से में सिर्फ और सिर्फ अपमान आया।' 'मैं खुद बहुत स्तब्ध हूं, से मेरे इतने वर्षों का दर्द किसी ने देखा ही नहीं' हाईकोर्ट के फैसले पर अनीता ने साफ कहा कि वह अंदर तक हिल गई हैं। उन्होंने कहा, 'मैं सच में बहुत स्तब्ध हूं। बहुत। मैं खुद समझ नहीं पा रही हूं कि ये कैसे हुआ। क्योंकि जब आप इतने साल लड़ते हैं, इतने साल हर अदालत में जाते हैं, हर चरण पर दस्तावेज, तथ्य और दलीलें रखते हैं, फिर भी अंत में आपको ऐसा नतीजा मिलता है, तो आप अंदर से हिल जाते हैं। मैं सिर्फ निराश नहीं हूं, मैं स्तब्ध हूं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे जो कुछ मैंने 14 साल में जिया, वह सब किसी ने देखा ही नहीं। जैसे मेरे इतने वर्षों का दर्द किसी ने देखा ही नहीं।' ‘पहले सिविल मामला, फिर वसीयत से जुड़ा मामला, फिर मजिस्ट्रेट, 14 साल तक बस दौड़ाया गया’ अनीता ने पूरी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें अलग-अलग अदालतों में सिर्फ उलझाया गया। उन्होंने कहा, 'मुझे समझ नहीं आता, पहले सिविल मामला, फिर वसीयत से जुड़ा मामला, फिर मजिस्ट्रेट... 14 साल तक हमें बस दौड़ाया गया। 14 साल तक हमें दौड़ाते रहो और फिर आखिर में कह दो कि अब इस फैसले पर भरोसा करेंगे। मुझे सच में समझ नहीं आ रहा कि मैं इस वक्त क्या करूं। मेरे पास सुप्रीम कोर्ट का आदेश है। उसमें कहा गया है कि हाईकोर्ट की जो टिप्पणियां थीं, वे मेरे रास्ते में नहीं आएंगी। तो फिर मैं ये पूछने का हक रखती हूं कि वही टिप्पणियां, वही सोच, वही तर्क फिर से मेरे खिलाफ कैसे इस्तेमाल हो गए?' अगर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये चीजें मेरे रास्ते में नहीं आएंगी, तो फिर उन्हें नजरअंदाज करके दोबारा कैसे सामने ला दिया गया? मैं सच में हैरान हूं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि व्यवस्था में क्या हो रहा है।' 'मुझे सिर्फ दर्द ही मिला, आखिर किस पर भरोसा करें'? डिंडोशी कोर्ट में मुझे राहत मिली थी। वसीयत से जुड़े मामलों में भी मैंने अपने पक्ष में फैसले देखे। सुप्रीम कोर्ट तक में मुझे कहा गया था कि कुछ टिप्पणियां मेरे रास्ते में नहीं आएंगी। तो फिर अचानक यहां आकर वही चीजें दोबारा कैसे मान ली गईं? अगर हर जगह अलग-अलग बात सुनने को मिले, तो इंसान आखिर किस पर भरोसा करें? मैं अदालत इसलिए जाती हूं कि मुझे न्याय मिले, लेकिन यहां तो मुझे सिर्फ उलझन, देरी और दर्द ही मिला।' ‘इस वक्त मुझे सिर्फ इतना लग रहा है - न्याय नहीं मिला’ जब उनसे पूछा गया कि क्या वह आगे लड़ेंगी? तो अनीता का जवाब बेहद भावुक था। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता... सच कहूं तो मुझे वाकई नहीं पता। इस वक्त मैं बहुत टूट चुकी हूं। जब आप इतने साल लड़ते हैं और बार-बार आपको ऐसा महसूस कराया जाता है कि आपकी कहानी, आपका दर्द, आपका सच कोई मायने ही नहीं रखता, तो एक समय पर इंसान थक जाता है। अभी मैं भावनात्मक रूप से बहुत खाली हो चुकी हूं। मैं इस वक्त कोई फैसला नहीं ले पा रही हूं। मुझे बैठकर सोचना होगा कि क्या मेरे अंदर अब भी इतनी ताकत बची है कि मैं इस लड़ाई को आगे लेकर जाऊं। मैं बस इतना कह सकती हूं कि इस वक्त मुझे न्याय मिलता हुआ नहीं दिख रहा। मैं बहुत स्तब्ध हूं, बहुत आहत हूं और बहुत निराश हूं। 14 साल कोई छोटा वक्त नहीं होता। 14 साल तक किसी को अदालतों के चक्कर कटवाइए, एक मामले से दूसरे मामले तक दौड़ाइए... और फिर आखिर में कह दीजिए कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। ये बहुत दुख देने वाली बात है। इस वक्त मुझे सिर्फ इतना लग रहा है कि मुझे न्याय नहीं मिला।' क्या है पूरा मामला? अनीता आडवाणी ने राजेश खन्ना के निधन के बाद दावा किया था कि वह अभिनेता के साथ शादी जैसे संबंध में थीं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि अभिनेता की मौत के बाद उन्हें उनके बंगले ‘आशीर्वाद’ से बाहर निकाल दिया गया। इस मामले को लेकर लंबे समय से अदालतों में कानूनी लड़ाई चल रही थी। अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी है और डिंडोशी कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
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