प्रयागराज में माघ मेला 2026 के दौरान श्रद्धालु कल्पवास Magh Mela 2026 करते हैं, जिसमें वे संगम तट पर एक महीने तक कठोर नियमों का पालन करते हुए साधना करते हैं। यह पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक चलता है। कल्पवास का पालन करने से जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती...
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। प्रयागराज की पावन धरती पर माघ मेला 2026 का आयोजन हर बार धूमधाम और भक्ति भाव से किया जाता है। संगम तट पर कड़ाके की ठंड के बीच हजारों श्रद्धालु छोटे-छोटे तंबुओं में रहकर कठिन नियमों का पालन करते हुए साधना करते हैं, जिसे 'कल्पवास' कहा जाता है। पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक चलने वाली इस साधना का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर लोग अपना घर-बार छोड़कर एक महीने के लिए यहां क्यों आते हैं? आइए जानते हैं कल्पवास के पीछे का धार्मिक महत्व और इसके नियम, जो इस प्रकार हैं - AI Generated क्या है 'कल्पवास' का अर्थ? कल्पवास शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। 'कल्प' जिसका मतलब है समय का एक चक्र और 'वास' का मतलब है निवास स्नान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संगम के तट पर एक महीने तक निवास करने से व्यक्ति का मानसिक और आध्यात्मिक कायाकल्प होता है। पुराणों में कहा गया है कि कल्पवास करने से साधक को पिछले जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और वह मोक्ष की ओर आगे बढ़ता है। कल्पवास का धार्मिक महत्व पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में कल्पवास की महिमा के बारे में बताया गया है। आइए जानते हैं - देवताओं का निवास - ऐसा माना जाता है कि माघ महीने में सभी देवी-देवता संगम तट पर निवास करते हैं। ऐसे में यहां रहकर पूजा-अर्चना करने से अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। आत्म-शुद्धि - कल्पवास केवल नदी किनारे रहना नहीं है, बल्कि यह मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि की प्रक्रिया है। कहा जाता है कि इस दौरान गंगा स्नान और सात्विक जीवन जीने से शरीर और मन दोनों पवित्र होते हैं। मोक्ष की प्राप्ति - ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति विधि-विधान से कल्पवास पूर्ण करते हैं, उन्हें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। कल्पवासी के कठिन नियम कल्पवासी पूरे दिन में केवल एक बार फलाहार या सात्विक भोजन करते हैं। इनके लिए दिन में तीन बार गंगा स्नान और पूजा-पाठ करना जरूर होता है। कल्पवासी पलंग या बिस्तर का त्याग कर जमीन पर पुआल या साधारण चटाई बिछाकर सोते हैं। इस दौरान झूठ बोलना, क्रोध करना, निंदा करना और सुख-सुविधाओं की वस्तुओं का त्याग करना होता है। इस दौरान अपने तंबू में अखंड दीप जलाना और दिनभर प्रवचन व सत्संग में समय बिताना होता है। यह भी पढ़ें- संगम तट पर 'हर हर गंगे' की गूंज: पौष पूर्णिमा के पहले स्नान संग माघ मेला शुरू, अब तक 3 लाख श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी यह भी पढ़ें- Magh Mela 2026: इस दिन से शुरू होगा माघ मेला, पढ़ें शाही स्नान से लेकर कल्पवास का महत्व अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।.
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