Mir Yar Balcoh Exclusive: बलूचिस्तान की आजादी को लेकर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट जैसे कई संगठन अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. चूंकि बलूचिस्तान की जमीनी हकीकत को पाकिस्तान सदियों से छिपाता आ रहा है.
Mir Yar Balcoh Exclusive: ‘ईरान- पाकिस्तान से टूट कर बनेगा बलूचिस्तान ’, इस आजादी की जंग में क्या कर रहे हैं हिंदू? Mir Yar Balcoh Exclusive: ‘ईरान- पाकिस्तान से टूट कर बनेगा बलूचिस्तान ’, इस आजादी की जंग में क्या कर रहे हैं हिंदू? Mir Yar Balcoh Exclusive: बलूचिस्तान की आजादी को लेकर बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट जैसे कई संगठन अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं.
चूंकि बलूचिस्तान की जमीनी हकीकत को पाकिस्तान सदियों से छिपाता आ रहा है. ऐसे में, आइए Zee Bharat के स्पेशल सीरीज ‘बलूचिस्तान की हकीकत’ पार्ट-1 में बलूचों के अनदेखे व अनकहे किस्सों को वहीं के एक्टिविस्ट मीर यार बलोच से जानते हैं.indiaIndia super six weaponAircraft carriers दुनिया के सबसे बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर्स, समंदर में लेकर चलते हैं 80-90 लड़ाकू विमान; पलक झपकते मचाते हैं तबाही बलूचिस्तान कई दशकों से आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है. जब भी बलूच फ्रीडम मूवमेंट अपने सबाब पर होता है, पाकिस्तानी आर्मी बूटों और बट के दम पर आजादी का ख्बाव सजा रहे आंदोलन को कुचल देती है. चाहे 1947 में बंटवारे का वक्त हो या जनरल परवेज मुशर्रफ की दमनकारी नीतियां हों या मौजूदा शहबाज व मुनीर का क्रूर दौर हो. हर बार बलूचिस्तान की आजादी को बेरहमी से रौंद दिया जाता है. ऐसे में, Zee Bharat ने फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट के मेंबर, ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट, राजनयिक और लेखक मीर यार बलोच से संपर्क किया व ‘बलूचिस्तान की हकीकत’ सीरीज के तहत बातचीत की. जहां मीर यार बलोच ने बलोचिस्तान मूवमेंट से जुड़े कई सवालों का बड़ी ही बेबाकी से जवाब दिया और जमीनी हकीकत बताई.क्या इस समय बलूचिस्तान फ्रीडम मूवमेंट को अफगानिस्तान से कोई सपोर्ट मिल रहा है? अगर नहीं, तो क्या भविष्य में BLA को किसी भी तरह के सपोर्ट मिलने की उम्मीद है? इसके लिए क्या कोशिशें की गई हैं?अफगानिस्तान और बलूचिस्तान दो पड़ोसी मुल्क हैं. हमारे रिश्ते भाईचारे वाले हैं. वहीं, दोनों देशों की भगौलिक स्थिति भी एक जैसी है, यही वजह है कि हम दोनों की समस्याएं भी बहुत अलग नहीं हैं. बलूचिस्तान पाकिस्तान के कब्जे में है और यह कब्जा हमेशा से अफगानिस्तान के लिए मुश्किलों की वजह रहा है, क्योंकि पाकिस्तान ने हर दौर में बलूचिस्तान की जमीन का दुरुपयोग अफगानों के खिलाफ किया है. जिससे अफगानिस्तान में आर्थिक और रक्षा संबंधी समस्याएं पैदा हुई हैं. वहीं, हमें अफगानिस्तान से जिस स्तर के समर्थन की उम्मीद थी, वह कभी भी हमारे आजादी के आंदोलन को नहीं मिला. जब 1938 में कलात के शासक अहमद यार खान के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने 27 मार्च 1948 के जबरन कब्जे के विरोध में अफगानिस्तान की ओर पलायन किया , तब भी उन्हें अफगानिस्तान की ओर से पर्याप्त मिलिट्री, लॉजिस्टिक या कूटनीतिक समर्थन नहीं मिला. अफगानिस्तान ने बलूचिस्तान के जबरन कब्जे के खिलाफ अपनी आवाज भी नहीं उठाई. हालांकि, अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के लोग एक-दूसरे के शुक्रगुजार हैं, क्योंकि जब भी पाकिस्तान या ईरान ने किसी एक तरफ मुश्किल हालात पैदा किए, दोनों देशों के आम लोगों ने एक-दूसरे के लिए अपने घरों के दरवाजे खोल दिए. आपसी विश्वास पर आधारित हमारी दोस्ती ऐतिहासिक रही है और हमेशा बनी रहेगी. चूंकि दोनों देशों का दुश्मन एक ही है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि अफगानिस्तान का नेतृत्व अतीत की गलतियों से सीखेगा और इस बार बलूचिस्तान की आजादी के लिए व्यवहारिक कदम उठाएगा. इसमें पॉलिटिकल, डिप्लोमेटिक, डिफेंस और इकोनॉमिक फील्ड में सपोर्ट शामिल होगा,क्या पाकिस्तान की तरह ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान क्षेत्र में भी आजादी का आंदोलन चल रहा है? अगर हां तो दिखाई क्यों नहीं देता है?बलूच एक देश है और हर देश को गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए संघर्ष करने का अधिकार है. पाकिस्तान की तरह ईरान ने भी बलूचिस्तान के एक बड़े हिस्से पर जबरन कब्जा किया हुआ है. चाबहार बंदरगाह, बलूचिस्तान का हिस्सा है और इस समय ईरान के कंट्रोल में है. ईरान भी बलूच लोगों को आर्थिक, सांस्कृतिक और अन्य तरीकों से दबाने की कोशिश कर रहा है.ईरानी शासन की सेनाओं ने महज 15 मिनट में गोलीबारी कर 130 बलूच लोगों की हत्या कर दी . मारे गए लोगों में अधिकांश युवा बलूच थे. ये प्रदर्शन महसा अमिनी की मौत के बाद शुरू हुए थे, जो एक साहसी युवा कुर्दिश पॉलिटिकल एक्टिविस्ट थीं और हिजाब कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान मारी गईं. ये प्रदर्शन कुर्द, बलूच और अहवाज़ी क्षेत्रों में हुए. ईरान में ईरानी सेना के एक जनरल ने 15 वर्षीय बलूच लड़की माहो के साथ बलात्कार किया. इस अपराध के बाद ईरानी कब्जे वाले बलूचिस्तान के कई इलाकों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए.ईरान की डेवलपमेंट और मुंसिपल अथॉरिटी एजेंसियों ने चाबहार, ज़ाहेदान, खाश, केरमान, ईरानशहर और अन्य स्थानों पर बलूच बस्तियों को जबरन खाली कराया और उनके घरों को ध्वस्त कर दियास्थानीय बलूच आबादी का कहना है कि ईरान पानी की गंभीर कमी और अत्यधिक जनसंख्या दबाव के कारण अपनी राजधानी तेहरान से बलूचिस्तान के तटीय इलाकों मकरान और चाबहार के आसपास बसाने की प्लानिंग कर रहा है. इसी कारण बलूच लोगों को जबरन हटाया जा रहा है, जिसका उन्होंने जोरदार विरोध किया है. 2022 और उसके बाद हुए इन प्रदर्शनों को पश्चिमी मीडिया और खासकर खाड़ी देशों में काफी कवरेज मिली, लेकिन भारतीय मीडिया ने ईरान द्वारा बलूचों पर किए जा रहे अत्याचारों को बहुत कम जगह दी है. यही वजह है कि भारत के लोग इन अत्याचारों से आमतौर पर अनजान हैं.बलूचिस्तान फ्रीडम मूवमेंट को पाकिस्तान के अंदर और बाहर किन संगठनों का समर्थन मिल रहा है? अगर समर्थन मिल रहा है तो किस तरह का, पॉलिटिकल, मानवीय मदद या वैचारिक?बलूचिस्तान के लोगों की मांग बहुत सीधी है. वे पाकिस्तान का हिस्सा नहीं हैं, वे अपनी जमीन पर आजाद हैं, लेकिन पाकिस्तान बलूचों के आजादी के अधिकारों को तोपों, टैंकों, फाइटर जेट्स और अपनी पूरी मिलिट्री का इस्तेमाल कर कुचल रहा है. बलूचों की आजादी की लड़ाई को बलूचिस्तान के लोगों से फाइनेंशियल, पॉलिटिकल, डिप्लोमैटिक, मानवीय, आर्थिक और हर संभव मदद मिलती है. हमारे अधिकारों के लिए इस जायज लड़ाई को पश्तून और सिंधी देशों का भी मोरल और पॉलिटिकल सपोर्ट है. पश्तून तहफुज मूवमेंट और सिंध के कुछ संगठनों का बलूचिस्तान आंदोलन को समर्थन प्राप्त है. मीर यार ने आगे कहा कि हम उन सभी देशों की तारीफ करते हैं, जो बलूचों का दर्द और तकलीफ समझते हैं. साथ ही सच्चाई और इंसाफ के साथ खड़े हैं. मीर यार बलोच बताते हैं, पश्तून तहफ़ुज मूवमेंट की लीडरशिप ने कई मौकों पर बलूचिस्तान के आजादी पसंद लोगों के विरोध प्रदर्शनों, रैलियों और जुलूसों में हिस्सा लिया है. हमने भी उनकी राजनीतिक सभाओं, रैलियों और सेमिनारों में हिस्सा लिया है. अभी तक पश्तूनों ने पाकिस्तान से आजादी की जंग का खुलकर ऐलान नहीं किया है. वे अभी भी पाकिस्तान के दायरे में काम कर रहे हैं और अपने हक की बात कर रहे हैं, लेकिन हम उन्हें यह समझाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान का कोई असली वजूद नहीं है. बलूच, पश्तून और सिंधी देशों को पंजाबी मुस्लिम सेना और अमीर लोगों ने मिलिट्री कैंप में कैद कर रखा है . ऐसे में आजादी एकमात्र रास्ता है. बलूच देश ने अपनी राष्ट्रीय ताकत से पाकिस्तान को हराने में काफी कामयाबी हासिल की है. लेकिन, पश्तून अभी भी गोलियों का जवाब सिर्फ विरोध प्रदर्शनों देने में खुश हैं.आज बलूचिस्तान के आम नागरिकों की सबसे गंभीर समस्याएं क्या हैं? पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों को लेकर क्या सोचते हैं?बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तानी सेना को एक बाहरी आक्रमणकारी शक्ति मानते हैं. बलूच लोगों को पाकिस्तान से किसी भी प्रकार की भलाई की कोई उम्मीद नहीं है. उनके लिए बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी ही मूल समस्या है, क्योंकि पाकिस्तान की पंजाबी-प्रधान सेना न तो बलूच संस्कृति से परिचित है और न ही हमारे रीति-रिवाजों, परंपराओं और जीवनशैली को समझती है. पिछले 78 वर्षों से पाकिस्तानी सेना ने जानबूझकर बलूच लोगों को शिक्षा से दूर रखा है, क्योंकि इस्लामाबाद को डर है कि अगर बलूच शिक्षित हो गए तो वे अपने देश की बागडोर अपने हाथ में ले लेंगे. इसलिए वह हमारे बच्चों को स्कूलों और शिक्षा से दूर रखने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. आज भी बलूचिस्तान में पोलियो के मरीज मौजूद हैं. आज भी बलूच महिलाएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं. आधुनिक युग में भी बलूच लोगों को साफ पानी नहीं मिलता और न ही उन्हें अपनी मातृभाषा में पढ़ने-लिखने की अनुमति है. अगर किसी राष्ट्र को तोप, बम और गोलियों से न भी मारा जाए, लेकिन उसे उसकी भाषा, पहचान और इतिहास से दूर कर दिया जाए, तो वह धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है. हम पाकिस्तान की इस दुर्भावनापूर्ण नीति को समझते हैं और इसी कारण हम अपने राष्ट्र के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गंभीरता से काम कर रहे हैं.बलूचिस्तान की हकीकत के अगले पार्ट में हम बताएंगे कि ‘फ्री बलूचिस्तान मूवमेंट’ भारत से क्या उम्मीद कर रहा है. साथ ही बताएंगे कि पाकिस्तानी सरकार व आर्मी बलूचों पर किस तरह कहर ढा रही है. भारत बना रहा 6 टन वजनी HALE कॉम्बैट ड्रोन! 40000 फीट ऊपर तक 25 घंटे भरेगा उड़ान, चुपके से करेगा जासूसी: देश-दुनिया, जियो-पॉलिटिक्स, इंडियन आर्मी, इंडियन एयरफोर्स, इंडियन नेवी, हथियारों और डिफेंस की दुनिया की सभी खबरें अपने मोबाइल पर पढ़ने के लिए डाउनलोड करेंप्रशांत सिंह के लेख रिसर्च-आधारित, फैक्ट-चेक्ड और विश्वसनीय स्रोतों पर आधारित होते हैं. ये जियोपॉलिटिक्स और रक्षा से जुड़ी खबरों को आसान हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने में माहिर हैं.'मित्र हां, मास्टर नहीं' भारत से क्या चाहता है बांग्लादेश? 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