Lok Sabha Election 2019: राजनीति और कानून की लड़ाई में और उलझे राहुल गांधी

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Lok Sabha Election 2019: राजनीति और कानून की लड़ाई में और उलझे राहुल गांधी RahulGandhi SupremeCourt

राहुल गांधी शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कानून से कैसे निपटें। 'चौकीदार चोर है' को राजनीतिक हथियार बनाकर चल रहे राहुल नोटिस के बावजूद कोर्ट से उस बात के लिए माफी मांगने से बच रहे हैं जिसके तहत उन्होंने कोर्ट को भी अपनी राजनीति का हथियार बना लिया था और कहा था कि कोर्ट ने उनके आरोप की पुष्टि कर दी है। स्पष्टीकरण के बाद कोर्ट की नोटिस के जवाब मे भी उन्होंने कोर्ट को घसीटे जाने के लिए सिर्फ खेद जताया। माफी नहीं मांगी। जबकि पिछली सुनवाई पर याचिकाकर्ता मीनाक्षी लेखी के वकील मुकुल रोहतगी ने राहुल के माफी न मांगे जाने का मुद्दा उठाया था और कहा था कि राहुल ने माना है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में नहीं कहा है कि 'चौकीदार चोर है' और वे कोर्ट के नाम पर दिये गए अपने बयान के लिए खेद जताते हैं। खेद शब्द भी कोष्ठक में दिया गया है। इसे माफी मांगना नहीं कहा जाएगा। जब राहुल के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि कोर्ट ने नोटिस नहीं दिया था, सिर्फ स्पष्टीकरण मांगा था और उन्होंने स्पष्टीकरण दिया है। तो तत्काल कोर्ट ने राहुल गांधी को अवमानना का नोटिस जारी किया था। वैसे कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेशी से छूट दे दी थी। संकेत साफ है, लेकिन राहुल के वकील शायद चूक गए। कानूनविदों का कहना है कि कहना कि राहुल गांधी को स्पष्ट तौर पर माफी मांगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट के वकील डीके गर्ग कहते हैं कि खेद और माफी शब्द में अंतर होता है। अब कोर्ट के ऊपर है कि वह बिना माफी मांगे राहुल की ओर से दिये गए स्पष्टीकरण को स्वीकार करता है या नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसआर सिंह भी अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहते हैं कि सामान्य तौर पर अवमानना के मामले में व्यक्ति कोर्ट से माफी मांगता है। राहुल गांधी ने सोमवार को दाखिल किये गए अपने नये हलफनामे में भी कमोवेश वही बातें कही हैं जो पिछले हलफनामे में कही थीं। राहुल ने फिर कहा है कि उन्होंने बयान चुनाव प्रचार के दौरान आवेश में दे दिया था। उनकी मंशा कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने या कम करने की कभी नहीं थी। दरअसल, चुनावी सरगर्मी के बीच राहुल को इसका अहसास है कि माफी शब्द का इस्तेमाल उन्हें भारी पड़ेगा। यही कारण है कि जवाब में फिर से दोहराया कि राफेल मामले की जेसीपी से जांच कराई जानी चाहिए। लेकिन कोर्ट को नाराज करना भी मुश्किल पड़ सकता है।मीनाक्षी लेखी ने अवमानना याचिका में कहा है कि राफेल मामले में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राहुल ने कोर्ट का नाम लेकर अपनी निजी राय व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री के लिए गलत बयानबाजी की। लेखी का आरोप है कि राहुल गांधी ने बयान में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि चौकीदार नरेन्द्र मोदी चोर है। जबकि कोर्ट ने फैसले मे ऐसी कोई बात नहीं कही है। ये कोर्ट की अवमानना है। गत 15 अप्रैल को कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसने आदेश में ऐसा कुछ नहीं कहा है जैसा कि आरोप लगाया गया है।वहीं केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को पुनर्विचार याचिका पर होने वाली सुनवाई टालने का आग्रह किया और पुनर्विचार याचिकाओं का मेरिट पर जवाब दाखिल करने के लिए कुछ और समय मांगा। कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई स्थगित करने का कोई भी आदेश नहीं दिया है हालांकि केन्द्र सरकार को इस बारे में लेटर सर्कुलेट करने की इजाजत दे दी है। गत 23 अप्रैल को कोर्ट ने राहुल गांधी अवमानना मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि 30 अप्रैल को अवमानना का मामला और राफेल फैसले का पुनर्विचार मांगने वाली याचिकाएं एक साथ सुनवाई के लिए लगाई जाएं। अभी तक सुप्रीम कोर्ट की मुख्य सुनवाई सूची में दोनों केस लगे हैं। हालांकि सप्लीमेन्ट्री सूची अभी जारी नहीं हुई है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं और उनके साथ लगाए गए दस्तावेजों को लेकर केन्द्र की ओर से उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियां खारिज कर दी थीं और याचिकाओं की मेरिट पर सुनवाई करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि वह दाखिल दस्तावेजों पर भी विचार करेगा। केन्द्र ने दस्तावेजों पर आपत्ति उठाते हुए कहा था कि ये चोरी से लीक दस्तावेजों से फोटोकापी कराए गए हैं और इन्हें सरकार की इजाजत के बगैर कहीं नहीं पेश किया जा सकता। केन्द्र ने दस्तावेजों को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए भी खतरा बताया था।.

राहुल गांधी शायद यह नहीं समझ पा रहे हैं कि कानून से कैसे निपटें। 'चौकीदार चोर है' को राजनीतिक हथियार बनाकर चल रहे राहुल नोटिस के बावजूद कोर्ट से उस बात के लिए माफी मांगने से बच रहे हैं जिसके तहत उन्होंने कोर्ट को भी अपनी राजनीति का हथियार बना लिया था और कहा था कि कोर्ट ने उनके आरोप की पुष्टि कर दी है। स्पष्टीकरण के बाद कोर्ट की नोटिस के जवाब मे भी उन्होंने कोर्ट को घसीटे जाने के लिए सिर्फ खेद जताया। माफी नहीं मांगी। जबकि पिछली सुनवाई पर याचिकाकर्ता मीनाक्षी लेखी के वकील मुकुल रोहतगी ने राहुल के माफी न मांगे जाने का मुद्दा उठाया था और कहा था कि राहुल ने माना है कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में नहीं कहा है कि 'चौकीदार चोर है' और वे कोर्ट के नाम पर दिये गए अपने बयान के लिए खेद जताते हैं। खेद शब्द भी कोष्ठक में दिया गया है। इसे माफी मांगना नहीं कहा जाएगा। जब राहुल के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि कोर्ट ने नोटिस नहीं दिया था, सिर्फ स्पष्टीकरण मांगा था और उन्होंने स्पष्टीकरण दिया है। तो तत्काल कोर्ट ने राहुल गांधी को अवमानना का नोटिस जारी किया था। वैसे कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेशी से छूट दे दी थी। संकेत साफ है, लेकिन राहुल के वकील शायद चूक गए। कानूनविदों का कहना है कि कहना कि राहुल गांधी को स्पष्ट तौर पर माफी मांगनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट के वकील डीके गर्ग कहते हैं कि खेद और माफी शब्द में अंतर होता है। अब कोर्ट के ऊपर है कि वह बिना माफी मांगे राहुल की ओर से दिये गए स्पष्टीकरण को स्वीकार करता है या नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसआर सिंह भी अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहते हैं कि सामान्य तौर पर अवमानना के मामले में व्यक्ति कोर्ट से माफी मांगता है। राहुल गांधी ने सोमवार को दाखिल किये गए अपने नये हलफनामे में भी कमोवेश वही बातें कही हैं जो पिछले हलफनामे में कही थीं। राहुल ने फिर कहा है कि उन्होंने बयान चुनाव प्रचार के दौरान आवेश में दे दिया था। उनकी मंशा कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुंचाने या कम करने की कभी नहीं थी। दरअसल, चुनावी सरगर्मी के बीच राहुल को इसका अहसास है कि माफी शब्द का इस्तेमाल उन्हें भारी पड़ेगा। यही कारण है कि जवाब में फिर से दोहराया कि राफेल मामले की जेसीपी से जांच कराई जानी चाहिए। लेकिन कोर्ट को नाराज करना भी मुश्किल पड़ सकता है।मीनाक्षी लेखी ने अवमानना याचिका में कहा है कि राफेल मामले में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राहुल ने कोर्ट का नाम लेकर अपनी निजी राय व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री के लिए गलत बयानबाजी की। लेखी का आरोप है कि राहुल गांधी ने बयान में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि चौकीदार नरेन्द्र मोदी चोर है। जबकि कोर्ट ने फैसले मे ऐसी कोई बात नहीं कही है। ये कोर्ट की अवमानना है। गत 15 अप्रैल को कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसने आदेश में ऐसा कुछ नहीं कहा है जैसा कि आरोप लगाया गया है।वहीं केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मंगलवार को पुनर्विचार याचिका पर होने वाली सुनवाई टालने का आग्रह किया और पुनर्विचार याचिकाओं का मेरिट पर जवाब दाखिल करने के लिए कुछ और समय मांगा। कोर्ट ने फिलहाल सुनवाई स्थगित करने का कोई भी आदेश नहीं दिया है हालांकि केन्द्र सरकार को इस बारे में लेटर सर्कुलेट करने की इजाजत दे दी है। गत 23 अप्रैल को कोर्ट ने राहुल गांधी अवमानना मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि 30 अप्रैल को अवमानना का मामला और राफेल फैसले का पुनर्विचार मांगने वाली याचिकाएं एक साथ सुनवाई के लिए लगाई जाएं। अभी तक सुप्रीम कोर्ट की मुख्य सुनवाई सूची में दोनों केस लगे हैं। हालांकि सप्लीमेन्ट्री सूची अभी जारी नहीं हुई है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं और उनके साथ लगाए गए दस्तावेजों को लेकर केन्द्र की ओर से उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियां खारिज कर दी थीं और याचिकाओं की मेरिट पर सुनवाई करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने कहा था कि वह दाखिल दस्तावेजों पर भी विचार करेगा। केन्द्र ने दस्तावेजों पर आपत्ति उठाते हुए कहा था कि ये चोरी से लीक दस्तावेजों से फोटोकापी कराए गए हैं और इन्हें सरकार की इजाजत के बगैर कहीं नहीं पेश किया जा सकता। केन्द्र ने दस्तावेजों को राष्ट्र की सुरक्षा के लिए भी खतरा बताया था।

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