Lok Sabha Election 2019: त्वरित टिप्पणी- पराजय पर पेशबंदी तो नहीं ईवीएम पर हंगामा EVMControversy LokSabhaElection2019
चिलचिलाती धूप और चढ़ते चुनावी पारे को देखकर गठबंधन ने पराजय की पेशबंदी अभी से शुरू कर दी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 21 पार्टियों के नेताओं की ईवीएम के मतों की 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों से मिलान करने की मांग खारिज कर दी तो उनकी ओर से यह कहा जाने लगा कि वे अपनी इस मांग पर जोर देना जारी रखेंगे। पांच चरण का चुनाव समाप्त होने के बाद विपक्षी नेताओं की ईवीएम को लेकर हायतौबा समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दो टूक यह कह देने के बावजूद कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार का इच्छुक नहीं है, सभी दल अब चुनाव आयोग जाने की बात कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि जो दल आज ईवीएम का रोना रो रहे हैं, बीते पांच साल में कभी न कभी उन्होंने कई राज्यों में चुनाव जीते हैं। आखिर इन दलों को बिहार, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों तक ईवीएम से कोई शिकायत क्यों नहीं थी? आम चुनावों के बीच उन्हें ईवीएम याद आने का सबब आखिर क्या है? क्या इसे गठबंधन के साथियों की हताशा का परिणाम माना जाए कि आधा चुनाव बीतने के बाद अब कांग्रेस और महागठबंधन को चुनाव नतीजों का डर सताने लगा है? अलग-अलग गठबंधन दल अपने-अपने राज्यों में चुनाव भले ही लड़ रहे हों, लेकिन बंद कमरे में उनके नेता यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी सरकार नहीं बन रही है। बावजूद इसके राहुल, प्रियंका और ममता की तीखी टिप्पणियां चुनावी माहौल में कड़वाहट घोल रही हैं। पिछले छह महीनों से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर उनके प्रवक्ता तक प्रधानमंत्री पर जो तमाम आरोप लगा रहे थे उनका जवाब उन्होंने कांग्रेस की सबसे कमजोर नस दबाकर किया। बोफोर्स सौदा कांग्रेस की सबसे कमजोर नस है। इससे कांग्रेस का संप्रग सरकार के दौरान बमुश्किल पीछा छूटा था। बोफोर्स मामला फिर सतह पर आने के कारण ही कांग्रेस की तिलमिलाहट और तेज हुई है। कांग्रेस का अपने नेताओं के बयानों पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा। जहां सैम पित्रोदा यह पूछ रहे हैं कि कुछ आतंकियों के हमले की सजा पूरे पाकिस्तान को क्यों दी जाए, वहीं अन्य नेता पाकिस्तान पर हमले के सुबूत मांग रहे। राजीव गांधी पर आक्रामण के बाद से तो कांग्रेस इतना तिलमिला गई है कि उसके नेता अपना आपा खोते जा रहे हैं। एक तरफ प्रियंका गांधी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए प्रधानमंत्री को ही लोकतंत्र का अपमान बता रही हैं, दूसरी तरफ ममता भी मोदी को प्रधानमंत्री मानने से इन्कार कर रही हैं। इसे लोकतंत्र में आस्था माना जाए या अनास्था? चुनाव नतीजों का भय विपक्षी दलों में इतना अधिक है कि उनके नेता पराजय स्वीकारने वाले बयान देने लगे हैं। कपिल सिब्बल का बयान यही बता रहा कि कांग्रेस हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। आखिर चुनाव के बीच बहुमत न मिलने की बात कहने की क्या आवश्यकता थी? कांग्रेस नेता एक तरफ हार स्वीकार कर रहे हैं और दूसरी ओर भाजपा और मोदी को गाली देकर अपनी आक्रामकता भी दिखा रहे हैं। लगता है कि चुनाव के बीच में अन्य विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस ने भी हारी हुई लड़ाई के नतीजों का सामना करने की भूमिका बनानी शुरू कर दी है और इसी कारण ईवीएम के मसले को उछाला जा रहा है। राहुल गांधी, प्रियंका और कांग्रेस के अन्य नेता तो बिना किसी सुबूत 'चौकीदार चोर है' के नारे का राग अलाप रहे हैं, लेकिन अपने ऊपर उठ रहे सवालों पर दोनों वरिष्ठ नेताओं समेत पूरी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। बैकअप्स मामले में उन्हें सांप सा सूंघ गया है। आजादी के बाद कौन सी पार्टी सत्ता में कितने दिन रही है और इस दौरान कितने रक्षा सौदे हुए हैं, यह पहले से सार्वजनिक है। राहुल, प्रियंका समेत अभी तक किसी भी कांग्रेसी नेता ने सफाई में कुछ नहीं कहा है। वे कम से कम यह तो बता ही सकते थे कि कंपनी क्यों स्थापित की गई, इससे बाहर क्यों निकले? विपक्षी दलों में गठबंधन का शोर करने के बाद कांग्रेस ने बिहार को छोड़ सब जगह अपने उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में गठबंधन के सामने कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। फिर भी दावा है कि विपक्ष का गठबंधन चुनाव लड़ रहा है। चंद्रबाबू नायडू जैसे जो नेता महागठबंधन का स्वरूप तय करने में सबसे आगे रहे, वे अब चुनाव परिणाम की आशंका भांपकर वीवीपैट पर्चियों के मिलान के बहाने हार की पेशबंदी करने में जुट गए हैं। इसका जवाब उन्हें 23 मई को मिल जाएगा।.
चिलचिलाती धूप और चढ़ते चुनावी पारे को देखकर गठबंधन ने पराजय की पेशबंदी अभी से शुरू कर दी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 21 पार्टियों के नेताओं की ईवीएम के मतों की 50 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों से मिलान करने की मांग खारिज कर दी तो उनकी ओर से यह कहा जाने लगा कि वे अपनी इस मांग पर जोर देना जारी रखेंगे। पांच चरण का चुनाव समाप्त होने के बाद विपक्षी नेताओं की ईवीएम को लेकर हायतौबा समझ से परे है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दो टूक यह कह देने के बावजूद कि वह अपने फैसले पर पुनर्विचार का इच्छुक नहीं है, सभी दल अब चुनाव आयोग जाने की बात कर रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि जो दल आज ईवीएम का रोना रो रहे हैं, बीते पांच साल में कभी न कभी उन्होंने कई राज्यों में चुनाव जीते हैं। आखिर इन दलों को बिहार, पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों तक ईवीएम से कोई शिकायत क्यों नहीं थी? आम चुनावों के बीच उन्हें ईवीएम याद आने का सबब आखिर क्या है? क्या इसे गठबंधन के साथियों की हताशा का परिणाम माना जाए कि आधा चुनाव बीतने के बाद अब कांग्रेस और महागठबंधन को चुनाव नतीजों का डर सताने लगा है? अलग-अलग गठबंधन दल अपने-अपने राज्यों में चुनाव भले ही लड़ रहे हों, लेकिन बंद कमरे में उनके नेता यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी सरकार नहीं बन रही है। बावजूद इसके राहुल, प्रियंका और ममता की तीखी टिप्पणियां चुनावी माहौल में कड़वाहट घोल रही हैं। पिछले छह महीनों से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर उनके प्रवक्ता तक प्रधानमंत्री पर जो तमाम आरोप लगा रहे थे उनका जवाब उन्होंने कांग्रेस की सबसे कमजोर नस दबाकर किया। बोफोर्स सौदा कांग्रेस की सबसे कमजोर नस है। इससे कांग्रेस का संप्रग सरकार के दौरान बमुश्किल पीछा छूटा था। बोफोर्स मामला फिर सतह पर आने के कारण ही कांग्रेस की तिलमिलाहट और तेज हुई है। कांग्रेस का अपने नेताओं के बयानों पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा। जहां सैम पित्रोदा यह पूछ रहे हैं कि कुछ आतंकियों के हमले की सजा पूरे पाकिस्तान को क्यों दी जाए, वहीं अन्य नेता पाकिस्तान पर हमले के सुबूत मांग रहे। राजीव गांधी पर आक्रामण के बाद से तो कांग्रेस इतना तिलमिला गई है कि उसके नेता अपना आपा खोते जा रहे हैं। एक तरफ प्रियंका गांधी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए प्रधानमंत्री को ही लोकतंत्र का अपमान बता रही हैं, दूसरी तरफ ममता भी मोदी को प्रधानमंत्री मानने से इन्कार कर रही हैं। इसे लोकतंत्र में आस्था माना जाए या अनास्था? चुनाव नतीजों का भय विपक्षी दलों में इतना अधिक है कि उनके नेता पराजय स्वीकारने वाले बयान देने लगे हैं। कपिल सिब्बल का बयान यही बता रहा कि कांग्रेस हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। आखिर चुनाव के बीच बहुमत न मिलने की बात कहने की क्या आवश्यकता थी? कांग्रेस नेता एक तरफ हार स्वीकार कर रहे हैं और दूसरी ओर भाजपा और मोदी को गाली देकर अपनी आक्रामकता भी दिखा रहे हैं। लगता है कि चुनाव के बीच में अन्य विपक्षी दलों के साथ-साथ कांग्रेस ने भी हारी हुई लड़ाई के नतीजों का सामना करने की भूमिका बनानी शुरू कर दी है और इसी कारण ईवीएम के मसले को उछाला जा रहा है। राहुल गांधी, प्रियंका और कांग्रेस के अन्य नेता तो बिना किसी सुबूत 'चौकीदार चोर है' के नारे का राग अलाप रहे हैं, लेकिन अपने ऊपर उठ रहे सवालों पर दोनों वरिष्ठ नेताओं समेत पूरी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। बैकअप्स मामले में उन्हें सांप सा सूंघ गया है। आजादी के बाद कौन सी पार्टी सत्ता में कितने दिन रही है और इस दौरान कितने रक्षा सौदे हुए हैं, यह पहले से सार्वजनिक है। राहुल, प्रियंका समेत अभी तक किसी भी कांग्रेसी नेता ने सफाई में कुछ नहीं कहा है। वे कम से कम यह तो बता ही सकते थे कि कंपनी क्यों स्थापित की गई, इससे बाहर क्यों निकले? विपक्षी दलों में गठबंधन का शोर करने के बाद कांग्रेस ने बिहार को छोड़ सब जगह अपने उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में गठबंधन के सामने कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। फिर भी दावा है कि विपक्ष का गठबंधन चुनाव लड़ रहा है। चंद्रबाबू नायडू जैसे जो नेता महागठबंधन का स्वरूप तय करने में सबसे आगे रहे, वे अब चुनाव परिणाम की आशंका भांपकर वीवीपैट पर्चियों के मिलान के बहाने हार की पेशबंदी करने में जुट गए हैं। इसका जवाब उन्हें 23 मई को मिल जाएगा।
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