ड्रैगन की ये कैसी चाल, आतंकी मसूद से मोहब्बत और शांति दूत दलाई लामा से नफरत masoodazhar Terrorists UNSC DalaiLama
चीन ने एक बार फिर पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की कोशिशों पर अड़ंगा लगा दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने मसूद अजहर के संबंध में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन ने इस पर वीटो लगा दिया। इस तरह से चीन ने एक बार फिर मसूद अजहर को बचा लिया और अपने दोस्त पाकिस्तान को भी। अगर मसूद अजहर वैश्विक आतंकी घोषित हो जाता तो पाकिस्तान पर उसकी धरती पर रह रहे इस आतंकवादी मास्टरमाइंड के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनता।चीन ने पिछले 10 साल में चौथी बार मसूद को लेकर अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल किया है। इससे पहले साल 2009 में भारत ने मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया था और दुनियाभर के देशों ने भारत के प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन चीन ने वीटो कर दिया। इसके बाद 2016 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के साथ भारत ने प्रस्ताव रखा था और चीन ने वीटो कर दिया। साल 2017 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन इस बार भी नहीं माना।चीन में उल्टी गंगा बहती है। दलाई लामा का मामला ही देख लें। दलाई लामा दुनियाभर में शांति का संदेश देते हैं। वह तिब्बतियों के सबसे बड़े धर्मगुरु हैं और दुनियाभर के बौद्धों की उनमें आस्था है। दुनिया उन्हें शांति दूत मानती है और उन्हें नोबेल शाति पुरुस्कार से नवाजती है। चीन दलाई लामा से न सिर्फ नफरत करता है, बल्कि किसी वैश्विक नेता से उनके मिलने पर बिफर भी पड़ता है। दूसरी तरफ जिस आतंकवादी मसूद अजहर से दुनिया त्रस्त है उसे बचाने के लिए वह वीटो का इस्तेमाल करता है, वह भी एक-दो बार नहीं चार-चार बार। अब तो आप भी कहेंगे कि हमारे इस पड़ोसी देश में सच में उल्टी गंगा बहती है।1959 में स्वतंत्रता के लिए उठी तिब्बत की मांग को 60 साल का वक्त बीत चुका है। उसी वक्त दलाई लामा भारत आ गए थे। चीन में शासक तो बदले, लेकिन दलाई लामा को लेकर नजरिया नहीं बदला। चीनी अधिकारी दलाई लामा को 'भिक्षु के कपड़ों में भेड़िया' बताते हैं। उनका मानना है कि दलाई लामा तिब्बत की स्वतंत्रता के पैरोकार हैं और वह उनके देश की संप्रभुता को नष्ट करना चाहते हैं। हालांकि, दलाई लामा चीन से तिब्बत की स्वतंत्रता की वकालत नहीं करते। वह तो तिब्बत क्षेत्र के लिए स्वायत्तता चाहते हैं, ताकि तिब्बतियों को चीन के शासन में उनकी सांस्कृतिक, भाषा और धर्म को बनाए रखने की आजादी मिल सके।पाकिस्तान मसूद अजहर को आतंकवादी नहीं मानता, ऐसे में उसका ऑल वैदर फ्रेंड चीन कैसे मान सकता है। मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान और चीन की दोस्ती ही आड़े आ रही है। चीन अपने इस दोस्त को खुश करना चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान में चीन ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है और इसके लिए CPEC बना रहा है। चीन यूएन में अपने वीटो का इस्तेमाल पाकिस्तान और मसूद अजहर को बचाने के लिए करता है तो पाकिस्तान भी उसकी खूब मदद करता है। पाकिस्तान मुस्लिम देशों के संगठन , गुट निर्पेक्ष आंदोलन में चीन का पक्ष रखता है। यही नहीं चीन में उईगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर भी पाकिस्तान हमेशा उसका बचाव करता है।चीन यह भी जानता है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत ही उसे कड़ी टक्कर दे सकता है। ऐसे में वह भारत को दक्षिण एशिया की समस्याओं में घेरे रखना चाहता है, ताकि भारत उसे टक्कर न दे पाए। भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ शांति या उसे दंडित करने के फैसले का समर्थन उसकी नीतियों के खिलाफ है। अगर भारत इन छोटी-छोटी परेशानियों से निकल जाएगा तो वह कई मामलों में चीन को पीछे छोड़ सकता है, जो चीन को बिल्कुल भी गंवारा नहीं। इसके अलावा चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का भी भारत समर्थन नहीं करता। यही नहीं दलाई लामा को शरण देने का बदला भी चीन मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में अड़ंगा लगाकर लेना चाहता है।.
चीन ने एक बार फिर पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने की कोशिशों पर अड़ंगा लगा दिया है। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने मसूद अजहर के संबंध में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन ने इस पर वीटो लगा दिया। इस तरह से चीन ने एक बार फिर मसूद अजहर को बचा लिया और अपने दोस्त पाकिस्तान को भी। अगर मसूद अजहर वैश्विक आतंकी घोषित हो जाता तो पाकिस्तान पर उसकी धरती पर रह रहे इस आतंकवादी मास्टरमाइंड के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बनता।चीन ने पिछले 10 साल में चौथी बार मसूद को लेकर अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल किया है। इससे पहले साल 2009 में भारत ने मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया था और दुनियाभर के देशों ने भारत के प्रस्ताव का समर्थन किया था, लेकिन चीन ने वीटो कर दिया। इसके बाद 2016 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के साथ भारत ने प्रस्ताव रखा था और चीन ने वीटो कर दिया। साल 2017 में अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस ने प्रस्ताव रखा था, लेकिन चीन इस बार भी नहीं माना।चीन में उल्टी गंगा बहती है। दलाई लामा का मामला ही देख लें। दलाई लामा दुनियाभर में शांति का संदेश देते हैं। वह तिब्बतियों के सबसे बड़े धर्मगुरु हैं और दुनियाभर के बौद्धों की उनमें आस्था है। दुनिया उन्हें शांति दूत मानती है और उन्हें नोबेल शाति पुरुस्कार से नवाजती है। चीन दलाई लामा से न सिर्फ नफरत करता है, बल्कि किसी वैश्विक नेता से उनके मिलने पर बिफर भी पड़ता है। दूसरी तरफ जिस आतंकवादी मसूद अजहर से दुनिया त्रस्त है उसे बचाने के लिए वह वीटो का इस्तेमाल करता है, वह भी एक-दो बार नहीं चार-चार बार। अब तो आप भी कहेंगे कि हमारे इस पड़ोसी देश में सच में उल्टी गंगा बहती है।1959 में स्वतंत्रता के लिए उठी तिब्बत की मांग को 60 साल का वक्त बीत चुका है। उसी वक्त दलाई लामा भारत आ गए थे। चीन में शासक तो बदले, लेकिन दलाई लामा को लेकर नजरिया नहीं बदला। चीनी अधिकारी दलाई लामा को 'भिक्षु के कपड़ों में भेड़िया' बताते हैं। उनका मानना है कि दलाई लामा तिब्बत की स्वतंत्रता के पैरोकार हैं और वह उनके देश की संप्रभुता को नष्ट करना चाहते हैं। हालांकि, दलाई लामा चीन से तिब्बत की स्वतंत्रता की वकालत नहीं करते। वह तो तिब्बत क्षेत्र के लिए स्वायत्तता चाहते हैं, ताकि तिब्बतियों को चीन के शासन में उनकी सांस्कृतिक, भाषा और धर्म को बनाए रखने की आजादी मिल सके।पाकिस्तान मसूद अजहर को आतंकवादी नहीं मानता, ऐसे में उसका ऑल वैदर फ्रेंड चीन कैसे मान सकता है। मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान और चीन की दोस्ती ही आड़े आ रही है। चीन अपने इस दोस्त को खुश करना चाहता है, क्योंकि पाकिस्तान में चीन ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है और इसके लिए CPEC बना रहा है। चीन यूएन में अपने वीटो का इस्तेमाल पाकिस्तान और मसूद अजहर को बचाने के लिए करता है तो पाकिस्तान भी उसकी खूब मदद करता है। पाकिस्तान मुस्लिम देशों के संगठन , गुट निर्पेक्ष आंदोलन में चीन का पक्ष रखता है। यही नहीं चीन में उईगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर भी पाकिस्तान हमेशा उसका बचाव करता है।चीन यह भी जानता है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत ही उसे कड़ी टक्कर दे सकता है। ऐसे में वह भारत को दक्षिण एशिया की समस्याओं में घेरे रखना चाहता है, ताकि भारत उसे टक्कर न दे पाए। भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ शांति या उसे दंडित करने के फैसले का समर्थन उसकी नीतियों के खिलाफ है। अगर भारत इन छोटी-छोटी परेशानियों से निकल जाएगा तो वह कई मामलों में चीन को पीछे छोड़ सकता है, जो चीन को बिल्कुल भी गंवारा नहीं। इसके अलावा चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का भी भारत समर्थन नहीं करता। यही नहीं दलाई लामा को शरण देने का बदला भी चीन मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में अड़ंगा लगाकर लेना चाहता है।
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