लखनऊ में सड़क निर्माण में फुल डेप्थ रिक्लेमेशन एफडीआर तकनीक के इस्तेमाल में कई दिक्कतें आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही जानकारी और प्रशिक्षण की कमी से गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों के साथ मिलकर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने का सुझाव दिया गया...
दिलीप शर्मा, लखनऊ। पर्यावरण संतुलन के साथ कम लागत में अधिक मजबूत सड़क बनाने की फुल डेप्थ रिक्लेमेशन तकनीक के उपयोग में अब भी बहुत मुश्किलें आ रही हैं। तकनीक की पूरी जानकारी न होना और प्रशिक्षण का अभाव, गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इसके समाधान के लिए अब आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों का सहयोग लेने की तैयारी की जा रही है। उप्र ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण और इंडियन रोड कांग्रेस द्वारा आयोजित सेमिनार में विशेषज्ञों ने सरकार को इन संस्थानों के साथ साझेदारी में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित कराने का सुझाव दिया है। यूपीआरआरडीए इस सुझाव पर आगे कदम उठाने जा रहा है। इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में ‘सड़क निर्माण में एफडीआर तकनीक व ग्रीन टेक्नोलॉजी का उपयोग’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार में एडीजी सड़क परिहवन एवं राजमार्ग मंत्रालय सुदीप चौधरी, आईआईटी बीएचयू के प्रोफेसर डॉ.
अंकित गुप्ता ने एफडीआर में गुणवत्ता नियंत्रण की चुनौतियों और यूपीआरआरडीए के मुख्य अभियंता ब्रजेश कुमार दुबे ने उप्र में आ रही मुश्किलों पर चर्चा की। विशेषज्ञों ने बताया कि ठेकेदारों द्वारा रिसाइक्लर, रिक्लेमर जैसे प्रमुख उपकरणों के बजाय अस्थायी व्यवस्थाएं अपनाने से गुणवत्ता में समझौता होता है। सीमेंट की कम और ज्यादा मात्रा एफडीआर बेस की मजबूती पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। विशेषज्ञों ने कहा कि सड़क निर्माण से जुड़े बहुत से इंजीनियर पारंपरिक तकनीकों से परिचित हैं, लेकिन एफडीआर की पूरी जानकारी का अभाव है। स्टेबलाइजर की मात्रा, गहराई नियंत्रण और नमी सही न होने से दिक्कत होती हैं। बिटुमिन निर्माण, रिक्लेमर्स के संचालन, स्टेबलाइजर के फैलाव को नियंत्रित करने आदि के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, परंतु पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में अक्सर सही से काम नहीं हो पाता। सुझाव दिया गया कि एफडीआर परियोजनाओं की गुणवत्ता में सुधार को राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रम स्थापित किया जाना चाहिए। आईआईटी और एनआईटी जैसे संस्थानों के साथ साझेदारी में प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित कर इंजीनियरों, ठेकेदारों और मशीन आपरेटरों की क्षमता निर्माण का काम किया जाए। प्रशिक्षण में एफडीआर की उचित तकनीकों, उपकरणों के उपयोग और गुणवत्ता नियंत्रण को शामिल किया जाए। इस पर सहमति से आगे बढ़ने की बात कही गई। सेमिनार में आइआरसी के ड्राफ्टिंग कमेटी चेयरमैन डॉ. सुधीर माथुर ने एफडीआर तकनीक पर प्रस्तावित आईआरसी कोड के बिंदुओं पर चर्चा कर फीडबैक लिया। एफडीआर व अन्य हरित तकनीक के प्रयोग पर अन्य विशेषज्ञों ने भी विचार रखे।
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