International Women's Day: पढ़ें- साहिर के वे गीत जो बयां करते हैं महिलाओं के हालात InternationalWomensDay महिलादिवस HappyWomensDay2019
वो सुबह कभी तो आएगी .अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगीटूटेंगे कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी कीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों में धूल न फेंकेगावो सुबह कभी तो आएगी। 8 मार्च 1921 को जन्में मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने 59 साल की उम्र में 1980 में दुनिया को अलविदा कहा था। लेकिन, उनके गीत आज भी उतने ही ताजा और अर्थपूर्ण नज़र आते हैं। उनकी शायरी और नगमों के अलावा कई किस्से भी मशहूर हैं। मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम और उनकी प्रेम कहानी भी इन्हीं में से एक है। जैसे साहिर को लेकर एक यह किस्सा काफी प्रचलित है कि वो एक बार कार से लुधियाना जा रहे थे। मशहूर उपन्यासकार कृश्न चंदर भी उनके साथ थे। शिवपुरी के पास डाकू मान सिंह ने उनकी कार रोक कर उसमें सवार सभी लोगों को बंधक बना लिया। जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने ही डाकुओं के जीवन पर बनी फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के गाने लिखे थे तो उन्होंने उन्हें सम्मानसहित जाने दिया था। यह करिश्मा था शायर साहिर का! उनके शब्दों और गीतों ने हिंदी सिनेमा और हिंदुस्तान की अवाम पर भी एक गहरा असर छोड़ा है। आज भी प्यासा फ़िल्म से उनकी यह पंक्तियां कितनी प्रासंगिक जान पड़ती है। "ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के,ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,कहां है कहां है मुहाफ़िज़ खुदी के? जिन्हें नाज़ है हिंद पर,वो कहां हैं?" ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। आज ही नहीं आने वाले कल और अगली सदी के शायर हैं साहिर। 1963 में आई ताजमहल के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके बाद 1976 में उन्होंने कभी कभी के गीत 'मैं पल दो पल का शायर हूं' के लिए भी फ़िल्म फेयर जीता। कैफ़ी आज़मी ने अपने दोस्त और शायर साहिर साहब के लिए कहा है- "साढ़े पांच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी लंबी लचकीली टांगे, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आंखें, आंखों से झींपा –झींपा सा तफ़क्कुर, बड़े बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन।" साहिर के व्यक्तित्व का इससे बेहतर डिस्क्रिप्शन आपको शायद ही मिले।साहिर बहुत रईस खानदान से थे, लेकिन मां के पिता से अलग रहने की वजह से उन्हें दिन गरीबी में काटने पड़े।कहा जाता है कि साहिर से अमृता प्रीतम एक तरफा प्रेम करती थींइस शायर का 25 अक्टूबर, 1980 को निधन हो गया।.
वो सुबह कभी तो आएगी ...अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमाएगीटूटेंगे कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी कीमजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों में धूल न फेंकेगावो सुबह कभी तो आएगी। 8 मार्च 1921 को जन्में मशहूर शायर साहिर लुधियानवी ने 59 साल की उम्र में 1980 में दुनिया को अलविदा कहा था। लेकिन, उनके गीत आज भी उतने ही ताजा और अर्थपूर्ण नज़र आते हैं। उनकी शायरी और नगमों के अलावा कई किस्से भी मशहूर हैं। मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम और उनकी प्रेम कहानी भी इन्हीं में से एक है। जैसे साहिर को लेकर एक यह किस्सा काफी प्रचलित है कि वो एक बार कार से लुधियाना जा रहे थे। मशहूर उपन्यासकार कृश्न चंदर भी उनके साथ थे। शिवपुरी के पास डाकू मान सिंह ने उनकी कार रोक कर उसमें सवार सभी लोगों को बंधक बना लिया। जब साहिर ने उन्हें बताया कि उन्होंने ही डाकुओं के जीवन पर बनी फ़िल्म 'मुझे जीने दो' के गाने लिखे थे तो उन्होंने उन्हें सम्मानसहित जाने दिया था। यह करिश्मा था शायर साहिर का! उनके शब्दों और गीतों ने हिंदी सिनेमा और हिंदुस्तान की अवाम पर भी एक गहरा असर छोड़ा है। आज भी प्यासा फ़िल्म से उनकी यह पंक्तियां कितनी प्रासंगिक जान पड़ती है। "ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के,ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,कहां है कहां है मुहाफ़िज़ खुदी के? जिन्हें नाज़ है हिंद पर,वो कहां हैं?" ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं। आज ही नहीं आने वाले कल और अगली सदी के शायर हैं साहिर। 1963 में आई ताजमहल के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके बाद 1976 में उन्होंने कभी कभी के गीत 'मैं पल दो पल का शायर हूं' के लिए भी फ़िल्म फेयर जीता। कैफ़ी आज़मी ने अपने दोस्त और शायर साहिर साहब के लिए कहा है- "साढ़े पांच फ़ुट का क़द, जो किसी तरह सीधा किया जा सके तो छह फ़ुट का हो जाए, लंबी लंबी लचकीली टांगे, पतली सी कमर, चौड़ा सीना, चेहरे पर चेचक के दाग़, सरकश नाक, ख़ूबसूरत आंखें, आंखों से झींपा –झींपा सा तफ़क्कुर, बड़े बड़े बाल, जिस्म पर क़मीज़, मुड़ी हुई पतलून और हाथ में सिगरेट का टिन।" साहिर के व्यक्तित्व का इससे बेहतर डिस्क्रिप्शन आपको शायद ही मिले।साहिर बहुत रईस खानदान से थे, लेकिन मां के पिता से अलग रहने की वजह से उन्हें दिन गरीबी में काटने पड़े।कहा जाता है कि साहिर से अमृता प्रीतम एक तरफा प्रेम करती थींइस शायर का 25 अक्टूबर, 1980 को निधन हो गया।
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