India-EU FTA Message to Trump: यूरोप ने अमेरिका को जवाब देने के लिए भारत को चुना है। दोनों के बीच एक विशाल मुक्त-व्यापार समझौता होने वाला है। यह समझौता भारत को अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने का मौका देगा। इससे वैश्विक कूटनीति में भारत की स्थिति मजबूत...
नई दिल्ली: भारत दुनिया की डिप्लोमेसी का अखाड़ा बन चुका है। यूरोप ने उसे अमेरिका को काउंटर करने के लिए चुना है। यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वॉन डेर लेयेन ने भारत की सरजमीं को यूरोपीय स्वतंत्रता की घोषणा का केंद्र बनाया है। उन्होंने कहा कि वह भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए नई दिल्ली की यात्रा कर रही हैं। उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच दशकों से चल रहे विशाल मुक्त-व्यापार समझौते में जो भी कमियां रह गई हैं, उन्हें दूर किया जाएगा। यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हो रहा है। वॉन डेर लेयेन इस समझौते को 'सभी सौदों का बाप' कह चुकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'हां' इस डील के आगे बढ़ने का रास्ता खोल देगी। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत को इसकी जरूरत है या यूरोप इसे चाहता है, बल्कि इसलिए भी कि इसका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर असर पड़ेगा। सही मायनों में यह डील नहीं, डिप्लोमेसी है। इसमें भारत पूरी तरह से शामिल हो चुका है। नई दिल्ली से यूरोप और भारत दोनों ट्रंप को मैसेज दे रहे हैं। यूरोप ने क्यों लगा दिया है जोर?यूरोपीय देश अभी इस समझौते के लिए जोर क्यों लगा रहे हैं, यह साफ है। यूरोप चारों तरफ से मुश्किलों में घिरा है। रूस की आक्रामकता, चीन का दबाव और अपनी कई कमजोरियां। ऊपर से अमेरिका की ओर से छोड़े जाने की चिंताएं अब वाशिंगटन के डराने-धमकाने के डर में बदल गई हैं। इसके उलट भारत स्थिरता का प्रतीक है। यह एक ऐसा बाजार प्रदान करता है जो लगातार बढ़ रहा है। भारत कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं करता। हो सकता है कि नई दिल्ली जलवायु या यूक्रेन जैसे मुद्दों पर यूरोप की राजधानियों से पूरी तरह सहमत न हो। लेकिन, कम से कम वह उन्हें धमकाने, उनकी संपत्ति छीनने या अपमानित करने की कोशिश नहीं करता।वॉन डेर लेयेन भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उम्मीद के अनुसार ही पीएम मोदी ने उनका भव्य स्वागत किया। मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत 2025 के अंत तक पूरी होनी थी। हालांकि, नई दिल्ली ने पिछले कुछ महीनों में व्हाइट हाउस को देखकर अपने कदम पीछे खींचे। वह नहीं चाहता था कि यूरोपीय संघ को दी गई उसकी रियायतें 'अमेरिका फर्स्ट' के विचारकों की नई मांगों का आधार बनें। पहले अधिक अस्थिर साथी के साथ संबंधों को सुलझाना समझदारी का काम था।भारत झुककर नहीं करेगा कोई समझौता हालांकि, भारत पिट्ठू बनने के लिए जरा भी तैयार नहीं है। वह अपनी शर्तों के साथ ही समझौता करेगा। इससे अमेरिका के साथ समझौते में रुकावटें आई हैं। ट्रंप चाहते हैं कि नई दिल्ली खुद को नीचा दिखाए। राष्ट्रपति ट्रंप को न केवल सौदा करने की क्षमता के लिए श्रेय दे, बल्कि उपमहाद्वीप में शांति लाने के लिए उनका धन्यवाद भी करे। यह पीएम मोदी के लिए संभव नहीं है। उनका राष्ट्रवादी आधार इसकी अनुमति नहीं देता। वैसे भी यह हमेशा से ही अपेक्षित नहीं था कि रियायतों का कोई जादुई सेट ट्रंप को भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ को वापस लेने के लिए प्रेरित करेगा। ट्रंप की सोच रही है कि भारत अनुचित रूप से मुफ्त में कुछ प्राप्त कर रहा है। यह उन्हें साझेदारी और एकीकरण के फायदों को स्वीकार करने से रोकता है। नई दिल्ली में इस बात की चिंता कि व्हाइट हाउस भारत-यूरोपीय संघ के सौदे पर कैसे प्रतिक्रिया करेगा, जायज है। संरक्षणवादियों के लिए हर वह व्यापार समझौता जिस पर उनके साथ हस्ताक्षर नहीं किए जाते, वह उनके खिलाफ ही होता है। ट्रंप के बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, उससे पता चलता है कि वह इसे खुली अवमानना मानेंगे। एक ऐसा महाद्वीप जिसे उन्होंने हाल में मजाक का पात्र बनाया। दबाव डाला। अब वह एक ऐसे देश के साथ मिलकर उनके खिलाफ खड़ा हो रहा है जिसे वह कोने में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया अनुचित हो सकती है।इतिहास बनाने का यही है समय मोदी को इसका स्वागत करना चाहिए। उन्हें अमेरिकी दबाव के बावजूद नहीं, बल्कि उसी के कारण हस्ताक्षर करना चाहिए। ट्रंप ताकत का सम्मान करते हैं या कम से कम उसकी उपस्थिति का। यूरोप और ब्राजील को धमकाया जाता है। चीन और रूस को नहीं। एक प्रतिकूल अमेरिका का सामना करते हुए भारत ने पाया है कि उसके पास चिंताजनक रूप से बहुत कम मोलभाव की शक्ति है। अगर वह अमेरिका को यह दिखाने के तरीके ढूंढ रहा है कि वह पीछे नहीं हटेगा तो इतिहास के सबसे बड़े द्विपक्षीय सौदों में से एक पर हस्ताक्षर करना एक आदर्श तरीका लगता है।मोदी के मतदाता भी ताकत की तलाश में हैं। हो सकता है कि वे डेटा गोपनीयता नियमों की बारीकियों में रुचि न रखते हों। लेकिन, वे जानते हैं कि जब उनके प्रधानमंत्री कोई रुख अपनाते हैं तो कैसे प्रतिक्रिया देनी है। जैसे कि इस सटीक क्षण में यूरोप के साथ व्यवहार करना, जब वह ट्रंप के गुस्से का केंद्र रहा है। वे इसे इस बात का और सबूत मानेंगे कि भारत एक भीड़भाड़ वाली, प्रतिकूल दुनिया को अपनी शर्तों पर संभाल सकता है।जो कुछ भी अब मेज पर है, वह शायद एकदम सही नहीं होगा। यह सौदा अधूरा हो सकता है। इसमें कुछ कृषि उत्पाद शामिल न हों। यह भारतीय कार निर्माताओं को वह सुरक्षा न दे जो वे चाहते हैं। यूरोपीय पार्टनर्स शायद श्रम और पर्यावरणीय प्रावधानों के बारे में चिंता करेंगे। लेकिन, समझौते के लिए जितना लंबा इंतजार होगा, इस संभावना के पल के गुजर जाने का उतना ही अधिक मौका होगा। और जितना बड़ा सौदा होगा, उतनी ही अधिक आशंका है कि यूरोपीय संसद इसे किसी तरह के कानूनी नरक में डाल देगी। जैसा कि उसने अभी लैटिन अमेरिका के साथ समझौते के लिए किया है। बातचीत में पूर्णतावाद पंगुता के समान है।यूरोप के साथ एक सौदा सील करना जरूरी है। समय की मांग है। अमेरिका को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि भारत के पास विकल्प हैं। वह उन पर कार्रवाई कर सकता है। संयोग से यह अमेरिका की ओर से चीन के खिलाफ लगाए गए व्यापार बाधाओं से निराश भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊर्जा की एक नई दिशा प्रदान करेगा। कहा जा रहा है कि यह सौदा ऐतिहासिक होगा। अगर ऐसा है तो इतिहास बनाने का समय आ गया है।.
नई दिल्ली: भारत दुनिया की डिप्लोमेसी का अखाड़ा बन चुका है। यूरोप ने उसे अमेरिका को काउंटर करने के लिए चुना है। यूरोपियन कमीशन की प्रेसिडेंट उर्सला वॉन डेर लेयेन ने भारत की सरजमीं को यूरोपीय स्वतंत्रता की घोषणा का केंद्र बनाया है। उन्होंने कहा कि वह भारत के साथ संबंधों को मजबूत करने के लिए नई दिल्ली की यात्रा कर रही हैं। उम्मीद है कि दोनों देशों के बीच दशकों से चल रहे विशाल मुक्त-व्यापार समझौते में जो भी कमियां रह गई हैं, उन्हें दूर किया जाएगा। यह समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हो रहा है। वॉन डेर लेयेन इस समझौते को 'सभी सौदों का बाप' कह चुकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'हां' इस डील के आगे बढ़ने का रास्ता खोल देगी। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत को इसकी जरूरत है या यूरोप इसे चाहता है, बल्कि इसलिए भी कि इसका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर असर पड़ेगा। सही मायनों में यह डील नहीं, डिप्लोमेसी है। इसमें भारत पूरी तरह से शामिल हो चुका है। नई दिल्ली से यूरोप और भारत दोनों ट्रंप को मैसेज दे रहे हैं। यूरोप ने क्यों लगा दिया है जोर?यूरोपीय देश अभी इस समझौते के लिए जोर क्यों लगा रहे हैं, यह साफ है। यूरोप चारों तरफ से मुश्किलों में घिरा है। रूस की आक्रामकता, चीन का दबाव और अपनी कई कमजोरियां। ऊपर से अमेरिका की ओर से छोड़े जाने की चिंताएं अब वाशिंगटन के डराने-धमकाने के डर में बदल गई हैं। इसके उलट भारत स्थिरता का प्रतीक है। यह एक ऐसा बाजार प्रदान करता है जो लगातार बढ़ रहा है। भारत कोई बड़ा खतरा पैदा नहीं करता। हो सकता है कि नई दिल्ली जलवायु या यूक्रेन जैसे मुद्दों पर यूरोप की राजधानियों से पूरी तरह सहमत न हो। लेकिन, कम से कम वह उन्हें धमकाने, उनकी संपत्ति छीनने या अपमानित करने की कोशिश नहीं करता।वॉन डेर लेयेन भारत के गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उम्मीद के अनुसार ही पीएम मोदी ने उनका भव्य स्वागत किया। मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत 2025 के अंत तक पूरी होनी थी। हालांकि, नई दिल्ली ने पिछले कुछ महीनों में व्हाइट हाउस को देखकर अपने कदम पीछे खींचे। वह नहीं चाहता था कि यूरोपीय संघ को दी गई उसकी रियायतें 'अमेरिका फर्स्ट' के विचारकों की नई मांगों का आधार बनें। पहले अधिक अस्थिर साथी के साथ संबंधों को सुलझाना समझदारी का काम था।भारत झुककर नहीं करेगा कोई समझौता हालांकि, भारत पिट्ठू बनने के लिए जरा भी तैयार नहीं है। वह अपनी शर्तों के साथ ही समझौता करेगा। इससे अमेरिका के साथ समझौते में रुकावटें आई हैं। ट्रंप चाहते हैं कि नई दिल्ली खुद को नीचा दिखाए। राष्ट्रपति ट्रंप को न केवल सौदा करने की क्षमता के लिए श्रेय दे, बल्कि उपमहाद्वीप में शांति लाने के लिए उनका धन्यवाद भी करे। यह पीएम मोदी के लिए संभव नहीं है। उनका राष्ट्रवादी आधार इसकी अनुमति नहीं देता। वैसे भी यह हमेशा से ही अपेक्षित नहीं था कि रियायतों का कोई जादुई सेट ट्रंप को भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ को वापस लेने के लिए प्रेरित करेगा। ट्रंप की सोच रही है कि भारत अनुचित रूप से मुफ्त में कुछ प्राप्त कर रहा है। यह उन्हें साझेदारी और एकीकरण के फायदों को स्वीकार करने से रोकता है। नई दिल्ली में इस बात की चिंता कि व्हाइट हाउस भारत-यूरोपीय संघ के सौदे पर कैसे प्रतिक्रिया करेगा, जायज है। संरक्षणवादियों के लिए हर वह व्यापार समझौता जिस पर उनके साथ हस्ताक्षर नहीं किए जाते, वह उनके खिलाफ ही होता है। ट्रंप के बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, उससे पता चलता है कि वह इसे खुली अवमानना मानेंगे। एक ऐसा महाद्वीप जिसे उन्होंने हाल में मजाक का पात्र बनाया। दबाव डाला। अब वह एक ऐसे देश के साथ मिलकर उनके खिलाफ खड़ा हो रहा है जिसे वह कोने में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया अनुचित हो सकती है।इतिहास बनाने का यही है समय मोदी को इसका स्वागत करना चाहिए। उन्हें अमेरिकी दबाव के बावजूद नहीं, बल्कि उसी के कारण हस्ताक्षर करना चाहिए। ट्रंप ताकत का सम्मान करते हैं या कम से कम उसकी उपस्थिति का। यूरोप और ब्राजील को धमकाया जाता है। चीन और रूस को नहीं। एक प्रतिकूल अमेरिका का सामना करते हुए भारत ने पाया है कि उसके पास चिंताजनक रूप से बहुत कम मोलभाव की शक्ति है। अगर वह अमेरिका को यह दिखाने के तरीके ढूंढ रहा है कि वह पीछे नहीं हटेगा तो इतिहास के सबसे बड़े द्विपक्षीय सौदों में से एक पर हस्ताक्षर करना एक आदर्श तरीका लगता है।मोदी के मतदाता भी ताकत की तलाश में हैं। हो सकता है कि वे डेटा गोपनीयता नियमों की बारीकियों में रुचि न रखते हों। लेकिन, वे जानते हैं कि जब उनके प्रधानमंत्री कोई रुख अपनाते हैं तो कैसे प्रतिक्रिया देनी है। जैसे कि इस सटीक क्षण में यूरोप के साथ व्यवहार करना, जब वह ट्रंप के गुस्से का केंद्र रहा है। वे इसे इस बात का और सबूत मानेंगे कि भारत एक भीड़भाड़ वाली, प्रतिकूल दुनिया को अपनी शर्तों पर संभाल सकता है।जो कुछ भी अब मेज पर है, वह शायद एकदम सही नहीं होगा। यह सौदा अधूरा हो सकता है। इसमें कुछ कृषि उत्पाद शामिल न हों। यह भारतीय कार निर्माताओं को वह सुरक्षा न दे जो वे चाहते हैं। यूरोपीय पार्टनर्स शायद श्रम और पर्यावरणीय प्रावधानों के बारे में चिंता करेंगे। लेकिन, समझौते के लिए जितना लंबा इंतजार होगा, इस संभावना के पल के गुजर जाने का उतना ही अधिक मौका होगा। और जितना बड़ा सौदा होगा, उतनी ही अधिक आशंका है कि यूरोपीय संसद इसे किसी तरह के कानूनी नरक में डाल देगी। जैसा कि उसने अभी लैटिन अमेरिका के साथ समझौते के लिए किया है। बातचीत में पूर्णतावाद पंगुता के समान है।यूरोप के साथ एक सौदा सील करना जरूरी है। समय की मांग है। अमेरिका को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि भारत के पास विकल्प हैं। वह उन पर कार्रवाई कर सकता है। संयोग से यह अमेरिका की ओर से चीन के खिलाफ लगाए गए व्यापार बाधाओं से निराश भारतीय अर्थव्यवस्था को ऊर्जा की एक नई दिशा प्रदान करेगा। कहा जा रहा है कि यह सौदा ऐतिहासिक होगा। अगर ऐसा है तो इतिहास बनाने का समय आ गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उर्सला वॉन डेर लेयेन डोनाल्ड ट्रंप भारत-ईयू एफटीए ट्रंप को मैसेज India-Eu Fta Prime Minister Narendra Modi Ursula Von Der Leyen Donald Trump India-Eu Fta Message To Trump
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