H1B Visa Fee Hike: एच1बी वीजा की फीस बढ़ना भारत के लिए अच्छी खबर, जानिए क्यों

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H1B Visa Fee Hike: एच1बी वीजा की फीस बढ़ना भारत के लिए अच्छी खबर, जानिए क्यों
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H1B Visa Fee Hike: शुक्रवार को ट्रंप ने एच1बी वीजा के लिए सालाना फीस को बढ़ाकर एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) कर दिया. ट्रंप के इस फैसले के तीन दिन बाद जो संकेत मिल रहे हैं, उससे अमेरिकी राष्ट्रपति का पारा और चढ़ने की आशंका है. चलिए जानते हैं.

H1B Visa: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुस्से में हैं. अपने मित्र नरेंद्र मोदी की तारीफ वो करते हैं, क्योंकि उन्हें अमेरिका की व्यावसायिक बादशाहत को बनाए रखना है. उन्हें गुस्सा इसलिए आ रहा है क्योंकि उनके टैरिफ बम का भारत पर खास असर पड़ता नहीं दिख रहा.

उल्टे भारत ने रूस और चीन के साथ दोस्ती बढ़ाकर अमेरिका के लिए मुसीबत खड़ी कर दी. मित्र की बेवफाई से नाराज ट्रंप ने अब एच1बी वीजा बम फोड़ा है. ट्रंप के फैसले के तीन दिन बाद जो संकेत मिल रहे हैं, उससे अमेरिकी राष्ट्रपति का पारा और चढ़ने की आशंका है. ये सच है कि भारतीयों के लिए अमेरिका में नौकरी का सपना दुरूह हो जाएगा, लेकिन अमेरिकी कंपनियों को भी एक बड़े टैलेंट पूल से वंचित रहना होगा. अमेरिका से वापस लौटने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए देश में ही नौकरियों के अवसर भी बढ़ेंगे, क्योंकि अब कंपनियां ऑफशोरिंग पर जोर देंगी. यानी गुस्से में आकर ट्रंप भारत के खिलाफ फैसले तो ले रहे हैं, लेकिन इससे कहीं न कहीं अमेरिका को ही नुकसान होने के आसार दिख रहे हैं. एच1बी वीजा की फीस बढ़ाई शुक्रवार को ट्रंप ने एच1बी वीजा के लिए सालाना फीस को बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका हर साल 65 हजार एच1बी वीजा देता है. इसके अलावा 20 हजार अतिरिक्त वीजा दिए जाते हैं. इनमें से करीब 70 प्रतिशत वीजा भारतीयों को मिलते हैं. इसमें भी सबसे ज्यादा आईटी प्रोफेशनल्स होते हैं. इससे स्पष्ट है कि फैसले का सबसे ज्यादा असर भारतीयों पर होगा. फैसले के ऐलान के बाद मची अफरा-तफरी से इसका अंदाजा लगता है. भारतीय आईटी कंपनियों को भी शुरुआत में समस्याएं हो सकती हैं क्योंकि उनके वर्कफोर्स का एक हिस्सा अमेरिका में भी होता है. हालांकि, फैसले का असली असर करीब छह महीने बाद देखने को मिल सकता है. अमेरिका में कम हो जाएंगी नौकरियां? इस फैसले का एक असर ये होगा कि अमेरिकी कंपनियों के लिए भी लागत बढ़ जाएगी. उन्हें स्किल्ड प्रोफेशनल्स की भी कमी होगी. इसके चलते वे ऑफशोरिंग का विकल्प चुनने को मजबूर होंगी. भारत में कम लागत और प्रोफेशनल्स की मौजूदगी के कारण वे इधर का रुख कर सकती हैं. अमेरिकी कंपनियां भारत में अपने थर्ड पार्टी सर्विस प्रोवाइडर्स यानी भारतीय आईटी कंपनियों या ग्लोबल कैपेसिटी सेंटर्स में ज्यादा भर्तियों का तरीका भी अपना सकती हैं. इससे देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. इससे रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा मिलेगा और टैलेंट ड्रेन की समस्या से भी निजात मिल सकती है. समय बीतने के साथ अमेरिका में ऑन-साइट प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ेगी तो वहां की कंपनियां भी विदेशों का रुख करेंगी. यदि ऐसा हुआ तो ट्रंप के फैसले का आधार ही खत्म हो जाएगा. ट्रंप प्रशासन का मानना है कि प्रवासियों के चलते अमेरिकी युवाओं के लिए अपने देश में नौकरियां कम हो रही हैं. यदि कंपनियां ही अमेरिका में नहीं रहेंगी तो उन्हें नौकरी कैसे मिलेगी. वीजा में सख्ती तो भारत को फायदा इतिहास भी ट्रंप के पक्ष में नहीं है. जब-जब अमेरिका ने वीजा नियमों में सख्ती की है, भारत को इसका फायदा मिला है. 1990 के दशक के अंत में वाय2के संकट आया था. डर था कि साल 2000 की शुरुआत होते ही कंप्यूटर सिस्टम क्रैश हो जाएंगे. अमेरिकी कंपनियों को अपना सॉफ्टवेयर अपडेट करने के लिए स्किल्ड प्रोग्रामर्स की जरूरत थी, लेकिन वहां उतने लोग मौजूद नहीं थे. भारत में तब आईटी इंडस्ट्री की ढंग से शुरुआत भी नहीं हुई थी. तब पहली बार अंग्रेजी बोलने वाले भारतीय प्रोफेशनल्स को अमेरिका को बड़ी संख्या में नौकरी मिली थी. जब वीजा लिमिट की बात आई तो कई कंपनियों ने भारत में ही अपने दफ्तर खोल लिए. तब हैदराबाद, बेंगलुरू और आगे चलकर गुड़गांव साइबर हब के रूप में विकसित हुए. सीएनबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसी का नतीजा था कि साल 2000 में 4 अरब डॉलर का आईटी एक्सपोर्ट 2005 में बढ़कर करीब 18 डॉलर हो गया. फिर जब 2008 की मंदी आई तो अमेरिकी कंपनियों को कॉस्ट कटिंग का फैसला लेना पड़ा. उधर, सरकार ने स्थानीय रोजगार को बचाए रखने के लिए वीजा नियम सख्त कर दिए. तब भी भारत को इसका मिला था. इससे भारतीय आईटी कंपनियों के लिए बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर के दरवाजे खुल गए. 2008 में भारत का आईटी-बीपीओ एक्सपोर्ट 33 अरब डॉलर था जो चार साल बाद 2012 में 69 अरब डॉलर पहुंच गया. अपनी गलती से नहीं सीखे ट्रंप राष्ट्रपति पद पर अपने पहले कार्यकाल में भी अमेरिका ने बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन का नारा दिया था. उन्होंने वीजा नियम इतने कड़े कर दिए कि अप्रूवल रेट 75 से कम होकर 62 फीसदी रह गया. तब भारतीय कंपनियों ने एआई, क्लाउड और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में कदम बढ़ा दिए. 2017 से 2020 के बीच देश में ग्लोबल कैपेसिटी सेंटर्स की भरमार हो गई और आईटी एक्सपोर्ट 100 अरब डॉलर को पार कर गया. अमेरिका से लौटे भारतीयों ने अपने देश में स्टार्टअप कल्चर की भी शुरुआत की. इस बार ट्रंप का नारा अलग है, लेकिन उनका मकसद वही है. उनकी समस्या है कि नतीजे भी पहले की तरह भारत के लिए फायदेमंद होने के आसार ज्यादा हैं.

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