Ahoi Ashtami Ganesh Ji Ki Katha: अहोई अष्टमी गणेश जी की कथा, इसके पाठ से मिलेगा व्रत का पूरा लाभ

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Ahoi Ashtami Ganesh Ji Ki Katha: अहोई अष्टमी गणेश जी की कथा, इसके पाठ से मिलेगा व्रत का पूरा लाभ
अहोई अष्टमी की कथाAhoi Ashtami Ganesh Ji Ki Kathaगणेशजी की कथा
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Ahoi Ashtami per Ganesh Ji Ki Katha: अहोई अष्टमी का व्रत महिलाएं संतान की मंगल कामना और संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। अहोई अष्टमी के दिन पूजा की शुरुआत गणेश जी की कथा से करनी चाहिए। क्योंकि, गणेशजी की कथा के पाठ के बिना व्रत का फल अधूरा माना जाता है। अहोई अष्टमी के दिन आपको गणेश जी की इस कथा का पाठ जरुर करना चाहिए। पढ़ें अहोई...

अहोई अष्टमी गणेश जी की पहली कथा: एक बुढ़िया थी। उसका एक बेटा और बहू थी। वे बहुत गरीब थे। बुढ़िया माई हर रोज़ गणेश जी की पूजा करती थी। गणेश जी हर रोज़ बुढ़िया से कहते- बुढ़िया माई! कुछ मांग ले। बुढ़िया कहती- मैं क्या मांगू? तो गणेश जी बोले- अपने बेटे से पूछ ले। तो बेटा बोला- मां! धन मांग ले। बहू से पूछने लगी तो बहू बोली- सासूजी! पोता मांग लेना। बुढ़िया ने सोचा कि दोनों अपने मतलब की माँग रहे हैं सो पड़ोसन से जाकर पूछें। वह पड़ोसन से जाकर बोली कि गणेशजी मेरे को बोले कुछ मांग ले। तो पड़ोसन बोली- पगली! क्यों तो धन मांगे? क्यों पोता मांगे? थोड़े दिन की जिंदगी है। अपनी सुन्दर काया मांग ले। घर आकर बुढ़िया सोचने लगी कि बेटा-बहू भी राजी हों उनकी भी माननी चाहिए। दूसरे दिन गणेशजी आए और बोले- बुढ़िया माई! कुछ मांग। बुढ़िया ने कहा- मुझे सुन्दर काया दे, सोने के कटोरे में पोते को दूध पीता देखूं, अमर सुहाग दे, निरोगी काया दे, भाई दे, भतीजे दे, सारा परिवार दे, सुख दे, मोक्ष दे। गणेशजी ने कहा- बुढ़िया माई! तूने तो मुझे ठग लिया। सब कुछ मांग लिया। अब जैसा बोला है वैसा ही हो जायेगा और गणेशजी अंतर्ध्यान हो गए। अब बुढ़िया माई के यहां सब कुछ वैसा ही हो गया। हे गणेशजी महाराज! जैसा बुढ़िया माई को दिया वैसा सब किसी को देना।अहोई अष्टमी गणेशजी की दूसरी कथाएक दिन गणेश जी महाराज चुटकी में चावल और चम्मच में दूध लेकर घूम रहे थे कि कोई मेरी खीर बना दो। सब ने थोड़ा सा सामान देखकर मना कर दिया। तो एक बुढ़िया बोली- ला बेटा मैं तेरी खीर बना दूं और वह कटोरी ले आई। तो गणेश जी बोले कि बुढ़िया माई कटोरी क्यों लाई टोप लेकर आ । अब बुढ़िया माई टोप लेकर आई और वह दूध से भर गया। गणेश जी महाराज बोले कि मैं बाहर जाकर आता हूं। जब तक तू खीर बनाकर रखना। खीर बनकर तैयार हो गई। अब बुढ़िया माई की बहू के मुंह में पानी आ गया। वह दरवाज़े के पीछे बैठकर खीर खाने लगी तो खीर का एक छींटा ज़मीन पर गिर गया। जिससे गणेश जी का भोग लग गया। थोड़ी देर के बाद बुढ़िया गणेश जी को बुलाने गई। तो गणेश जी बोले- बुढ़िया माई मेरा तो भोग लग गया। जब तेरी बहू ने दरवाज़े के पीछे बैठकर खीर खाई तो एक छींटा ज़मीन पर पड़ गया था सो मेरा तो भोग लग गया। तो बुढ़िया बोली- बेटा! अब इसका क्या करूं। गणेश जी बोले- सारी खीर अच्छे से खा-पीकर सबको बांट देना और बचे तो थाली में डालकर छींके पर रख देना। शाम को गणेश महाराज आये और बुढ़िया को बोले कि बुढ़िया मेरी खीर दो। बुढ़िया खीर लेने गई तो उस थाली में हीरे-मोती हो गये। गणेश जी महाराज ने जैसी धन-दौलत बुढ़िया को दी वैसी सब किसी को दें।.

अहोई अष्टमी गणेश जी की पहली कथा: एक बुढ़िया थी। उसका एक बेटा और बहू थी। वे बहुत गरीब थे। बुढ़िया माई हर रोज़ गणेश जी की पूजा करती थी। गणेश जी हर रोज़ बुढ़िया से कहते- बुढ़िया माई! कुछ मांग ले। बुढ़िया कहती- मैं क्या मांगू? तो गणेश जी बोले- अपने बेटे से पूछ ले। तो बेटा बोला- मां! धन मांग ले। बहू से पूछने लगी तो बहू बोली- सासूजी! पोता मांग लेना। बुढ़िया ने सोचा कि दोनों अपने मतलब की माँग रहे हैं सो पड़ोसन से जाकर पूछें। वह पड़ोसन से जाकर बोली कि गणेशजी मेरे को बोले कुछ मांग ले। तो पड़ोसन बोली- पगली! क्यों तो धन मांगे? क्यों पोता मांगे? थोड़े दिन की जिंदगी है। अपनी सुन्दर काया मांग ले। घर आकर बुढ़िया सोचने लगी कि बेटा-बहू भी राजी हों उनकी भी माननी चाहिए। दूसरे दिन गणेशजी आए और बोले- बुढ़िया माई! कुछ मांग। बुढ़िया ने कहा- मुझे सुन्दर काया दे, सोने के कटोरे में पोते को दूध पीता देखूं, अमर सुहाग दे, निरोगी काया दे, भाई दे, भतीजे दे, सारा परिवार दे, सुख दे, मोक्ष दे। गणेशजी ने कहा- बुढ़िया माई! तूने तो मुझे ठग लिया। सब कुछ मांग लिया। अब जैसा बोला है वैसा ही हो जायेगा और गणेशजी अंतर्ध्यान हो गए। अब बुढ़िया माई के यहां सब कुछ वैसा ही हो गया। हे गणेशजी महाराज! जैसा बुढ़िया माई को दिया वैसा सब किसी को देना।अहोई अष्टमी गणेशजी की दूसरी कथाएक दिन गणेश जी महाराज चुटकी में चावल और चम्मच में दूध लेकर घूम रहे थे कि कोई मेरी खीर बना दो। सब ने थोड़ा सा सामान देखकर मना कर दिया। तो एक बुढ़िया बोली- ला बेटा मैं तेरी खीर बना दूं और वह कटोरी ले आई। तो गणेश जी बोले कि बुढ़िया माई कटोरी क्यों लाई टोप लेकर आ । अब बुढ़िया माई टोप लेकर आई और वह दूध से भर गया। गणेश जी महाराज बोले कि मैं बाहर जाकर आता हूं। जब तक तू खीर बनाकर रखना। खीर बनकर तैयार हो गई। अब बुढ़िया माई की बहू के मुंह में पानी आ गया। वह दरवाज़े के पीछे बैठकर खीर खाने लगी तो खीर का एक छींटा ज़मीन पर गिर गया। जिससे गणेश जी का भोग लग गया। थोड़ी देर के बाद बुढ़िया गणेश जी को बुलाने गई। तो गणेश जी बोले- बुढ़िया माई मेरा तो भोग लग गया। जब तेरी बहू ने दरवाज़े के पीछे बैठकर खीर खाई तो एक छींटा ज़मीन पर पड़ गया था सो मेरा तो भोग लग गया। तो बुढ़िया बोली- बेटा! अब इसका क्या करूं। गणेश जी बोले- सारी खीर अच्छे से खा-पीकर सबको बांट देना और बचे तो थाली में डालकर छींके पर रख देना। शाम को गणेश महाराज आये और बुढ़िया को बोले कि बुढ़िया मेरी खीर दो। बुढ़िया खीर लेने गई तो उस थाली में हीरे-मोती हो गये। गणेश जी महाराज ने जैसी धन-दौलत बुढ़िया को दी वैसी सब किसी को दें।

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