Indira Ekadashi 2024 : इंदिरा एकादशी का व्रत आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन रखा जाता है। इस व्रत का विशेष महत्व है। इस व्रत को करने से नीच से नीच योनी में पड़े पितरों को मोक्ष मिलता है। इंदिरा एकादशी के दिन पितरों के नाम से श्राद्ध कर्म करने के साथ साथ पद्म पुराण में वर्णित इंदिरा एकादशी कथा का पाठ करना चाहिए। पढ़ें इंदिरा एकादशी...
युधिष्ठिरने पूछा- मधुसूदन ! कृपा करके मुझे यह बताइये कि आश्विनके कृष्णपक्षमें कौन-सी एकादशी होती है ?कृष्ण पक्ष में 'इन्दिरा' नाम की एकादशी होती है। व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है और नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सदगति देने वाली है। राजन् ! पूर्व काल की बात है, सत्य युग में इन्द्रसेन नाम से विख्यात राजकुमार थे, जो अब माहिष्मतीपुरी के राजा होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। उनका यश सब ओर फैल चुका था। राजा इन्द्रसेन भगवान् विष्णु की भक्ति में तत्पर हो गोविन्दके मोक्षदायक नामों का जप करते हुए समय व्यतीत करते थे और विधिपूर्वक अध्यात्मतत्त्व के चिन्तन में संलग्र रहते थे। एक दिन राजा राजसभामें सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने ही में देवर्षि नारद आकाश से उतरकर वहां आ पहुंचे। उन्हें आया देख राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें आसन पर बिठाया, इसके बाद वे इस प्रकार बोले- 'मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मेरी सर्वथा कुशल है। आज आपके दर्शनसे मेरी सम्पूर्ण यज्ञ-क्रियाएं सफल हो गयीं। देवर्षे ! अपने आगमन का कारण बताकर मुझ पर कृपा करें।'नारदजीने कहा- नृपश्रेष्ठ ! सुनो, मेरी बात तुम्हें आश्चर्य में डालने वाली है, मैं ब्रह्म लोक से यम लोक में आया था, वहां एक श्रेष्ठ आसनपर बैठा और यमराज ने मेरी भक्तिपूर्वक पूजा की। उस समय यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को भी देखा था। वे व्रतभंगके दोषसे वहां आये थे। राजन् ! उन्होंने तुमसे कहनेके लिये एक सन्देश दिया है, उसे सुनो। उन्होंने कहा है, 'बेटा। मुझे 'इंदिरा' के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग में भेजो।' उनका यह संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूं। राजन् ! अपने पिताको स्वर्ग लोक की प्राप्ति करानेके लिये 'इन्दिरा' का व्रत करो।राजाने पूछा- भगवन् ! कृपा करके 'इंदिरा' का व्रत बताइये। किस पक्षमें, किस तिथि को और किस विधि से उसका व्रत करना चाहिये।नारदजीने कहा- राजेन्द्र ! सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बतलाता हूं। आश्विन मासके कृष्णपक्षमे दशमीके उत्तम दिनको श्रद्धायुक्त चित्तसे प्रातःकाल स्नान करे। फिर मध्याह्नकाल में खान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करे तथा रात्रि में भूमिपर सोये। रात्रि के अन्त में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुंह धोये; इसके बाद भक्तिभाव से निप्राङ्कित मन्त्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करे- अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः । श्श्रो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरण मे भवाच्युत ।। 'कमलनयन भगवान् नारायण ! आज मैं सब 'भोगोंसे अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूँगा। अच्युत । आप मुझे शरण दें।'इस प्रकार नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की प्रसन्नता के लिये शालग्राम शिला के सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणा से ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें भोजन करावे। पितरोंको दिये हुए अत्रमय पिण्डको सूंघकर विद्वान् पुरुष गाय को खिला दे। फिर धूप और गन्ध आदिसे भगवान् हृषीकेशका पूजन करके रात्रिमें उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात् सबेरा होनेपर द्वादशी के दिन पुनः भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करे। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई-बन्धु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करे।राजन् ! इस विधि से आलस्य रहित होकर तुम 'इन्दिरा' का व्रत करो। इससे तुम्हारे पितर भगवान् विष्णु के वैकुण्ठ- धाम में चले जायेंगे।भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- राजन् ! राजा इन्द्रसेनसे ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये । राजाने उनकी बतायी हुई विधिसे अन्तःपुर की रानियों, पुत्रों और भृत्यो सहित उस उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया। कुन्तीनन्दन ! व्रत पूर्ण होने पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। इन्द्रसेन के पिता गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीविष्णुधामको चले गये और राजर्षि इन्द्रसेन भी अकण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राज्यपर बिठाकर स्वयं स्वर्ग लोक को गये। इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने 'इन्दिरा' व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया है। इसको पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।.
युधिष्ठिरने पूछा- मधुसूदन ! कृपा करके मुझे यह बताइये कि आश्विनके कृष्णपक्षमें कौन-सी एकादशी होती है ?कृष्ण पक्ष में 'इन्दिरा' नाम की एकादशी होती है। व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है और नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सदगति देने वाली है। राजन् ! पूर्व काल की बात है, सत्य युग में इन्द्रसेन नाम से विख्यात राजकुमार थे, जो अब माहिष्मतीपुरी के राजा होकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। उनका यश सब ओर फैल चुका था। राजा इन्द्रसेन भगवान् विष्णु की भक्ति में तत्पर हो गोविन्दके मोक्षदायक नामों का जप करते हुए समय व्यतीत करते थे और विधिपूर्वक अध्यात्मतत्त्व के चिन्तन में संलग्र रहते थे। एक दिन राजा राजसभामें सुखपूर्वक बैठे हुए थे, इतने ही में देवर्षि नारद आकाश से उतरकर वहां आ पहुंचे। उन्हें आया देख राजा हाथ जोड़कर खड़े हो गये और विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें आसन पर बिठाया, इसके बाद वे इस प्रकार बोले- 'मुनिश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मेरी सर्वथा कुशल है। आज आपके दर्शनसे मेरी सम्पूर्ण यज्ञ-क्रियाएं सफल हो गयीं। देवर्षे ! अपने आगमन का कारण बताकर मुझ पर कृपा करें।'नारदजीने कहा- नृपश्रेष्ठ ! सुनो, मेरी बात तुम्हें आश्चर्य में डालने वाली है, मैं ब्रह्म लोक से यम लोक में आया था, वहां एक श्रेष्ठ आसनपर बैठा और यमराज ने मेरी भक्तिपूर्वक पूजा की। उस समय यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को भी देखा था। वे व्रतभंगके दोषसे वहां आये थे। राजन् ! उन्होंने तुमसे कहनेके लिये एक सन्देश दिया है, उसे सुनो। उन्होंने कहा है, 'बेटा। मुझे 'इंदिरा' के व्रत का पुण्य देकर स्वर्ग में भेजो।' उनका यह संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूं। राजन् ! अपने पिताको स्वर्ग लोक की प्राप्ति करानेके लिये 'इन्दिरा' का व्रत करो।राजाने पूछा- भगवन् ! कृपा करके 'इंदिरा' का व्रत बताइये। किस पक्षमें, किस तिथि को और किस विधि से उसका व्रत करना चाहिये।नारदजीने कहा- राजेन्द्र ! सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बतलाता हूं। आश्विन मासके कृष्णपक्षमे दशमीके उत्तम दिनको श्रद्धायुक्त चित्तसे प्रातःकाल स्नान करे। फिर मध्याह्नकाल में खान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करे तथा रात्रि में भूमिपर सोये। रात्रि के अन्त में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन दातुन करके मुंह धोये; इसके बाद भक्तिभाव से निप्राङ्कित मन्त्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करे- अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः । श्श्रो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरण मे भवाच्युत ।। 'कमलनयन भगवान् नारायण ! आज मैं सब 'भोगोंसे अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूँगा। अच्युत । आप मुझे शरण दें।'इस प्रकार नियम करके मध्याह्नकाल में पितरों की प्रसन्नता के लिये शालग्राम शिला के सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणा से ब्राह्मणों का सत्कार करके उन्हें भोजन करावे। पितरोंको दिये हुए अत्रमय पिण्डको सूंघकर विद्वान् पुरुष गाय को खिला दे। फिर धूप और गन्ध आदिसे भगवान् हृषीकेशका पूजन करके रात्रिमें उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात् सबेरा होनेपर द्वादशी के दिन पुनः भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करे। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर भाई-बन्धु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करे।राजन् ! इस विधि से आलस्य रहित होकर तुम 'इन्दिरा' का व्रत करो। इससे तुम्हारे पितर भगवान् विष्णु के वैकुण्ठ- धाम में चले जायेंगे।भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- राजन् ! राजा इन्द्रसेनसे ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये । राजाने उनकी बतायी हुई विधिसे अन्तःपुर की रानियों, पुत्रों और भृत्यो सहित उस उत्तम व्रतका अनुष्ठान किया। कुन्तीनन्दन ! व्रत पूर्ण होने पर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। इन्द्रसेन के पिता गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीविष्णुधामको चले गये और राजर्षि इन्द्रसेन भी अकण्टक राज्य का उपभोग करके अपने पुत्र को राज्यपर बिठाकर स्वयं स्वर्ग लोक को गये। इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने 'इन्दिरा' व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया है। इसको पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
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