आजादी के बाद से अरसे तक देश की इकलौती राष्ट्रीय पार्टी रही कांग्रेस ने 1984 में 415 सीटों पर जीत के साथ रिकॉर्ड बनाया था, लेकिन हाल के वर्षों में अपना जनाधार खोती चली गई। BJP4India LokSabhaElectionresults2019 LokSabhaElections2019
1984 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस ने खोया जनाधारसाल 2014 के लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' में भाजपा को अपार सफलता मिली थी और सत्ता में रही कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया था। इस बार नतीजे के एक दिन पहले तक सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस 'मोदी' नाम की सुनामी में बह गई और 17 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई। यह वही कांग्रेस पार्टी है, जो एक समय देश की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी और कई आम चुनावों में आराम से जीत दर्ज करती रही। साल 1984 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। इस चुनाव में 415 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास में रिकॉर्ड दर्ज कर चुकी कांग्रेस धीरे-धीरे अपना जनाधार खोती चली जाएगी, ऐसा कांग्रेस ने भी नहीं सोचा होगा। देखा जाए तो साल 1951-52 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर तक कोई पार्टी कड़ी टक्कर नहीं दे सकी थी। इंदिरा की सरकार गिरी भी तो दूसरी बार जोरदार वापसी हुई, लेकिन पिछले दो चुनावों में कांग्रेस का ऐसा बुरा हाल हुआ कि मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिलना भी मुश्किल हो गया। आइए देश के पहले आम चुनाव से अब तक हुए चुनावों पर नजर डालते हैं कि कैसे कांग्रेस अपना जनाधार खोती चली गई: आजाद भारत का पहला लोकसभा चुनाव अक्टूबर 1951 से लेकर फरवरी 1952 के बीच हुआ था। पहला लोकसभा चुनाव 489 सीटों पर लड़ा गया था। कांग्रेस के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, भारतीय बोल्शेविक पार्टी, जमींदार पार्टी समेत 53 पार्टियां मैदान में थीं। 38 सीटों पर 47 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव में कुल 1874 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे। कांग्रेस ने 264 सीटों पर जीत दर्ज की थी और सरकार बनाई थी। भाकपा को 16, सोशलिस्ट पार्टी को 12 और भारतीय जनसंघ को तीन सीटें मिली थी।साल 1957 में 494 सीटों पर देश का दूसरा आम चुनाव हुआ, जिसमें कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला था। कांग्रेस ने 371 सीटें जीती थी। 542 निर्दलियों ने दूसरा आम चुनाव लड़ा और इनमें से 42 ने जीत दर्ज की, वहीं भाकपा ने 111 प्रत्याशी मैदान में उतारे और 27 पर जीत दर्ज की। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के 194 में से 19 ने चुनाव जीता। वहीं, भारतीय जनसंघ ने 133 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे थे जिनमें से सिर्फ चार ही जीत दर्ज कर पाए। 1962 का आम चुनाव पंडित जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के देहांत से लेकर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने का गवाह रहा। कांग्रेस ने 494 सीटों में से 361 सीटें जीती। तीसरे आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में 29 सीटें आई थीं। स्वतंत्र पार्टी को 18, जनसंघ को 14, जबकि सोशलिस्ट पार्टी को 12 सीटों पर जीत मिली थी। 1959 में इंदिरा को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था और इस चुनाव में जीत और प्रधानमंत्री के रूप में आधिकारिक तौर पर भारतीय राजनीति में जोरदार उपस्थिति बनी।1967 में हुए चौथे आम चुनाव में कांग्रेस ने 520 सीटों में से 283 सीटें जीतीं। यह पहली बार था जब कांग्रेस को किसी लोकसभा चुनाव में इतना कम बहुमत मिला था। पार्टी का वोट शेयर भी कम रहा। इस लोकसभा चुनाव में 35 सीटें जीतकर 'जनसंघ' तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं 'स्वतंत्र पार्टी' ने 44 सीटें जीती। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने इस चुनाव में 13 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 40.
78 फीसदी में ही सिमट गया था और चौथे लोकसभा चुनाव में तीसरे लोकसभा चुनाव के मुकाबले 78 सीटें कम मिली थीं। 1971 में विपक्ष के 'इंदिरा हटाओ' नारे पर इंदिरा गांधी का'गरीबी हटाओ' नारा भारी पड़ा। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस नेे लोकसभा की 545 सीटों में से 352 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ 16 सीटें ही आई। भारतीय जनसंघ ने चुनाव में 22 सीटें जीतीं। सीपीआई ने चुनाव में 23 सीटें जीतीं। जबकि सीपीआईएम के खाते में 25 सीटें आईं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने दो सीटें जीतीं जबकि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के खाते में 3 सीटें आईं। स्वतंत्र पार्टी के खाते में सिर्फ 8 सीटें आई।23 जनवरी 1977 ही वो दिन था जब अचानक इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी के जरिए देश में आम चुनाव की घोषणा की। देश में तीन दिन में ही चुनाव संपन्न हो गए। चुनाव 16 मार्च 1977 से लेकर 19 मार्च 1977 के बीच हुए। 22 मार्च 1977 को आए चुनाव नतीजे ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को मात्र 153 सीटें ही मिली थीं। इस चुनाव में पूरा विपक्ष समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गोलबंद हुआ था। जनता पार्टी को चुनाव चिन्ह नहीं मिल पाया था, जिसकी वजह से पार्टी ने 'भारतीय लोक दल' के चिन्ह"हलधर किसान" पर चुनाव लड़ा और 298 सीटें जीतीं। 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को रिकॉर्ड तोड़ सीटें मिलीं। इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुई हमदर्दी ने राजीव गांधी को सत्ता पर बैठाया। यह चुनाव कांग्रेस पूरी तरह इंदिरा की सहानूभूति पर लड़ रही थी। जबकि विपक्ष के पास इसका कोई तोड़ नहीं था। कांग्रेस ने 401 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल कर इतिहास रचा। यह चुनाव 542 लोकसभा सीटों के लिए हुआ था। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। यह दोनों सीटें भाजपा के बड़े नेता अटल या आडवाणी ने नहीं जीतीं थी। यह सीटें गुजरात और आंध्रप्रदेश में जीती गई थीं। उस वक्त कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए थे।21 मई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की वोटिंग के पहले दौर के ठीक एक दिन बाद हत्या कर दी गई। एलटीटीआई ने तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्या कर दी। इसके बाद जून के मध्य तक चुनाव को स्थगित कर दिया गया। पंजाब में लोकसभा चुनाव बाद में कराए गए, जबकि जम्मू-कश्मीर में आम चुनाव हुए ही नहीं। जून में चुनाव संपन्न हुआ जिसमें कांग्रेस को सबसे ज्यादा 232 सीटें मिलीं। भारतीय जनता पार्टी 120 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। जनता दल को सिर्फ 59 सीटें मिलीं। 21 जून 1991 को कांग्रेस के पी.वी. नरसिंहराव ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। 1996 में 11वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। 161 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली और पार्टी दक्षिण में भी पिछड़ गई। अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण 13 दिन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाए। जनता दल के नेता एचडी देवेगौडा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया, लेकिन उनकी सरकार भी 18 महीने ही चली। देवेगौड़ा के कार्यकाल में ही विदेश मंत्री रहे इन्द्र कुमार गुजराल ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में 1997 में पदभार संभाला। कांग्रेस इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी।साल 1998 देश में 12वें लोकसभा चुनाव का गवाह बना। इस चुनाव में भाजपा को 182 सीटें मिली, जबकि कांग्रेस के खाते में 141 सीटें आईं। सीपीएम ने 32 सीटें जीती और सीपाआई के खाते में सिर्फ नौ सीटें आई। समता पार्टी को 12, जनता दल को 6 और बसपा को 5 लोकसभा सीटें मिली। क्षेत्रीय पार्टियों ने 150 लोकसभा सीटें जीतीं। भाजपा ने शिवसेना, अकाली दल, समता पार्टी, एआईएडीएमके और बिजू जनता दल के सहयोग से सरकार बनाई और अटल बिहार वाजपेयी फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन इस बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 13 महीने में ही गिर गई। साल 1999 के आम चुनाव में कांग्रेस और सिमटी। इस चुनाव में विदेशी सोनिया बनाम स्वदेशी वाजपेयी का माहौल बनाया गया। भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज्यादा 182 सीटें मिली और वाजपेयी केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब रहे, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ 114 सीटें आई थीं। सीपीआई ने चुनाव में 33 सीटें जीतीं। यह पहली बार था जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में केंद्र में किसी गैर-कांग्रेसी सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।साल 2004 के 14वें लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का 'इंडिया शाइनिंग' का नारा असफल रहा और कांग्रेस सत्ता में लौटी। कांग्रेस की जीत भाजपा के लिए करारा झटका थी क्योंकि साल 1999 में जीत के बाद पहली बार भाजपा केंद्र में पांच साल सरकार चलाने में सफल रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा के खाते में 138 सीटें आई। सीपीएम के खाते में 43 सीटें गई और सीपीआई 10 सीटें जीतने में कामयाब रही।इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई। सोनिया गांधी के पीएम बनने से इंकार के बाद मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। 2009 के 15वें आम चुनाव में कांग्रेस ने 206 सीटें जीतीं और भारतीय जनता पार्टी के खाते में सिर्फ 116 सीटें ही आई। एनडीए फिर से सरकार बनाने में विफल रही। कांग्रेस ने यूपी में 21 सीटें जीतीं जबकि भाजपा के खाते में इस सूबे से सिर्फ 10 सीटें ही आई।2014 में हुए देश के 16वें आम चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई गैर-कांग्रेसी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। 2014 में एनडीए ने कुल 336 लोकसभा सीटों पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी, जिनमें से 282 सीटें अकेले भारतीय जनता पार्टी की थी। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव शर्मनाक प्रदर्शन वाला रहा। कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई। 1984 में जहां कांग्रेस ने बहुमत की सरकार बनाई थी, वहीं 2014 में भाजपा ने अपने दम पर सरकार बनाई।2014 के आम चुनाव में जहां मोदी लहर दिखी थी, तो वहीं 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी सुनामी का माहौल बना। 2014 में 44 सीटें लाने वाली कांग्रेस कुछ ही सीटों का इजाफा कर सकी और 52 पर ही पहुंच सकी। शर्मनाक बात यह रही कि देश के 17 राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में 'मोदी लहर' में भाजपा को अपार सफलता मिली थी और सत्ता में रही कांग्रेस ने अबतक का सबसे खराब प्रदर्शन किया था। इस बार नतीजे के एक दिन पहले तक सरकार बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस 'मोदी' नाम की सुनामी में बह गई और 17 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई। यह वही कांग्रेस पार्टी है, जो एक समय देश की एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी और कई आम चुनावों में आराम से जीत दर्ज करती रही।साल 1984 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कीर्तिमान स्थापित कर दिया था। इस चुनाव में 415 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास में रिकॉर्ड दर्ज कर चुकी कांग्रेस धीरे-धीरे अपना जनाधार खोती चली जाएगी, ऐसा कांग्रेस ने भी नहीं सोचा होगा। देखा जाए तो साल 1951-52 में हुए 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पूरा किया।साल 2004 के 14वें लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का 'इंडिया शाइनिंग' का नारा असफल रहा और कांग्रेस सत्ता में लौटी। कांग्रेस की जीत भाजपा के लिए करारा झटका थी क्योंकि साल 1999 में जीत के बाद पहली बार भाजपा केंद्र में पांच साल सरकार चलाने में सफल रही थी। इस चुनाव में कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं। जबकि भाजपा के खाते में 138 सीटें आई। सीपीएम के खाते में 43 सीटें गई और सीपीआई 10 सीटें जीतने में कामयाब रही।इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई। सोनिया गांधी के पीएम बनने से इंकार के बाद मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। 2009 के 15वें आम चुनाव में कांग्रेस ने 206 सीटें जीतीं और भारतीय जनता पार्टी के खाते में सिर्फ 116 सीटें ही आई। एनडीए फिर से सरकार बनाने में विफल रही। कांग्रेस ने यूपी में 21 सीटें जीतीं जबकि भाजपा के खाते में इस सूबे से सिर्फ 10 सीटें ही आई।2014 में हुए देश के 16वें आम चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई गैर-कांग्रेसी सरकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। 2014 में एनडीए ने कुल 336 लोकसभा सीटों पर रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी, जिनमें से 282 सीटें अकेले भारतीय जनता पार्टी की थी। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव शर्मनाक प्रदर्शन वाला रहा। कांग्रेस महज 44 सीटों पर सिमट गई। 1984 में जहां कांग्रेस ने बहुमत की सरकार बनाई थी, वहीं 2014 में भाजपा ने अपने दम पर सरकार बनाई।2014 के आम चुनाव में जहां मोदी लहर दिखी थी, तो वहीं 2019 लोकसभा चुनाव में मोदी सुनामी का माहौल बना। 2014 में 44 सीटें लाने वाली कांग्रेस कुछ ही सीटों का इजाफा कर सकी और 52 पर ही पहुंच सकी। शर्मनाक बात यह रही कि देश के 17 राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।
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'रिजल्ट लूट' की तैयारी, उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा- सड़कों पर बह सकता है खूनपटना। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले एग्जिट पोल के अनुमानों में राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। नतीजों के बाद महागठबंधन के नेताओं ने कहा कि हम एग्जिट पोल के अनुमानों को सिरे से खारिज करते हैं। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने प्रेस कॉन्फेंस में चुनाव आयोग पर सवाल उठाया। कुशवाहा ने कहा कि एग्जिट पोल के बाद जनता में खतरनाक आक्रोश है और सड़कों पर खून बह सकता है।
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Punjab Election Results 2019 Live Updates: पंजाब में 13 लोकसभा सीटों के लिए 8 बजे से शुरू होगी वोटों की गिनतीपंजाब समेत देश के सभी राज्यों में हुए लोकसभा चुनाव के लिए वोटों की गिनती गुरुवार सुबह 8 बजे से शुरू होगी. पंजाब में पंजाब में अंतिम दिन 19 मई को एक ही चरण में मतदान हुआ था. पंजाब में 13 लोकसभा सीटें और राज्य में 117 विधानसभा क्षेत्र हैं. पंजाब में गुरदासपुर, अमृतसर, खडूर साहिब, जालंधर, होशियारपुर, आनंदपुर साहिब, लुधियाना, फतेहगढ़ साहिब, फरीदकोट, फिरोजपुर, बठिंडा, संगरूर और पटियाला लोकसभा निर्वाचन (Punjab Elections 2019) क्षेत्र हैं. पंजाब की पटियाला सीट पर परनीत कौर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. यहां उनका मुकाबला पंजाब डेमोक्रेटिक अलायंस के उम्मीदवार डॉ. धर्मवीर गांधी व अकाली-भाजपा गठबंधन के उम्मीदवार सुरजीत सिंह रखड़ा से है. बठिंडा सीट पर हरसिमरत कौर बादल का कांग्रेस के अमरिंदर सिंह राजा वडिंग से कड़ा मुकाबला है.अमृतसर में भाजपा के टिकट पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और कांग्रेस के टिकट पर गुरजीत सिंह औजला चुनाव मैदान में हैं. वहीं, गुरदासपुर में सुनील जाखड़ और भाजपा के सनी देयोल के बीच कड़ा मुकाबला है.
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राहुल गांधी ने नतीजे से पहले अमेठी में हार मानी, स्मृति को बधाई दी; देश में दोबारा मोदी सरकारकर्नाटक में गुलबर्गा से कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे और जेडीएस के देवेगौड़ा तुमकुर से पीछे भारत के चुनावी इतिहास में पहली बार बहुमत के साथ किसी गैर-कांग्रेसी दल की सत्ता में दोबारा वापसी राजस्थान में सभी 25 सीटों पर भाजपा आगे, 23 सीटों पर उसकी बढ़त एक लाख वोटों से ज्यादा एग्जिट पोल्स ही एग्जेक्ट: 10 में से 9 एग्जिट पोल्स में एनडीए को बहुमत का अनुमान जताया गया था | Election Results 2019 Live Updates; Lok Sabha seats tally trends leads trails vote counting
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Bhongir Lok Sabha chunav Result 2019 Live: कांग्रेस के कोमाती रेड्डी वेंकट रेड्डी आगेLok Sabha Chunav Bhongir Result 2019 तेलंगाना की तेलंगाना की भुवनगिरि (भोंगीर) लोकसभा सीट पर कांग्रेस पार्टी से कोमाती रेड्डी वेंकट रेड्डी, सीपीआई से गोडा श्रीरामुलु, तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) से डॉ बूरा नरसैया, भारतीय जनता पार्टी से पीवी श्याम सुंदर राव, शिवसेना से कोथा किस्टैया, बहुजन मुक्ति पार्टी से एसवी रमाना राव और लेबर पार्टी ऑफ इंडिया से श्रीरामुलु मुथयाला चुनावी मैदान में हैं.
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'मोदी लहर' में कांग्रेस के 9 पूर्व मुख्यमंत्री हारे, पार्टी के भविष्य पर उठने लगे सवालदेशभर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘प्रचंड लहर’ पर सवार भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवाद, हिंदू गौरव और 'न्यू इंडिया' के मुद्दों पर लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके लगातार दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाने जा रही है. 'मोदी लहर' इतनी प्रचंड थी कि कांग्रेस के नौ पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हार गए.
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आखिर कहां हैं मोदी की जीत के शिल्पकार अरुण जेटलीनई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में विपक्ष के चक्रव्यूह को तोड़ते हुए लोकसभा चुनाव में 303 सीटें हासिल कर इतिहास रच दिया। आज देश के पश्चिम तथा उत्तरी भाग में ही नहीं बल्कि पूर्वी हिस्से में भी भगवा लहरा रहा है। इस जीत के शिल्पकारों में एक नाम अरुण जेटली का भी है। भाजपा की जीत में बड़ी भूमिका निभाने वाले अरुण जेटली पार्टी के महाविजय के जश्न के बीच कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जेटली आखिर हैं कहां...
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कांग्रेस के हारने के बाद पार्टी कार्यकर्ता ने मुंडवाया सिर, भाजपा समर्थक से लगाई थी शर्तकांग्रेस की हार से पार्टी कार्यकर्ता भी आहत हैं। मध्यप्रदेश के राजगढ़ में एक कांग्रेस कार्यकर्ता बीएल सेन ने अपना सिर मुंडवा लिया।
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