2019 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। पश्चिम बंगाल में हिंसा और आगजनी के साये में बीते चुनाव में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए 42 सीटों में से 18 जीती हैं।
- फोटो : अमर उजाला2019 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। पश्चिम बंगाल में हिंसा और आगजनी के साये में बीते चुनाव में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें जीती हैं। यह 2014 की ही तरह 2019 में भी आई 'मोदी आंधी' की बदौलत संभव हुआ है। पश्चिम बंगाल के नतीजे देखने के बाद सवाल उठ रहा है कि जिस तरह से सूबे में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में दमदार प्रदर्शन किया है, उसका 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या असर होगा? कहीं ऐसा तो नहीं की 'मोदी आंधी' आने वाले विधानसभा चुनाव में ममता दीदी की कुर्सी ही छीन ले।दरअसल इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 128 विधानसभा क्षेत्र में उम्दा प्रदर्शन करते हुए टीएमसी को बेहद कड़ी टक्कर दी है। पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीट हैं। इनमें से 128 विधानसभा सेग्मेंट पर 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे हैं। यानी की कुल विधानसभा सीटों की 43.
5 फीसदी सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई हैं। इससे साफ है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का बढ़ता कद सूबे में ममता बनर्जी के लिए खतरा बन सकता है। पश्चिम बंगाल में जहां किसी जमाने में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों के बीच हुआ करता था। इस बार वाम दलों को सूबे में सबसे ज्यादा निराशा हाथ लगी , क्योंकि चुनाव में सीधी चुनौती भाजपा और टीएमसी के बीच थी जबकि वाम दल दूर-दूर तक कहीं नहीं थे। यही वजह है कि भाजपा की इस बढ़त ने तृणमूल कांग्रेस के माथे पर अभी से बल खींच दिया है।तृणमूल कांग्रेस ने सूबे में 22 लोकसभा सीटें जीती हैं जो कि 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 12 कम हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 34 लोकसभा सीटें जीती थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी दो सीटों पर सिमट गई थी। इस बार मोदी लहर और पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा की धुआंधार रणनीति ने इस इकाई आंकड़े को दहाई में तब्दील कर दिया। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 158 विधानसभा क्षेत्र में जीतने में सफल रही है जबकि कांग्रेस आठ विधानसभा क्षेत्र में जीती है। कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव में सूबे में 2 सीटें जीती हैं। जबकि अगर साल 2014 की बात करें तो कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 4 लोकसभा सीटें जीती थीं।अगर वामदलों की बात करें तो वे एक भी विधानसभा क्षेत्र जीतने में नाकाम रहे। वामदलों ने सूबे की जिन 40 सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से 39 सीटों पर उनके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। यह पश्चिम बंगाल के लिए बड़ा बदलाव है। 2014 में सीपीएम ने सूबे की 4 सीटें जीती थीं। पार्टी का वोट शेयर 22.7 फीसदी रहा था जो कि 2019 में सिमटकर 6.3 फीसदी हो गया। सूबे में कांग्रेस के 37 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। इससे साफ है कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी को भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।ऐसा भी कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में 2021 से पहले विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। नरेंद्र मोदी पहले ही सूबे में अपने चुनाव प्रचार के दौरान दावा कर चुके हैं कि टीएमसी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं। उनका यह दावा ममता बनर्जी सरकार को संकट में खड़ा कर सकता है। इतना ही नहीं टीएमसी से भाजपा में गए अर्जुन सिंह भी हाल ही में दावा कर चुके हैं कि ममता सरकार तीन से छह महीने के भीतर गिर जाएगी क्योंकि टीएमसी के कई विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। टीएमसी ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव सूबे में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था और 26 सीटें जीती थीं। उस वक्त वामदलों के खाते में 15 सीटें आई थी। अगर तब के विधानसभा क्षेत्र में जीत की बात करें तो टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन ने उस वक्त 190 विधानसभा क्षेत्र में जीत दर्ज की थी। दो साल बाद यानी की 2011 में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सूबे में विधानसभा चुनाव लड़ा और पश्चिम बंगाल में 34 साल के लेफ्ट राज का अंत हुआ। लेकिन 2021 में तृणमूल कांग्रेस के लिए भाजपा सूबे में सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। 2019 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। पश्चिम बंगाल में हिंसा और आगजनी के साये में बीते चुनाव में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें जीती हैं। यह 2014 की ही तरह 2019 में भी आई 'मोदी आंधी' की बदौलत संभव हुआ है। पश्चिम बंगाल के नतीजे देखने के बाद सवाल उठ रहा है कि जिस तरह से सूबे में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में दमदार प्रदर्शन किया है, उसका 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या असर होगा? कहीं ऐसा तो नहीं की 'मोदी आंधी' आने वाले विधानसभा चुनाव में ममता दीदी की कुर्सी ही छीन ले।दरअसल इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 128 विधानसभा क्षेत्र में उम्दा प्रदर्शन करते हुए टीएमसी को बेहद कड़ी टक्कर दी है। पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीट हैं। इनमें से 128 विधानसभा सेग्मेंट पर 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे हैं। यानी की कुल विधानसभा सीटों की 43.5 फीसदी सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में गई हैं। इससे साफ है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का बढ़ता कद सूबे में ममता बनर्जी के लिए खतरा बन सकता है। पश्चिम बंगाल में जहां किसी जमाने में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों के बीच हुआ करता था। इस बार वाम दलों को सूबे में सबसे ज्यादा निराशा हाथ लगी , क्योंकि चुनाव में सीधी चुनौती भाजपा और टीएमसी के बीच थी जबकि वाम दल दूर-दूर तक कहीं नहीं थे। यही वजह है कि भाजपा की इस बढ़त ने तृणमूल कांग्रेस के माथे पर अभी से बल खींच दिया है।तृणमूल कांग्रेस ने सूबे में 22 लोकसभा सीटें जीती हैं जो कि 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले 12 कम हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 34 लोकसभा सीटें जीती थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी दो सीटों पर सिमट गई थी। इस बार मोदी लहर और पश्चिम बंगाल को लेकर भाजपा की धुआंधार रणनीति ने इस इकाई आंकड़े को दहाई में तब्दील कर दिया। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 158 विधानसभा क्षेत्र में जीतने में सफल रही है जबकि कांग्रेस आठ विधानसभा क्षेत्र में जीती है। कांग्रेस ने इस लोकसभा चुनाव में सूबे में 2 सीटें जीती हैं। जबकि अगर साल 2014 की बात करें तो कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 4 लोकसभा सीटें जीती थीं।अगर वामदलों की बात करें तो वे एक भी विधानसभा क्षेत्र जीतने में नाकाम रहे। वामदलों ने सूबे की जिन 40 सीटों पर चुनाव लड़ा उनमें से 39 सीटों पर उनके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। यह पश्चिम बंगाल के लिए बड़ा बदलाव है। 2014 में सीपीएम ने सूबे की 4 सीटें जीती थीं। पार्टी का वोट शेयर 22.7 फीसदी रहा था जो कि 2019 में सिमटकर 6.3 फीसदी हो गया। सूबे में कांग्रेस के 37 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई। इससे साफ है कि विधानसभा चुनाव में टीएमसी को भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।ऐसा भी कहा जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में 2021 से पहले विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। नरेंद्र मोदी पहले ही सूबे में अपने चुनाव प्रचार के दौरान दावा कर चुके हैं कि टीएमसी के 40 विधायक उनके संपर्क में हैं। उनका यह दावा ममता बनर्जी सरकार को संकट में खड़ा कर सकता है। इतना ही नहीं टीएमसी से भाजपा में गए अर्जुन सिंह भी हाल ही में दावा कर चुके हैं कि ममता सरकार तीन से छह महीने के भीतर गिर जाएगी क्योंकि टीएमसी के कई विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। टीएमसी ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव सूबे में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था और 26 सीटें जीती थीं। उस वक्त वामदलों के खाते में 15 सीटें आई थी। अगर तब के विधानसभा क्षेत्र में जीत की बात करें तो टीएमसी-कांग्रेस गठबंधन ने उस वक्त 190 विधानसभा क्षेत्र में जीत दर्ज की थी। दो साल बाद यानी की 2011 में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर सूबे में विधानसभा चुनाव लड़ा और पश्चिम बंगाल में 34 साल के लेफ्ट राज का अंत हुआ। लेकिन 2021 में तृणमूल कांग्रेस के लिए भाजपा सूबे में सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।
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