50 साल से 'लटके' लोकपाल पर नहीं साफ हो पा रही तस्वीर

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50 साल से 'लटके' लोकपाल पर नहीं साफ हो पा रही तस्वीर
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संपादकीय: लोकपाल का रास्ता

संपादकीय: लोकपाल का रास्ता जनसत्ता March 19, 2019 3:27 AM पीसी घोष, सुप्रीम कोर्ट से मई 2017 में रिटायर हुए थे। वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के भी वरिष्ठतम सदस्यों में से एक हैं। पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ठोस व्यवस्था की बात के साथ लोकपाल की नियुक्ति एक अहम राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। हर थोड़े अंतराल के बाद एक प्रक्रिया के तहत लोकपाल की नियुक्ति का सवाल सामने आता है, लेकिन अब तक इस दिशा में तस्वीर साफ नहीं हो सकी है। लेकिन एक ताजा घटनाक्रम में जो बातें सामने आई हैं, अगर वे इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं और कोई बाधा नहीं खड़ी होती है तो संभवत: देश में पहले लोकपाल की नियुक्ति का मसला अपने अंजाम तक पहुंचे। दरअसल, रविवार को आई एक खबर के मुताबिक लोकपाल की नियुक्ति के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीसी घोष के नाम पर सक्रियता से विचार कर रही है। हालांकि फिलहाल इसे लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कोई नया विवाद या सवाल नहीं उभरता है तो यह तय माना जा रहा है कि पीसी घोष देश के पहले लोकपाल के रूप में काम शुरू करेंगे। लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि सरकार की ओर से इस मसले पर विपक्ष को भरोसे में लेने और एक ऐसे पद पर सर्वसम्मति बनाने को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं, जो आने वाले वक्त में राजनीति में फैले भ्रष्टाचार के मसले पर निर्णायक भूमिका वाला साबित होने वाला है। गौरतलब है कि बीते सात मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जेनरल केके वेणुगोपाल को दस दिनों में लोकपाल की नियुक्ति के लिए चयन समिति की बैठक की संभावित तारीख के बारे में सूचित करने को कहा था। हालांकि अब भी इस बात की आशंका जताई जा रही है कि अगर पीसी घोष को लोकपाल बनाया जाता है तो इससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है। दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में शामिल होने के आमंत्रण के बाद लोकपाल के लिए चयन समिति की बैठक का बहिष्कार किया था। इसके पीछे वजह यह हो सकती है कि इस अहम मामले में चयन समिति के किसी फैसले तक पहुंचने में विपक्ष की राय को कितनी तरजीह मिल रही है। बहस का विषय यह भी है कि लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी और आंतरिक सुरक्षा जैसे कुछ विषयों को लेकर क्या व्यवस्था होगी। यों एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का तकाजा यही है कि लोकपाल जैसी संस्था के मामले में समुचित पारदर्शिता का ध्यान रखा जाए, ताकि इसकी विश्वसनीयता को पुख्ता आधार मिले। कोशिश यह होनी चाहिए कि एक बार जब लोकपाल नामक संस्था काम करने लगे तो उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर कोई विवाद न खड़ा हो। लेकिन इतने सालों बाद आज भी अगर इस दिशा में कोई ठोस फैसला सामने नहीं आ सका है तो यह राजनीतिक दलों और सरकार की अधूरी इच्छाशक्ति का ही उदाहरण है। यह एक विचित्र स्थिति है कि सत्ता और सरकारी तंत्र में पसरे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के सवाल पर आमतौर पर सभी राजनीतिक पार्टियां सहमत दिखाई पड़ती हैं। इसके लिए देश भर में कई बार आंदोलन भी खड़े हुए। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार सरकार को राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर नोटिस जारी किया। मगर लोकपाल के रूप में एक स्वतंत्र संस्था के आकार लेने का मसला करीब पांच दशक से अधर से लटका हुआ है। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App.

संपादकीय: लोकपाल का रास्ता जनसत्ता March 19, 2019 3:27 AM पीसी घोष, सुप्रीम कोर्ट से मई 2017 में रिटायर हुए थे। वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के भी वरिष्ठतम सदस्यों में से एक हैं। पिछले कई सालों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक ठोस व्यवस्था की बात के साथ लोकपाल की नियुक्ति एक अहम राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। हर थोड़े अंतराल के बाद एक प्रक्रिया के तहत लोकपाल की नियुक्ति का सवाल सामने आता है, लेकिन अब तक इस दिशा में तस्वीर साफ नहीं हो सकी है। लेकिन एक ताजा घटनाक्रम में जो बातें सामने आई हैं, अगर वे इसी दिशा में आगे बढ़ती हैं और कोई बाधा नहीं खड़ी होती है तो संभवत: देश में पहले लोकपाल की नियुक्ति का मसला अपने अंजाम तक पहुंचे। दरअसल, रविवार को आई एक खबर के मुताबिक लोकपाल की नियुक्ति के लिए सरकार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश पीसी घोष के नाम पर सक्रियता से विचार कर रही है। हालांकि फिलहाल इसे लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन कोई नया विवाद या सवाल नहीं उभरता है तो यह तय माना जा रहा है कि पीसी घोष देश के पहले लोकपाल के रूप में काम शुरू करेंगे। लेकिन यह इस पर निर्भर करता है कि सरकार की ओर से इस मसले पर विपक्ष को भरोसे में लेने और एक ऐसे पद पर सर्वसम्मति बनाने को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं, जो आने वाले वक्त में राजनीति में फैले भ्रष्टाचार के मसले पर निर्णायक भूमिका वाला साबित होने वाला है। गौरतलब है कि बीते सात मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जेनरल केके वेणुगोपाल को दस दिनों में लोकपाल की नियुक्ति के लिए चयन समिति की बैठक की संभावित तारीख के बारे में सूचित करने को कहा था। हालांकि अब भी इस बात की आशंका जताई जा रही है कि अगर पीसी घोष को लोकपाल बनाया जाता है तो इससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है। दरअसल, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने ‘विशेष आमंत्रित’ के रूप में शामिल होने के आमंत्रण के बाद लोकपाल के लिए चयन समिति की बैठक का बहिष्कार किया था। इसके पीछे वजह यह हो सकती है कि इस अहम मामले में चयन समिति के किसी फैसले तक पहुंचने में विपक्ष की राय को कितनी तरजीह मिल रही है। बहस का विषय यह भी है कि लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संबंध, बाहरी और आंतरिक सुरक्षा जैसे कुछ विषयों को लेकर क्या व्यवस्था होगी। यों एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का तकाजा यही है कि लोकपाल जैसी संस्था के मामले में समुचित पारदर्शिता का ध्यान रखा जाए, ताकि इसकी विश्वसनीयता को पुख्ता आधार मिले। कोशिश यह होनी चाहिए कि एक बार जब लोकपाल नामक संस्था काम करने लगे तो उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर कोई विवाद न खड़ा हो। लेकिन इतने सालों बाद आज भी अगर इस दिशा में कोई ठोस फैसला सामने नहीं आ सका है तो यह राजनीतिक दलों और सरकार की अधूरी इच्छाशक्ति का ही उदाहरण है। यह एक विचित्र स्थिति है कि सत्ता और सरकारी तंत्र में पसरे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के सवाल पर आमतौर पर सभी राजनीतिक पार्टियां सहमत दिखाई पड़ती हैं। इसके लिए देश भर में कई बार आंदोलन भी खड़े हुए। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार सरकार को राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर नोटिस जारी किया। मगर लोकपाल के रूप में एक स्वतंत्र संस्था के आकार लेने का मसला करीब पांच दशक से अधर से लटका हुआ है। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

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