फरीदाबाद के एक शिक्षक में महज 38 साल की उम्र में ऐसी गंभीर बीमारी का पता चला है जो आमतौर पर बुजुर्ग लोगों में होती है और उनकी लाइफस्टाइल को पूरी तरह सुस्त कर देती है.
Parkinson Disease symptoms in young Indians: लउउफरीदाबाद में 38 साल के एक शिक्षक को स्कूल से लौटते ही थकान और तनाव महसूस होता था. काफी समय तक इसे इग्नोर करने के बाद जब टीचर ने डॉक्टरों को दिखाया तो पार्किंसंस बीमारी का पता चला जो अभी तक बुजुर्गों की बीमारी मानी जाती थी.
इतना ही मरीज की जांच के बाद एक ऐसे जीन पैटर्न का भी पता चला है जो बताता है कि भारतीय लोगों में इस बीमारी की जल्दी शुरुआत हो रही है.इसे लेकर डॉक्टरों ने न केवल चेतावनी दी है बल्कि दावा किया कि नए अध्ययन में यह पता चला है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पार्किन और बीएसएन जैसे भारतीय जीन में पार्किसंस के शुरुआती लक्षण जल्दी देखने को मिले हैं. फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल में दिखाने पहुंचे 38 वर्षीय शिक्षक दिव्यांशु गोयल में पार्किंसंस बीमारी में आनुवंशिक प्रवृत्ति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है. इस केस ने भारतीयों में इस बीमारी के प्रति एक खास जेनेटिक कमी के बारे में भी जानकारी दी है. बीमारी को लेकर मरीज गोयल ने महसूस किया कि उनकी चाल धीमी होती जा रही थी, लिखावट बिगड़ रही थी और उनका शरीर पहले की तरह सहजता से नहीं चल पा रहा था. शुरुआत में उन्होंने सोचा कि शायद यह सब थकान होने की वजह से हो रहा है लेकिन जब उन्होंने न्यूरोलॉजिकल जांच कराई तो पता चला कि ये पार्किंसंस बीमारी के शुरुआती लक्षण थे. डॉक्टर संजय पांडे बोले- मरीज हैरान था पार्किंसन बीमारी अब युवाओं में भी हो रही है. अमृता हॉस्पिटल फरीदाबाद में न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट और स्ट्रोक मेडिसिन के हेड प्रोफेसर डॉ संजय पांडे ने इस केस को संभालने के बाद बताया, ‘जब मरीज हमारे पास आया तो वह निदान के नतीजों को जानकर बहुत हैरान था. उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी कम उम्र में उसमें पार्किंसंस के लक्षण दिख रहे थे. उसका यह मामला भारत में सामने आ रहे ऐसे कई मामलों में से एक है, जो दिखाता है कि पार्किंसंस बीमारी अब युवा उम्र के लोगों में भी बढ़ रही है.’ डॉ. संजय ने बताया कि गोयल के लक्षण पार्किन जीन की वजह से ट्रिगर हुए. पार्किन और एसएनसीए जैसे जाने-माने जीन के साथ-साथ नई भारतीय स्टडीज बीएसएन जीन की ओर भी इशारा कर रही हैं. यह जीन दक्षिण एशियाई लोगों में ज्यादा पाया जाता है. इस ट्रेंड के बारे में और जानकारी देते हुए डॉ पांडे ने कहा, ‘जीन पैटर्न में यह बदलाव दिखाता है कि क्यों उम्र के 30 या 40 वाले लोग शुरुआती पार्किंसंस के लक्षणों को तनाव या थकान मानकर दरकिनार कर देते हैं. भारत जैसे देश जहां जीवन प्रत्याशा के साथ-साथ न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर भी बढ़ रहे हैं, वहां रोज के क्लीनिकल प्रैक्टिस में जेनेटिक ज्ञान को सम्मिलित करना बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है.’ उन्होंने आगे बताया कि उनका अनुभव एक नई भारतीय स्टडी से मेल खाता है. यह स्टडी इस बात को सही ठहरा रही है कि पार्किंसंस बीमारी चुपचाप तरीके से कम उम्र के लोगों में भी पनप रही है. रिसर्चर्स ने 674 कम उम्र के मरीजों की जांच की और पाया कि 50 साल से कम उम्र के भारतीयों में इस बीमारी के होने के सबसे बड़े कारण जेनेटिक हैं. इस ट्रेंड पर की गई ग्लोबल रिसर्च भी इस बदलाव को बल दे रही हैं. नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की एक बड़ी स्टडी ने हाल ही में कमांडर जीन कॉम्प्लेक्स की पहचान की है. यह जीन दिमाग के प्रोटीन-रीसाइक्लिंग सिस्टम में शामिल जीन का एक सेट होता है. जब यह प्रक्रिया नहीं हो पाती है तो यह पार्किंसंस से जुड़े दिमाग के सेल्स को मार देता है. यह खोज अब बीमारी का जल्दी पता लगाने और बीमारी के बढ़ने पर अंतर्राष्ट्रीय बातचीत को बढ़ावा दे रही है. ऐसे किया गया मरीज का इलाज पार्किंसन बीमारी का पहला लक्षण थकान है. अमृता हॉस्पिटल में मरीज टीचर के इलाज में टारगेटेड मेडिकेशन, फिजियोथेरेपी, संतुलित ट्रेनिंग और स्पीच थेरेपी शामिल की गई थी. बाद में उनमें एक प्रक्रिया की गई, जिसके तहत उनके दिमाग के अंदर एक इलेक्ट्रिकल लीड्स को डाला गया ताकि उनके मूवमेंट सिग्नल्स में सुधार हो सके. इस प्रक्रिया की वजह से वह पहले की तरह फिर से अपनी शारीरिक क्षमता वापस पाने में सफल हुए. टीचर बोले, नहीं हुआ था भरोसा खुद में अचानक से इन लक्षणों के पता चलने पर प्रतिक्रिया देते हुए दिव्यांशु गोयल ने कहा, ‘जब डॉक्टरों ने मुझे बताया कि मुझमें पार्किंसंस के लक्षण हैं तो सच बताऊं, मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. मैं 38 साल का होने के नाते सोचा करता था कि यह बीमारी उम्रदराज लोगों को होती है. जांच के नतीजों से मैं बहुत हैरान था लेकिन अच्छी बात यह रही कि इलाज से मुझे अपनी जिंदगी का कंट्रोल फिर से मिल गया है. मैने दुबारा पढ़ाना शुरू कर दिया है और मुझे उम्मीद है कि इसी तरह से मेरी जिंदगी आगे भी अच्छे से बीतती रहेगी.’ बता दें कि मरीज का इलाज महीने भर के अंदर में ही हो गया और उसमें उसके लक्षण नियंत्रित हो गए. वर्तमान में वह अपने प्रोफेशनल और पर्सनल रुटीन में वापस आ गया है. उसकी रिकवरी यह दिखाती है कि अगर पार्किंसंस का जल्दी पता चल जाए, तो इसे समय पर मैनेज किया जा सकता है और इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है.
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