अवध के अंतिम शासक वाजिद अली शाह को कलकत्ता (अब कोलकाता) स्थित मटियाबुर्ज जेल में अंग्रेजों ने कैद कर लिया था। इस घटना के बाद, वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। उन्होंने एक अवसर पर चिनहट और दिलकुशा में ब्रिटिश सेना पर विजय प्राप्त की। बेगम हज़रत महल ने नेपाल में शरण ली और 1879 में वहीं उनकी मौत हो...
किंवदंती है कि लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की कुल 300 बीवियां थी। उनमें से कुछ बेगम हज़रत महल के साथ संघर्ष में शामिल हुईं। कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के दौरान जब अंग्रेजों ने लखनऊ महल को कब्जा लिया। तमाम नौकर और नवाब की 300 बीवियां भी भाग गईं।एक और किवदंती है कि अंग्रेजों ने महल से वाजिद अली शाह को पकड़ लिया। अंग्रेज सिपाहियों ने नवाब वाजिद अली शाह से पूछा- पूरा महल खाली हो गया है। सभी भाग गए हैं। आप भाग क्यों नहीं गए? इस पर नवाब साहब ने कहा- मुझे अपने जूते नहीं मिल रहे।अवध पर 9 साल तक राज करने वाले वाजिद अली शाह को लखनऊ शहर में विद्रोह के दौरान 20,000 लोगों की मौत के बाद अपनी गद्दी गंवानी पड़ी।नवाब वाजिद अली शाह की वंशज मंजिलात फातिमा ने बताया कि 1856 में नवाब साहब की रियासत पर ब्रिटिश इंडिया कंपनी का राज हो गया था।तब नवाब वाजिद अली शाह अपने कुछ खास लोगों के साथ कानपुर होते हुए कोलकाता के मटियाबुर्ज पहुंचे थे। यहीं पर नवाब साहब ने छोटा लखनऊ बसाया।मंजिलात फातिमा ने बताया कि नवाब साहब मटियाबुर्ज में बसने नहीं आए थे। दरअसल वह अपनी मां के साथ कोलकाता के रास्ते लंदन जा रहे थे।नवाब साहब की प्लानिंग थी कि वह लंदन जाकर क्वीन विकटोरिया के सामने कहेंगे कि उनपर झूठे आरोप लगाकर उनकी रियासत छिनी गई है। उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करने से उन्हें उनकी सल्तनत वापस मिल जाएगी।मटियाबुर्ज में नवाब साहब बीमार हो गए। उसी दौरान 1857 की क्रांति शुरू हो गई, जिसके बाद वाजिद अली शाह को फोर्ट विलियम में नजरबंद कर दिया गया।इसके बाद नवाब वाजिद अली शाह को लगा कि वह लखनऊ नहीं लौट नहीं पाएंगे। इसके बाद उन्होंने मटियाबुर्ज में छोटा लखनऊ बसाना शुरू कर दिया था।इसके बाद धीरे-धीरे लखनऊ से भारी संख्या में लोग मटियाबुर्ज पहुंचने लगे। जब नवाब साहब की मौत हुई तो मटियाबर्जु में करीब 40 हजार लखनऊ के लोग बस चुके थे।.
किंवदंती है कि लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की कुल 300 बीवियां थी। उनमें से कुछ बेगम हज़रत महल के साथ संघर्ष में शामिल हुईं। कहा जाता है कि 1857 की क्रांति के दौरान जब अंग्रेजों ने लखनऊ महल को कब्जा लिया। तमाम नौकर और नवाब की 300 बीवियां भी भाग गईं।एक और किवदंती है कि अंग्रेजों ने महल से वाजिद अली शाह को पकड़ लिया। अंग्रेज सिपाहियों ने नवाब वाजिद अली शाह से पूछा- पूरा महल खाली हो गया है। सभी भाग गए हैं। आप भाग क्यों नहीं गए? इस पर नवाब साहब ने कहा- मुझे अपने जूते नहीं मिल रहे।अवध पर 9 साल तक राज करने वाले वाजिद अली शाह को लखनऊ शहर में विद्रोह के दौरान 20,000 लोगों की मौत के बाद अपनी गद्दी गंवानी पड़ी।नवाब वाजिद अली शाह की वंशज मंजिलात फातिमा ने बताया कि 1856 में नवाब साहब की रियासत पर ब्रिटिश इंडिया कंपनी का राज हो गया था।तब नवाब वाजिद अली शाह अपने कुछ खास लोगों के साथ कानपुर होते हुए कोलकाता के मटियाबुर्ज पहुंचे थे। यहीं पर नवाब साहब ने छोटा लखनऊ बसाया।मंजिलात फातिमा ने बताया कि नवाब साहब मटियाबुर्ज में बसने नहीं आए थे। दरअसल वह अपनी मां के साथ कोलकाता के रास्ते लंदन जा रहे थे।नवाब साहब की प्लानिंग थी कि वह लंदन जाकर क्वीन विकटोरिया के सामने कहेंगे कि उनपर झूठे आरोप लगाकर उनकी रियासत छिनी गई है। उन्हें उम्मीद थी कि ऐसा करने से उन्हें उनकी सल्तनत वापस मिल जाएगी।मटियाबुर्ज में नवाब साहब बीमार हो गए। उसी दौरान 1857 की क्रांति शुरू हो गई, जिसके बाद वाजिद अली शाह को फोर्ट विलियम में नजरबंद कर दिया गया।इसके बाद नवाब वाजिद अली शाह को लगा कि वह लखनऊ नहीं लौट नहीं पाएंगे। इसके बाद उन्होंने मटियाबुर्ज में छोटा लखनऊ बसाना शुरू कर दिया था।इसके बाद धीरे-धीरे लखनऊ से भारी संख्या में लोग मटियाबुर्ज पहुंचने लगे। जब नवाब साहब की मौत हुई तो मटियाबर्जु में करीब 40 हजार लखनऊ के लोग बस चुके थे।
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