13 वर्ष में संन्यास, 33 वर्ष में इतिहास: मुनि तरुण सागर का अद्वितीय जीवन
नई दिल्ली, 31 अगस्त । जब कभी समाज सुधार, आध्यात्मिक क्रांति और निडर वक्तृत्व की बात होती है, तो जैन धर्म की दिगंबर परंपरा के तेजस्वी संत मुनि तरुण सागर जी महाराज का नाम सबसे पहले लिया जाता है। 26 जून 1967 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के गहंची गांव में पवन कुमार जैन के रूप में जन्मे तरुण सागर ने मात्र 13 वर्ष की आयु में संन्यास की राह चुन ली। यही वह निर्णय था, जिसने आगे चलकर उन्हें न सिर्फ जैन समाज का, बल्कि संपूर्ण भारत का राष्ट्रसंत बना दिया। Advertismentउन्होंने 13 वर्ष की आयु में दीक्षा ली और 20 जुलाई 1988 को दिगंबर मुनि दीक्षा धारण की। यह वह आयु थी जब अधिकांश बच्चे किशोरावस्था में खोए रहते हैं, वहीं तरुण सागर ने जीवन को तप और साधना के मार्ग पर समर्पित कर दिया। केवल 33 वर्ष की आयु में उन्होंने दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले से राष्ट्र को संबोधित कर इतिहास रचा। यह पहली बार था जब किसी मुनि ने लालकिले से अपनी वाणी का अमृत बरसाया। उनके प्रवचनों की शक्ति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 122 देशों में टीवी के माध्यम से उनकी वाणी का सीधा प्रसारण हुआ। तरुण सागर का नाम आते ही सबसे पहले कड़वे प्रवचन स्मरण होते हैं। उनकी वाणी में कटुता नहीं, बल्कि समाज की कमियों पर चोट थी। भ्रष्टाचार, पाखंड, नशा, दहेज और राजनीतिक स्वार्थ पर वे खुलकर बोलते थे। यही कारण था कि उनके प्रवचन न सिर्फ जैन समाज, बल्कि हर धर्म और वर्ग के लोगों को झकझोर जाते थे। उनकी वाणी सरल थी, लेकिन उसमें दम था। वे कहते थे कि सत्य कड़वा है, पर वही जीवन को सही दिशा देता है। इसी दृष्टि से उनके प्रवचनों का संग्रह लाखों प्रतियों में प्रकाशित हुआ और आज भी घर-घर में पढ़ा जाता है। तरुण सागर केवल एक संत नहीं थे, वह एक गहन चिंतक भी थे। उन्होंने परिवार से लेकर राजनीति तक हर मुद्दे पर आवाज उठाई। उनकी शैली व्यंग्यपूर्ण थी, लेकिन उसमें व्यावहारिक समाधान भी होते थे। उन्होंने कहा था कि धर्म केवल मंदिर की दीवारों तक सीमित न रहे, बल्कि वह परिवार और समाज के हर कोने में जिए। यही कारण था कि जैन समाज से बाहर भी उन्हें अपार लोकप्रियता मिली। देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर आम नागरिक तक उनकी वाणी से प्रभावित हुए। इस संत ने 35 वर्ष की आयु में राष्ट्रसंत की सम्मानजनक उपाधि प्राप्त की। 37 वर्ष की आयु में उन्होंने गुरु मंत्र दीक्षा की परंपरा शुरू कर लाखों अनुयायियों को प्रेरित किया। भारतीय सेना और राजभवन जैसे प्रतिष्ठित मंचों से संबोधन करने वाले वे पहले संत बने, जो उनकी व्यापक स्वीकार्यता और प्रभाव को दर्शाता है। इसके साथ ही, उन्होंने 36 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनकी 10 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं, जो उनके साहित्यिक योगदान और समाज पर गहरे प्रभाव को रेखांकित करता है। उन्होंने 1 सितंबर 2018 को दिल्ली स्थित राधापुरी जैन मंदिर में देह त्याग दिया। उनके निधन से न सिर्फ जैन समाज, बल्कि पूरे भारत ने एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक खो दिया। उनकी विरासत आज भी जीवित है। --आईएएनएस पीएसके/एबीएम डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है.
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