128 साल बाद ब्रज लौटे, 25 साल बाद जयपुर गए राधादामोदर जी

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128 साल बाद ब्रज लौटे, 25 साल बाद जयपुर गए राधादामोदर जी
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मुगल शासन के दौरान राधादामोदर जी के विस्थापन की कहानी। औरंगजेब के आतंक के कारण वृंदावन से जयपुर जाना, 63 साल जयपुर में निवास, और फिर रानी की अर्जी पर दोबारा जयपुर वापसी की कथा।

128 साल बाद ब्रज लौटे, 25 साल बाद महारानी की अर्जी पर फिर जयपुर गएमथुरा के राजा गोकुला की हार के बाद मुगलिया फौज भेड़ियों की तरह लोगों पर टूट पड़ी थी। सामने बच्चा हो या बूढ़ा इससे कोई मतलब नहीं था। उनका मकसद हिंदुओं में इतना डर भर देना था कि वे मन में भी अपने आराध्य का नाम लेने से कांप जाएं। तमाम मंदिर गिरा दिए गएचौथे एपिसोड में आज पढ़िए राधादामोदर जी के विस्थापन की कहानी। वे वृंदावन से निकलने के बाद 63 साल जयपुर में रहे। औरंगजेब का आतंक खत्म होने के बाद वृंदावन लौट आए। 25 साल बाद रानी जी की अर्जी पर दोबारा जयपुर आए… मथुरा को तबाह करने के बाद औरंगजेब का फौजदार हसन अली वृंदावन कूच कर चुका था। भक्ति और उल्लास में डूबा रहने वाला धाम अब मरघट सा मालूम होता था। हवा में तैरती घंटियों और मृदंग की झंकार हसन अली के कानों में पड़ी। उसके चेहरे पर चिढ़ और आश्चर्य के भाव थे। फौजदार गुस्से में बोला- “न जाने कितने मंदिर बना रखे हैं इन काफिरों ने। दर्जनों बुतखाने जमींदोज कर चुका हूं। जब सोचता हूं कि ये आखिरी होगा, एक नया नाम सामने आ जाता है। कहां से आ रही है ये आवाज?”“हुजूर, वृंदावन यहां से ज्यादा दूर नहीं है। ये आवाज शायद राधादामोदर मंदिर से आ रही है।” फौजदार ने दूर उस तरफ देखा जहां से घंटियों की आवाज आ रही थी। मंद हो चली सूरज की रोशनी में वृंदावन के मंदिरों के शिखर सोने से दमक रहे थे। उसकी आंखें सिकुड़ गईं। वह कुछ देर चुप रहा फिर तलवार की मूठ थामी और कड़क आवाज में बोला- “कल रात होने से पहले ये बुतखाना जमींदोज हो जाना चाहिए। ऐसा सबक सिखाओ इन काफिरों को कि दोबारा बुतबरस्ती करने की हिमाकत न कर सकें।” वृंदावन में राधादामोदर मंदिर के सेवायत नवल गोस्वामी विग्रह को बचाने की योजना बनाने में जुटे थे। उधर मथुरा में हुए अत्याचारों की खबर वृंदावन पहुंच चुकी थी। वहां की हवाओं ने अजीब सी चुप्पी ओढ़ ली थी। वृंदावन के गोस्वामियों के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी- राधादामोदर मंदिर के सेवायत नवल गोस्वामी के पास बैठे बातचीत कर रहे थे। किसी ने धीमी खबर दी, “ औरंगजेब के सिपाही कल सुबह वृंदावन पहुंच जाएंगे। उससे पहले प्रभु को कैसे निकालेंगे।” नवल गोस्वामी सब कुछ सुन रहे थे।“कोई नई बात नहीं है। वृंदावन पहले भी ये सब देख चुका है। गजनवी​​, तुगलक, लोदी न जाने कितने आए, लेकिन हमारे ठाकुर को कोई छू भी नहीं सका। मंदिर क्या है, जहां ठाकुर विराजेंगे वहीं मंदिर हो जाएगा।” रात का तीसरा पहर। कुछ घुड़सवार परछाई की तरह नगर में दाखिल हुए और राधादामोदर मंदिर के पास रुके। गोस्वामियों से मिले। गोस्वामियों ने राधादामोदर का विग्रह पहले ही लकड़ी के संदूक में छिपा दिया। निकलने से पहले नवल गोस्वामी ने मंदिर के सूने गर्भगृह की तरफ देखा। विनती की- “जो सबका रक्षक है, हम उसे बचाने का दावा नहीं कर सकते। प्रभु, ये आपकी लीला है। हमारे भाग्य में आपके लीलामंच का पात्र बनना लिखा है तो वही सही।”“आंसू बहाने से काम नहीं बनेगा, हिम्मत से आगे बढ़ना होगा।” घोड़ागाड़ी में संदूक रखा गया। गोस्वामियों के साथ उनके परिवार के लोग भी थे। सभी इस तरह तैयार हुए जैसे कोई परिवार गांव छोड़कर जा रहा है। रास्ता कठिन था। जंगल, झाड़ी, खेत-खलिहान… छह-आठ गांव के बाद मुगल चौकियां। मुख्य सेवायत नवल गोस्वामी ने राधादामोदर जी का विग्रह एक संदूक में छुपाकर वृंदावन से बाहर ले जाने की योजना बनाई। दिन में पकड़े जाने का डर रहता इसलिए सफर रात में होता और दिन में आराम। एक रात इतनी तेज बारिश हुई कि न तो रोशनी का इंतजाम हुआ और न ही दिशाओं का भान रहा। रास्ता भटककर वापस वृंदावन की ओर लौटने लगे। कुछ शंका हुई तो रास्ता फिर बदला गया। कई दिन के कठिन सफर के बाद राधाकुंड पहुंचे। दामोदर जी को विराजमान किया गया। आसपास के लोग रोज भगवान को भोग चढ़ाते। ग्वाले दूध और मिठाइयां लाते; किसान चावल, दाल और आटे का बंदोबस्त कर जाते। करीब 13 साल यूं ही बीत गए। माहौल कुछ बदल रहा था, लेकिन औरंगजेब का उत्पात अभी बंद नहीं हुआ था। राधादामोदर को कामवन यानी कामां ले जाया गया। कामवन का कण-कण पहले ही कृष्णमय था। कई विग्रह पहले ही वहां से होते हुए आमेर की ओर गए थे। राधादामोदर के पहुंचने की खबर लोगों को मिली तो नगर में नई ऊर्जा फैल गई। यह खबर सरदार जवाहर जाट को मिली तो वे दर्शन के लिए आए। ऐसी लगन लगी कि राजीरदारी भूलकर ठाकुर जी की सेवा में लग गए। भोग लगाते, मृदंग बजाते और गाते-उधर औरंगजेब की आंखें इन विग्रहों की तलाश में भटक रही थीं। दिल्ली से लेकर आगरा तक फरमान था “जो उन मूर्तियों का ठिकाना बताएगा, जहांपनाह उसे मालामाल कर देंगे।” इस लालच में कुछ अपने भी जासूसी करने लगे थे। कई बार मुगल फौज आसपास के गांवों में पहुंचती, तलाशी लेतीं। एक दिन सैनिक उस जगह तक पहुंच गए जहां राधादामोदर विराजमान थे। हवेली के बाहर से ही जवाहर जाट ने अंदर इशारा कर दिया। बिजली की रफ्तार से गोस्वामियों ने विग्रह चादर में लपेटकर संदूक में रख दिया और उसे तहखाने में छिपा दिया।तलाशी में कुछ न मिला। जाते-जाते धमकी दी-“भगवान मन में बसते हैं, पत्थर में नहीं। तुम मलेच्छों को सपने में भी उनकी छाया नहीं मिलेगी।” मुगल फौज को अंदाजा लग गया था कि विग्रह कामवन में ही कहीं है। नगर में अजनबियों की आवाजाही बढ़ गई थी। अब ज्यादा दिन वहां रुकना सुरक्षित नहीं था। एक शाम जब आसमान में बादल थे और हवेली में आरती की तैयारी चल रही थी। जवाहर जाट को पता चला कि कल भोर होते ही फौजदार हसन अली कामवन पहुंचेगा और हर एक घर की तलाशी होगी। नवल गोस्वामी धीरे से बोले-उस रात ठाकुर जी की शयन आरती हुई। इस बार दीपों की लौ में एक अनकहा विरह जल रहा था। जवाहर जाट की आंख में आंसू थे। उन्होंने पूरे भाव से राधादामोदर को रेशमी चादर में लपेटकर संदूक में रख दिया। आधी रात को घोड़ागाड़ी निकल पड़ी अलवर की तरफ। रात का सफर आसान नहीं रहता। घोड़े की टाप और पहियों की चरमराहट के अलावा कोई आवाज न होती। हर मोड़ पर जान का खतरा। कभी कुछ दिन किसी गांव में गुजार लेते। खान-पान का सामान इकट्ठा करके आगे बढ़ जाते।“महाराज, आज प्रभु को यहां से न ले जाएं।” गोस्वामी ने कारण पूछा तो बताया, “मैंने दो कोस दूर मुगल सैनिक देखे हैं। वे रास्ते में आपसे टकरा सकते हैं।”उस रात सब वहीं रुक गए। अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई, लेकिन भगवान परीक्षा ले रहे थे। जंगल में कुछ दूर निकले ही थे कि घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज आई। सभी को मानो पाला मार गया। काफिला पगडंडी से डटकर घने जंगल की ओर मोड़ दिया गया। काफी अंदर जाकर एक गुफा में छुप गए। कच्ची सड़क पर मुगल सिपाहियों ने कुछ निशान देखे। निशान अचानक पगडंडी से हटकर जंगल में जा रहे थे। कुछ सिपाही निशान के पीछे जंगल में चल दिए। गुफा से थोड़ी दूरी पर निशान खत्म हो गए। सिपाहियों ने आसपास खोजना शुरू किया। कुछ सिपाही गुफा के एकदम नजदीक पहुंच गए, लेकिन झाड़ियों से ढंकी गुफा उन्हें नजर नहीं आई। जब कुछ नहीं मिला तो सिपाही वापस लौट गए। नवल गोस्वामी ने राहत की सांस ली और बोले-अलवर, गोविंदपुरा, रोपड़ा और न जाने कितने गांवों में रुकते-ठहरते साल 1734 में राधादामोदर जयपुर पहुंचे। 64 साल की यात्रा में यह ऐसा दिन था जब सूरज की रोशनी से डर नहीं लगा था। दूर से ही आमेर का किला दिख रहा था। सभी के मन में शांति थी। सवाई राजा जय सिंह के पास खबर पहुंची कि नवल गोस्वामी राधादामोदर जी को लेकर जयपुर पधारे हैं और उनसे मिलने राजमहल आए हैं। यह सुनकर राजा का चेहरा उतर गया। किसी को समझ न आया कि खुशी के मौके पर राजा उदास क्यों हैं।“गोस्वामी जी राजमहल क्यों आया, मैं खुद उनकी सेवा में पहुंच जाता। मेरे जीवन से ये पुण्य नष्ट हो गया।”नवल गोस्वामी आए और सिर झुकाकर प्रणाम किया। राजा सिंहासन से उठे और हाथ जोड़कर बोले- “ वृंदावन की भक्ति हमारे नगर में आई है। ठाकुर जी के आगमन से जयपुर धन्य हुआ। माफी चाहता हूं कि आपको राजमहल आना पड़ा। अहो भाग्य होता अगर मैं दर्शन करने आता।”“सबके सहयोग से प्रभु की वनयात्रा पूरी हुई। वृंदावन से यहां तक सभी भाई-बंधुओं ने ठाकुर जी का भोग-राग संभाला। अब आपको संभालना है।”“आज से राधादामोदर जी का भोग की व्यवस्था राजकोष से की जाएगी। रोजाना तीन रुपए… शुद्ध घी, दूध, मक्खन, मिश्री, फल, फूल कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं होनी चाहिए।” सिर्फ राजा ही नहीं जयपुर के सेठ-साहूकार भी कृष्णसेवा में जुट गए। हिम्मतराम नाजिर को पता चला तो वे प्रार्थना करने लगे-हिम्मतराम नाजिर ने नवल गोस्वामी से कहा कि राधादामोदर जी को उनकी हवेली में विराजमान किया जाए।“प्रभु झोपड़ी में भी रहते हैं तो राजमहल हो जाता है। गोसाईं जी मेरी जायदाद, मेरे पुरखों की हवेली का कोई वारिस नहीं है। मुझे तो ठाकुर जी का ही सहारा है। वही नाथ हैं और वही वारिस। मैं चाहता हूं ठाकुर जी मेरी हवेली में विराजें।”“आपकी कृपा से मैंने बहुत धन कमाया है प्रभु, आज पहली बार धन सार्थक हो रहा है।”“जैसी ठाकुर के भक्त की इच्छा। राधादामोदर जी आपके आंगन में ही विराजेंगे।”63 साल बाद वृंदावन लौटे राधादामोदर साल 1797, करीब 63 साल जयपुर की उस हवेली में निवास करने के बाद राधादामोदर वृंदावन लौट आए। ऐसा क्यों हुआ इसकी ठीक-ठीक वजह किसी को नहीं पता। कुछ इतिहास कारों का मानना है कि उस समय प्रभु के भोग-राग का इंतजाम ठीक से नहीं हो पा रहा था। इसी वजह से राधादामोदर वृंदावन लौट आए, लेकिन जयपुर के मन में हमेशा इस बात की पीर रही। सवाई राजा प्रताप सिंह को मरते दम तक यह टीस रही। उनके बाद सवाई राजा जगत सिंह की पत्नी ने राधादामोदर जी को वापस जयपुर लाने की कोशिश शुरू कीं। उन्होंने जयपुर के प्रधानमंत्री रावल बैरिसाल को बुलावा भेजा और बोलीं- “हमारी सेवा में क्या कमी रह गई थी रावल सा, जो प्रभु जयपुर से चले गए?” रावल चुप रहे। रानी जी ने आगे, “आप वृन्दावन जाइए और वहां गोस्वामियों से बात कीजिए। कैसे भी करके प्रभु को वापस लाइए।” रानी जी की बात सुनकर रावल बैरिसाल फिर चुप रहे। रनिवास में राधाकृष्ण के विग्रह के सामने दीप टिमटिमा रहा था। रावल ने सिर झुकाकर धीरे से कहा- “रानी सा, प्रभु तो अपने भक्तों की इच्छा के अधीन हैं, लेकिन उन्हें दोबारा जयपुर लाना आसान नहीं है। फिर भी जैसा आपका हुकुम… मैं खुद वृंदावन जाऊंगा।” सवाई राजा जगत सिंह की पत्नी ने राधादामोदर जी को जयपुर वापस लाने के लिए जयपुर के प्रधानमंत्री रावल बैरिसाल को वृंदावन भेजा।“रावल जी, प्रभु के बिना जयपुर सूना है। हमारे महलों में दीप जलते हैं पर उनमें रोशनी नहीं है। आप गोसाइयों से विनती कीजिए, जरूरत पड़े तो उनके पैर पकड़ लीजिए। बस कुछ भी करके राधादामोदर जी को जयपुर वापस ले आइए।” अगले दिन रावल बैरिसाल वृंदावन के लिए रवाना हुए। वृंदावन पहुंचते ही वे गोस्वामी जी से मिलने चल दिए। उन्होंने कहा-रावल को कहने में झिझक हो रही थी। संकोच के भाव में उन्होंने कहना शुरू किया- “जब से राधादामोदर जी जयपुर से गए हैं, शहर वीरान हो गया है। रानी सा की यही अरजी है कि ठाकुर जी फिर से अपनी हवेली में विराजें।”“रावल जी, जब ठाकुर जी ने वृंदावन छोड़ा था, तब हालात कुछ और थे। अब तो सब शांति है और फिर भगवान राजाज्ञा से नहीं भक्ति के वशीभूत होकर कहीं भी आते-जाते हैं।”“ये राजाज्ञा नहीं अरजी है महाराज। मैं जिद विनती लेकर आया हूं। जैसे बच्चा अपनी मां की गोद से उतरकर बेचैन हो जाता है, वैसे जयपुर भी प्रभु के बिना छटपटा रहा है।” गोस्वामी कुछ न बोले। रावल जी खाली हाथ जयपुर लौट आए। रानी को इसका अंदेशा था। कुछ समय बाद उन्होंने फिर से रावल बैरीसाल को वृंदावन भेजा। रावल फिर से खाली हाथ लौट आए। यह सिलसिला चार-छह महीनों में दोहराया जाने लगा। इसी दौरान रानी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सवाई राजा जगह सिंह अचानक चल बसे। रानी गर्भवती थीं। राजपाट की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी पड़ी। रानी ने अब हर महीने दो महीने में रावल जी को वृंदावन भेजना शुरू कर दिया। आखिरकार साल 1821 में राधादामोदर प्रभु फिर से जयपुर पधारे।“जाइए रावल जी, प्रभु को उनके भक्त के धाम पहुंचा दीजिए। जहां उनका नाम गाया जाए, वही वृंदावन है।” इस बार ठाकुर जी भक्त इच्छा से आए और दोबारा हिम्मतराम की हवेली में विराजमान हुए। पूरा जयपुर यूं सजा था मानो जयपुर नरेश का राजतिलक हो। औरंगजेब के दौर में जयपुर आए कई विग्रह आज भी वहीं विराजमान हैं। राधादामोदर जी के पहुंचने से ये क्रम पूरा हुआ। ‘गुलाबी नगरी’ जयपुर की दूसरी पहचान अब ‘गुप्त वृंदावन ’ है।मलय गोस्वामी, मुख्य सेवायत- राधादामोदर मंदिर, जयपुर । आचार्य कृष्णबलराम, सेवायत- राधादामोदर मंदिर, वृंदावन । लक्ष्मी नारायण तिवारी, सचिव- ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृंदावन । ब्रज विभव: संपादक गोपाल प्रसाद व्यास। मथुरा- वृंदावन के वृहद हिंदू मंदिर: डॉ चंचल गोस्वामी। द कंट्रीब्यूशन ऑफ मेजर हिंदू टेंपल्स ऑफ मथुरा एंड वृंदावन : डॉ चंचल गोस्वामी। औरंगजेब नामा: संपादक डॉ अशोक कुमार सिंह। ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास : प्रभुदयाल मीतल। सनातन के संरक्षण में कछवाहों का योगदान: डॉ सुभाष शर्मा-जितेंद्र शेखावत। जयपुर इतिहास के जानकार- जितेंद्र शेखावत, संतोष शर्मा, प्रो देवेंद्र भगत । गोपीनाथ जी के वृंदावन से जयपुर पहुंचने तक की पूरी कहानी क्रमवार ढंग से किसी एक किताब में नहीं मिलती। भास्कर टीम ने कई दस्तावेजों और इतिहास के जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर यह स्टोरी लिखी है। फिर भी घटनाओं के क्रम में कुछ अंतर हो सकता है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।झारखंड में मौसम रहेगा शुष्क, सुबह में छाएगा कोहराठंड और प्रदूषण ने सांस के मरीजों की बढ़ी मुश्किलेंउत्तराखंड के मैदानी इलाकों में कोहरापचमढ़ी से भी ज्यादा ठंडा हुआ नर्मदापुरमहिमाचल में रात के तापमान में भारी गिरावट.

128 साल बाद ब्रज लौटे, 25 साल बाद महारानी की अर्जी पर फिर जयपुर गएमथुरा के राजा गोकुला की हार के बाद मुगलिया फौज भेड़ियों की तरह लोगों पर टूट पड़ी थी। सामने बच्चा हो या बूढ़ा इससे कोई मतलब नहीं था। उनका मकसद हिंदुओं में इतना डर भर देना था कि वे मन में भी अपने आराध्य का नाम लेने से कांप जाएं। तमाम मंदिर गिरा दिए गएचौथे एपिसोड में आज पढ़िए राधादामोदर जी के विस्थापन की कहानी। वे वृंदावन से निकलने के बाद 63 साल जयपुर में रहे। औरंगजेब का आतंक खत्म होने के बाद वृंदावन लौट आए। 25 साल बाद रानी जी की अर्जी पर दोबारा जयपुर आए… मथुरा को तबाह करने के बाद औरंगजेब का फौजदार हसन अली वृंदावन कूच कर चुका था। भक्ति और उल्लास में डूबा रहने वाला धाम अब मरघट सा मालूम होता था। हवा में तैरती घंटियों और मृदंग की झंकार हसन अली के कानों में पड़ी। उसके चेहरे पर चिढ़ और आश्चर्य के भाव थे। फौजदार गुस्से में बोला- “न जाने कितने मंदिर बना रखे हैं इन काफिरों ने। दर्जनों बुतखाने जमींदोज कर चुका हूं। जब सोचता हूं कि ये आखिरी होगा, एक नया नाम सामने आ जाता है। कहां से आ रही है ये आवाज?”“हुजूर, वृंदावन यहां से ज्यादा दूर नहीं है। ये आवाज शायद राधादामोदर मंदिर से आ रही है।” फौजदार ने दूर उस तरफ देखा जहां से घंटियों की आवाज आ रही थी। मंद हो चली सूरज की रोशनी में वृंदावन के मंदिरों के शिखर सोने से दमक रहे थे। उसकी आंखें सिकुड़ गईं। वह कुछ देर चुप रहा फिर तलवार की मूठ थामी और कड़क आवाज में बोला- “कल रात होने से पहले ये बुतखाना जमींदोज हो जाना चाहिए। ऐसा सबक सिखाओ इन काफिरों को कि दोबारा बुतबरस्ती करने की हिमाकत न कर सकें।”वृंदावन में राधादामोदर मंदिर के सेवायत नवल गोस्वामी विग्रह को बचाने की योजना बनाने में जुटे थे। उधर मथुरा में हुए अत्याचारों की खबर वृंदावन पहुंच चुकी थी। वहां की हवाओं ने अजीब सी चुप्पी ओढ़ ली थी। वृंदावन के गोस्वामियों के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी-राधादामोदर मंदिर के सेवायत नवल गोस्वामी के पास बैठे बातचीत कर रहे थे। किसी ने धीमी खबर दी, “औरंगजेब के सिपाही कल सुबह वृंदावन पहुंच जाएंगे। उससे पहले प्रभु को कैसे निकालेंगे।” नवल गोस्वामी सब कुछ सुन रहे थे।“कोई नई बात नहीं है। वृंदावन पहले भी ये सब देख चुका है। गजनवी​​, तुगलक, लोदी न जाने कितने आए, लेकिन हमारे ठाकुर को कोई छू भी नहीं सका। मंदिर क्या है, जहां ठाकुर विराजेंगे वहीं मंदिर हो जाएगा।” रात का तीसरा पहर। कुछ घुड़सवार परछाई की तरह नगर में दाखिल हुए और राधादामोदर मंदिर के पास रुके। गोस्वामियों से मिले। गोस्वामियों ने राधादामोदर का विग्रह पहले ही लकड़ी के संदूक में छिपा दिया। निकलने से पहले नवल गोस्वामी ने मंदिर के सूने गर्भगृह की तरफ देखा। विनती की- “जो सबका रक्षक है, हम उसे बचाने का दावा नहीं कर सकते। प्रभु, ये आपकी लीला है। हमारे भाग्य में आपके लीलामंच का पात्र बनना लिखा है तो वही सही।”“आंसू बहाने से काम नहीं बनेगा, हिम्मत से आगे बढ़ना होगा।” घोड़ागाड़ी में संदूक रखा गया। गोस्वामियों के साथ उनके परिवार के लोग भी थे। सभी इस तरह तैयार हुए जैसे कोई परिवार गांव छोड़कर जा रहा है। रास्ता कठिन था। जंगल, झाड़ी, खेत-खलिहान… छह-आठ गांव के बाद मुगल चौकियां। मुख्य सेवायत नवल गोस्वामी ने राधादामोदर जी का विग्रह एक संदूक में छुपाकर वृंदावन से बाहर ले जाने की योजना बनाई। दिन में पकड़े जाने का डर रहता इसलिए सफर रात में होता और दिन में आराम। एक रात इतनी तेज बारिश हुई कि न तो रोशनी का इंतजाम हुआ और न ही दिशाओं का भान रहा। रास्ता भटककर वापस वृंदावन की ओर लौटने लगे। कुछ शंका हुई तो रास्ता फिर बदला गया। कई दिन के कठिन सफर के बाद राधाकुंड पहुंचे। दामोदर जी को विराजमान किया गया। आसपास के लोग रोज भगवान को भोग चढ़ाते। ग्वाले दूध और मिठाइयां लाते; किसान चावल, दाल और आटे का बंदोबस्त कर जाते। करीब 13 साल यूं ही बीत गए। माहौल कुछ बदल रहा था, लेकिन औरंगजेब का उत्पात अभी बंद नहीं हुआ था। राधादामोदर को कामवन यानी कामां ले जाया गया। कामवन का कण-कण पहले ही कृष्णमय था। कई विग्रह पहले ही वहां से होते हुए आमेर की ओर गए थे। राधादामोदर के पहुंचने की खबर लोगों को मिली तो नगर में नई ऊर्जा फैल गई। यह खबर सरदार जवाहर जाट को मिली तो वे दर्शन के लिए आए। ऐसी लगन लगी कि राजीरदारी भूलकर ठाकुर जी की सेवा में लग गए। भोग लगाते, मृदंग बजाते और गाते-उधर औरंगजेब की आंखें इन विग्रहों की तलाश में भटक रही थीं। दिल्ली से लेकर आगरा तक फरमान था “जो उन मूर्तियों का ठिकाना बताएगा, जहांपनाह उसे मालामाल कर देंगे।” इस लालच में कुछ अपने भी जासूसी करने लगे थे। कई बार मुगल फौज आसपास के गांवों में पहुंचती, तलाशी लेतीं। एक दिन सैनिक उस जगह तक पहुंच गए जहां राधादामोदर विराजमान थे। हवेली के बाहर से ही जवाहर जाट ने अंदर इशारा कर दिया। बिजली की रफ्तार से गोस्वामियों ने विग्रह चादर में लपेटकर संदूक में रख दिया और उसे तहखाने में छिपा दिया।तलाशी में कुछ न मिला। जाते-जाते धमकी दी-“भगवान मन में बसते हैं, पत्थर में नहीं। तुम मलेच्छों को सपने में भी उनकी छाया नहीं मिलेगी।” मुगल फौज को अंदाजा लग गया था कि विग्रह कामवन में ही कहीं है। नगर में अजनबियों की आवाजाही बढ़ गई थी। अब ज्यादा दिन वहां रुकना सुरक्षित नहीं था। एक शाम जब आसमान में बादल थे और हवेली में आरती की तैयारी चल रही थी। जवाहर जाट को पता चला कि कल भोर होते ही फौजदार हसन अली कामवन पहुंचेगा और हर एक घर की तलाशी होगी। नवल गोस्वामी धीरे से बोले-उस रात ठाकुर जी की शयन आरती हुई। इस बार दीपों की लौ में एक अनकहा विरह जल रहा था। जवाहर जाट की आंख में आंसू थे। उन्होंने पूरे भाव से राधादामोदर को रेशमी चादर में लपेटकर संदूक में रख दिया। आधी रात को घोड़ागाड़ी निकल पड़ी अलवर की तरफ। रात का सफर आसान नहीं रहता। घोड़े की टाप और पहियों की चरमराहट के अलावा कोई आवाज न होती। हर मोड़ पर जान का खतरा। कभी कुछ दिन किसी गांव में गुजार लेते। खान-पान का सामान इकट्ठा करके आगे बढ़ जाते।“महाराज, आज प्रभु को यहां से न ले जाएं।” गोस्वामी ने कारण पूछा तो बताया, “मैंने दो कोस दूर मुगल सैनिक देखे हैं। वे रास्ते में आपसे टकरा सकते हैं।”उस रात सब वहीं रुक गए। अगले दिन यात्रा फिर शुरू हुई, लेकिन भगवान परीक्षा ले रहे थे। जंगल में कुछ दूर निकले ही थे कि घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज आई। सभी को मानो पाला मार गया। काफिला पगडंडी से डटकर घने जंगल की ओर मोड़ दिया गया। काफी अंदर जाकर एक गुफा में छुप गए। कच्ची सड़क पर मुगल सिपाहियों ने कुछ निशान देखे। निशान अचानक पगडंडी से हटकर जंगल में जा रहे थे। कुछ सिपाही निशान के पीछे जंगल में चल दिए। गुफा से थोड़ी दूरी पर निशान खत्म हो गए। सिपाहियों ने आसपास खोजना शुरू किया। कुछ सिपाही गुफा के एकदम नजदीक पहुंच गए, लेकिन झाड़ियों से ढंकी गुफा उन्हें नजर नहीं आई। जब कुछ नहीं मिला तो सिपाही वापस लौट गए। नवल गोस्वामी ने राहत की सांस ली और बोले-अलवर, गोविंदपुरा, रोपड़ा और न जाने कितने गांवों में रुकते-ठहरते साल 1734 में राधादामोदर जयपुर पहुंचे। 64 साल की यात्रा में यह ऐसा दिन था जब सूरज की रोशनी से डर नहीं लगा था। दूर से ही आमेर का किला दिख रहा था। सभी के मन में शांति थी। सवाई राजा जय सिंह के पास खबर पहुंची कि नवल गोस्वामी राधादामोदर जी को लेकर जयपुर पधारे हैं और उनसे मिलने राजमहल आए हैं। यह सुनकर राजा का चेहरा उतर गया। किसी को समझ न आया कि खुशी के मौके पर राजा उदास क्यों हैं।“गोस्वामी जी राजमहल क्यों आया, मैं खुद उनकी सेवा में पहुंच जाता। मेरे जीवन से ये पुण्य नष्ट हो गया।”नवल गोस्वामी आए और सिर झुकाकर प्रणाम किया। राजा सिंहासन से उठे और हाथ जोड़कर बोले- “वृंदावन की भक्ति हमारे नगर में आई है। ठाकुर जी के आगमन से जयपुर धन्य हुआ। माफी चाहता हूं कि आपको राजमहल आना पड़ा। अहो भाग्य होता अगर मैं दर्शन करने आता।”“सबके सहयोग से प्रभु की वनयात्रा पूरी हुई। वृंदावन से यहां तक सभी भाई-बंधुओं ने ठाकुर जी का भोग-राग संभाला। अब आपको संभालना है।”“आज से राधादामोदर जी का भोग की व्यवस्था राजकोष से की जाएगी। रोजाना तीन रुपए… शुद्ध घी, दूध, मक्खन, मिश्री, फल, फूल कभी किसी चीज की कोई कमी नहीं होनी चाहिए।” सिर्फ राजा ही नहीं जयपुर के सेठ-साहूकार भी कृष्णसेवा में जुट गए। हिम्मतराम नाजिर को पता चला तो वे प्रार्थना करने लगे-हिम्मतराम नाजिर ने नवल गोस्वामी से कहा कि राधादामोदर जी को उनकी हवेली में विराजमान किया जाए।“प्रभु झोपड़ी में भी रहते हैं तो राजमहल हो जाता है। गोसाईं जी मेरी जायदाद, मेरे पुरखों की हवेली का कोई वारिस नहीं है। मुझे तो ठाकुर जी का ही सहारा है। वही नाथ हैं और वही वारिस। मैं चाहता हूं ठाकुर जी मेरी हवेली में विराजें।”“आपकी कृपा से मैंने बहुत धन कमाया है प्रभु, आज पहली बार धन सार्थक हो रहा है।”“जैसी ठाकुर के भक्त की इच्छा। राधादामोदर जी आपके आंगन में ही विराजेंगे।”63 साल बाद वृंदावन लौटे राधादामोदर साल 1797, करीब 63 साल जयपुर की उस हवेली में निवास करने के बाद राधादामोदर वृंदावन लौट आए। ऐसा क्यों हुआ इसकी ठीक-ठीक वजह किसी को नहीं पता। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उस समय प्रभु के भोग-राग का इंतजाम ठीक से नहीं हो पा रहा था। इसी वजह से राधादामोदर वृंदावन लौट आए, लेकिन जयपुर के मन में हमेशा इस बात की पीर रही। सवाई राजा प्रताप सिंह को मरते दम तक यह टीस रही। उनके बाद सवाई राजा जगत सिंह की पत्नी ने राधादामोदर जी को वापस जयपुर लाने की कोशिश शुरू कीं। उन्होंने जयपुर के प्रधानमंत्री रावल बैरिसाल को बुलावा भेजा और बोलीं- “हमारी सेवा में क्या कमी रह गई थी रावल सा, जो प्रभु जयपुर से चले गए?” रावल चुप रहे। रानी जी ने आगे, “आप वृन्दावन जाइए और वहां गोस्वामियों से बात कीजिए। कैसे भी करके प्रभु को वापस लाइए।” रानी जी की बात सुनकर रावल बैरिसाल फिर चुप रहे। रनिवास में राधाकृष्ण के विग्रह के सामने दीप टिमटिमा रहा था। रावल ने सिर झुकाकर धीरे से कहा- “रानी सा, प्रभु तो अपने भक्तों की इच्छा के अधीन हैं, लेकिन उन्हें दोबारा जयपुर लाना आसान नहीं है। फिर भी जैसा आपका हुकुम… मैं खुद वृंदावन जाऊंगा।” सवाई राजा जगत सिंह की पत्नी ने राधादामोदर जी को जयपुर वापस लाने के लिए जयपुर के प्रधानमंत्री रावल बैरिसाल को वृंदावन भेजा।“रावल जी, प्रभु के बिना जयपुर सूना है। हमारे महलों में दीप जलते हैं पर उनमें रोशनी नहीं है। आप गोसाइयों से विनती कीजिए, जरूरत पड़े तो उनके पैर पकड़ लीजिए। बस कुछ भी करके राधादामोदर जी को जयपुर वापस ले आइए।” अगले दिन रावल बैरिसाल वृंदावन के लिए रवाना हुए। वृंदावन पहुंचते ही वे गोस्वामी जी से मिलने चल दिए। उन्होंने कहा-रावल को कहने में झिझक हो रही थी। संकोच के भाव में उन्होंने कहना शुरू किया- “जब से राधादामोदर जी जयपुर से गए हैं, शहर वीरान हो गया है। रानी सा की यही अरजी है कि ठाकुर जी फिर से अपनी हवेली में विराजें।”“रावल जी, जब ठाकुर जी ने वृंदावन छोड़ा था, तब हालात कुछ और थे। अब तो सब शांति है और फिर भगवान राजाज्ञा से नहीं भक्ति के वशीभूत होकर कहीं भी आते-जाते हैं।”“ये राजाज्ञा नहीं अरजी है महाराज। मैं जिद विनती लेकर आया हूं। जैसे बच्चा अपनी मां की गोद से उतरकर बेचैन हो जाता है, वैसे जयपुर भी प्रभु के बिना छटपटा रहा है।” गोस्वामी कुछ न बोले। रावल जी खाली हाथ जयपुर लौट आए। रानी को इसका अंदेशा था। कुछ समय बाद उन्होंने फिर से रावल बैरीसाल को वृंदावन भेजा। रावल फिर से खाली हाथ लौट आए। यह सिलसिला चार-छह महीनों में दोहराया जाने लगा। इसी दौरान रानी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। सवाई राजा जगह सिंह अचानक चल बसे। रानी गर्भवती थीं। राजपाट की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी पड़ी। रानी ने अब हर महीने दो महीने में रावल जी को वृंदावन भेजना शुरू कर दिया। आखिरकार साल 1821 में राधादामोदर प्रभु फिर से जयपुर पधारे।“जाइए रावल जी, प्रभु को उनके भक्त के धाम पहुंचा दीजिए। जहां उनका नाम गाया जाए, वही वृंदावन है।” इस बार ठाकुर जी भक्त इच्छा से आए और दोबारा हिम्मतराम की हवेली में विराजमान हुए। पूरा जयपुर यूं सजा था मानो जयपुर नरेश का राजतिलक हो। औरंगजेब के दौर में जयपुर आए कई विग्रह आज भी वहीं विराजमान हैं। राधादामोदर जी के पहुंचने से ये क्रम पूरा हुआ। ‘गुलाबी नगरी’ जयपुर की दूसरी पहचान अब ‘गुप्त वृंदावन’ है।मलय गोस्वामी, मुख्य सेवायत- राधादामोदर मंदिर, जयपुर। आचार्य कृष्णबलराम, सेवायत- राधादामोदर मंदिर, वृंदावन। लक्ष्मी नारायण तिवारी, सचिव- ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, वृंदावन। ब्रज विभव: संपादक गोपाल प्रसाद व्यास। मथुरा-वृंदावन के वृहद हिंदू मंदिर: डॉ चंचल गोस्वामी। द कंट्रीब्यूशन ऑफ मेजर हिंदू टेंपल्स ऑफ मथुरा एंड वृंदावन: डॉ चंचल गोस्वामी। औरंगजेबनामा: संपादक डॉ अशोक कुमार सिंह। ब्रज के धर्म संप्रदायों का इतिहास: प्रभुदयाल मीतल। सनातन के संरक्षण में कछवाहों का योगदान: डॉ सुभाष शर्मा-जितेंद्र शेखावत। जयपुर इतिहास के जानकार- जितेंद्र शेखावत, संतोष शर्मा, प्रो देवेंद्र भगत । गोपीनाथ जी के वृंदावन से जयपुर पहुंचने तक की पूरी कहानी क्रमवार ढंग से किसी एक किताब में नहीं मिलती। भास्कर टीम ने कई दस्तावेजों और इतिहास के जानकारों से बात करने के बाद सभी कड़ियों को जोड़कर यह स्टोरी लिखी है। फिर भी घटनाओं के क्रम में कुछ अंतर हो सकता है। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी ली गई है।झारखंड में मौसम रहेगा शुष्क, सुबह में छाएगा कोहराठंड और प्रदूषण ने सांस के मरीजों की बढ़ी मुश्किलेंउत्तराखंड के मैदानी इलाकों में कोहरापचमढ़ी से भी ज्यादा ठंडा हुआ नर्मदापुरमहिमाचल में रात के तापमान में भारी गिरावट

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राधादामोदर वृंदावन जयपुर औरंगजेब मुगल काल

 

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