'NDA एग्जाम पास किया-एकेडमी पहुंचे, एक चोट से सब बर्बाद': सेना से बाहर हुए दिव्यांग कैडेट्स बोले- कम से कम ...

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'NDA एग्जाम पास किया-एकेडमी पहुंचे, एक चोट से सब बर्बाद': सेना से बाहर हुए दिव्यांग कैडेट्स बोले- कम से कम ...
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Boarded Out Ex-servicemen Disability Pension Issue; What Are The Problems Faced By Ashish Yashmet.

सेना से बाहर हुए दिव्यांग कैडेट्स बोले- कम से कम एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिले‘पिता आर्मी मैन थे। मैंने भी बचपन से फौज में जाने का सपना देखा। 2022 में NDA में सिलेक्शन हो गया। खड़कवासला एकेडमी में ट्रेनिंग शुरू हुई, लेकिन इसी दौरान कंधे में चोट लग गई। पुणे के आर्मी हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ। पता चला कि अब फौज में नहीं जा सकता। आरमथुरा के रहने वाले आशीष शर्मा खुद को फौजी मान चुके थे। बोर्ड आउट किए जाने के बाद उनका सेना में नौकरी का सपना टूटा और वो डिप्रेशन में चले गए। उन्हें सामान्य जिंदगी में लौटने में करीब एक साल लग गया। अब आशीष दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर रहे हैं। साथ ही UPSC की तैयारी भी। हालांकि, ये अकेले आशीष की कहानी नहीं है। 1985 से अब तक करीब 500 कैडेट्स बोर्ड आउट हुए हैं। ऑफिशियल डेटा के मुताबिक, पिछले 5 सालों में सिर्फ NDA से 20 कैडेट्स मेडिकल रीजन के चलते बोर्ड आउट किए गए। इनका सिर्फ फौजी बनने का सपना ही नहीं टूटा; इन्हें न कोई री सेटलमेंट फैसिलिटी मिली, न ही एक्स-सर्विसमैन का दर्जा। 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इन एक्ट कैडेट्स के केस पर खुद संज्ञान लिया। कोर्ट ने केंद्र और सेना प्रमुखों को नोटिस जारी कैडेट्स के लिए बीमा और नौकरी पर जवाब मांगा। इसके बाद 30 अगस्त को रक्षा मंत्रालय ने एक अहम फैसले को मंजूरी दी। जिसके तहत अब एक्‍स कैडेट्स को भी एक्‍स सर्विसमैन की तरह मुफ्त इलाज की सुविधा मिलेगी। हालांकि, एक्स-कैडेट्स की मांगें और भी हैं, जिसे लेकर वे लगातार आवाज उठा रहे हैं। दैनिक भास्कर की टीम ने कुछ एक्स कैडेट्स से बात कर उनकी मांगें जानीं और लाइफ का स्ट्रगल समझा।सबसे पहले हम UP के मथुरा में रहने वाले आशीष शर्मा से मिले। पिता फौजी थे, तो बचपन से फौजियों की कहानियां सुनाते और उनके वीडियो दिखाते थे। आशीष ने भी फौज में जाने का मन बना लिया। आशीष ने 2020 में 12वीं की पढ़ाई करते हुए NDA की तैयारी शुरू की। चौथे अटैंप्ट में सिलेक्शन भी हो गया। आशीष बताते हैं, ‘मैं बहुत खुश था। ट्रेनिंग के लिए एकेडमी गया, वहां जिंदगी बिल्कुल अलग थी। सुबह की ड्रिल, एक्सरसाइस, स्विमिंग, हॉर्स राइडिंग, क्रॉस-कंट्री रेस, रनिंग और हर तरह की वो एक्टिविटी कराई जाती, जो एक कैडेट के लिए जरूरी है। इन सबसे साथ कुछ समय ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी होती थी। यहां बहुत मजा आ रहा था।' स्विमिंग सीखने के दौरान ही आशीष को चोट लगी। वे बताते हैं, 'मैं दूसरे टर्म में था। हमें स्क्वाड्रन जंप सिखाई जा रही थी। 10 मीटर की ऊंचाई से स्विमिंग पूल में कूदना था। इसी दौरान मेरा कंधा डिस्लोकेट हो गया। उस वक्त मौके पर मौजूद ट्रेनर ने कंधे सही कर दिए। हालांकि, कुछ दिन बाद ही मुझे हाथ में फिर जर्क लगने लगे।' ‘कंधा फिर डिस्लोकेट हो गया। टिशू में टीयर था। अक्टूबर 2023 में पुणे के आर्मी हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ। इसके बाद पता चला कि मैं आर्मी जॉइन करने के लिए 10.

3% दिव्यांग हूं। मुझे बोर्ड आउट कर दिया गया, जिसका मतलब था कि अब मैं इस सर्विस का हिस्सा नहीं हूं। मैं अब आर्मी, नेवी और एयरफोर्स किसी का भी एग्जाम नहीं दे सकता।‘इंजरी के बाद कुछ वक्त तक आशीष एकेडमी में ही रहे। वे भावुक होकर बताते हैं, 'मैं जब दूसरे कैडेट्स को ट्रेनिंग करते देखता तो बहुत दुख होता था। मैं भी वो सब करना चाहता था, लेकिन नहीं कर पा रहा था। वहां रहते हुए मैं 70 से 80% रिकवर भी हो गया था। अगर एकेडमी मुझे समय देती तो मैं पूरी तरह रिकवर हो जाता, लेकिन मुझे बोर्ड आउट कर दिया गया।' ‘फरवरी 2024 को मैंने एकेडमी छोड़ी। इसके बाद दिव्यांगता के हिसाब से मुझे एक्स-ग्रेशिया दिया गया। इसके अलावा कुछ नहीं मिला। इन सबके बाद मैं अंदर से बिल्कुल टूट चुका था। मैं डिप्रेशन में चला गया और मुझे एंग्जाइटी अटैक आने लगे। मैंने पहले ऐसा कभी महसूस ही नहीं किया था। आर्मी अफसर न बन पाने का गम अब शायद मेरे साथ ही दुनिया से जाएगा।' मां के साथ हुए एक किस्से का जिक्र करते हुए आशीष बताते हैं, 'मैं घर पर था। मेरे मोहल्ले में कोई लेफ्टिनेंट बनकर आया था। मोहल्ले वालों ने उसके लिए जुलूस निकाला था। उसे देखकर मेरी मां बहुत रोई थीं। मेरे लिए ये सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया था।'हरियाणा के झज्जर के रहने वाले यश्मित का 2021 में NDA में सिलेक्शन हुआ। दो साल बाद ही बोर्ड आउट भी कर दिया गया। अभी वो दिल्ली में रहकर BSc की पढ़ाई और UPSC की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर वे देश सेवा नहीं कर सके तो प्रोफेसर बनकर बच्चों को दिशा देने का काम करना चाहते हैं। यश्मित अपने NDA के सफर के बारे में बताते हैं, 'परिवार में कोई भी आर्मी से नहीं। फिर भी मुझे फौजी की यूनिफॉर्म बहुत आकर्षित करती थी। पापा टीचर हैं, लेकिन मैं तय कर लिया था कि आर्मी में ही जाऊंगा। 12वीं के तुरंत बाद मेरा सिलेक्शन हो गया। ट्रेनिंग के लिए पुणे एकेडमी पहुंचा। ट्रेनिंग टफ थी लेकिन अफसर बनने के लिए जरूरी थी।' यश्मित को दौड़ते वक्त इंजरी हुई थी। वो बताते हैं, 'एक कैडेट को 9.30 मिनट में 2.4 किलोमीटर दौड़ना होता है। मेरी फीमर बोन में दर्द हो रहा था। मैं लगातार पेन किलर ले रहा था। फाइनल टेस्ट के दिन दौड़ लगाते वक्त एक क्रैक की आवाज सुनाई दी। तेज दर्द के साथ मैं ट्रैक पर ही गिर गया।' 'मुझे पुणे के मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। अगले ही दिन ऑपरेशन हुआ, कमर के नीचे डिस्क और स्क्रू डाले गए। 15 दिन अस्पताल में रखा गया फिर रेस्ट के लिए सिरसा भेज दिया गया। जब सिक लीव से लौटा तो मुझे लो-मेडिकल कैटेगरी में रखा गया। मुझे फिजिकल ट्रेनिंग करना मना थी, सिर्फ एकेडमिक में शामिल होना था।' यश्मित कहते हैं कि NDA में सिलेक्शन के बाद लगा था कि देश के लिए कुछ करने का मौका मिल रहा है, लेकिन वो सपना ऐसे बिखर जाएगा, कभी सोचा नहीं था। वे आगे बताते हैं, 'कुछ दिन बाद जब डॉक्टर से मिला तो पता चला कि मुझे परमानेंट-मेडिकल कैटेगरी में रखा जा रहा है। यानी मुझे बोर्ड-आउट किया जा रहा है, क्योंकि मेरी इंजरी आगे बढ़ सकती है। मैं ये सुनकर मायूस हो गया। एकेडमी में मेरी दो साल की मेहनत बेकार हो गई थी।' 'मुझे 40% दिव्यांग घोषित कर दिया गया। ये सब 2023 में ही हुआ, लेकिन तब तक गाइट टु मेडिकल ऑफिसर, यानी GMO 2023 की नई नियमावली नहीं आई थी। इसके आने के बाद मेरी दिव्यांगता 31% कर दी गई। इसकी वजह से मुझे मिलने वाला एक्स-ग्रेशिया भी कम हो गया।'सरकार से क्या चाहते हैं? जवाब में यश्मित कहते हैं, 'सिलेक्शन तक सब बहुत मेहनत करके पहुंचते हैं। ट्रेनिंग के दौरान चोट लगना स्वाभाविक है। इंजरी के बाद आप दोबारा जीरो पर आ जाते हैं।' 'हम UPSC लेवल का एग्जाम पास करके आते हैं, लेकिन हमारे पास कोई डिग्री नहीं होती। ऐसे में हमें री सेटलमेंट फैसिलिटी मिलनी चाहिए। एक्स-ग्रेशिया का अमाउंट कम-से-कम एक लेफ्टिनेंट रैंक की बेसिक सैलरी जितना होना चाहिए। हमें एक्स-सर्विसमैन का भी दर्जा मिलना चाहिए।'हरतेज सिंह ने अप्रैल 2017 में NDA का एग्जाम पास किया था। ट्रेनिंग के दौरान तीसरे महीने में ही इंजरी हो गई। वो बताते हैं, 'मेरे बाएं पैर में स्ट्रेस फ्रैक्चर हुआ था। इसका पता तो चल गया था, लेकिन सिर की चोट का पता नहीं था। मैं ठीक से भाग-दौड़ नहीं पाता था। मैं करीब दो हफ्ते सिक लीव पर रहा।' एकेडमी लौटने के बाद लगातार सिर में दर्द रहने लगा। मैं रोज 25 से 30 किलोमीटर दौड़ रहा था। इसलिए मुझे सब नार्मल लग रहा था। हालांकि, सिर दर्द की शिकायत के बाद मुझे पुणे आर्मी हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां MRI स्कैन में पहली बार पता चला कि मेरे सिर में ब्लड क्लॉट हुआ है और ऑपरेशन करना जरुरी है। मुमकिन है कि ये इंजरी बॉक्सिंग या स्विमिंग के दौरान हुई हो।' वे आगे बताते हैं, 'मुझे दिल्ली में धौला कुआं के आर्मी अस्पताल भेजा गया। वहां जांच के बाद डॉक्टर ने मुझे एडमिट कर लिया। इमरजेंसी में मेरा ऑपरेशन हुआ। मैं एक हफ्ते अस्पताल में रहा। उसके बाद दो महीने सिक-लीव पर। एकेडमी लौटने के बाद मुझे लो मेडिकल कैटेगरी में रखा गया। यानी मैं ज्यादा स्ट्रेंथ वाली एक्सरसाइज नहीं कर सकता था।' 'मेरी हेल्थ बिगड़ने लगी। रिव्यू के लिए पहले MH चेन्नई भेजा गया। वहां कोई न्यूरोसर्जन नहीं था। फिर वहां से MH बैंगलोर भेजा गया। वहां जब कोई खास मदद नहीं मिली तो फिर मैं दिल्ली लौटा। ऐसे ही मैं अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा, लेकिन आराम नहीं मिला। इन सबके बीच मैं एकेडमी से दूर होता गया। आखिरी में मेरा इलाज MH चेन्नई में चलता रहा। पांच महीने बाद मुझे बोर्ड-आउट कर दिया गया।'एकेडमी से बाहर की जिंदगी पर बात करते हुए हरतेज कहते हैं, 'जिंदगी का सबसे कीमती वक्त जा चुका था। साथ के लोग अफसर बन गए थे। मेरे पास उस समय लॉ की डिग्री थी। अगर मैं वकालत शुरू करता तो सेटल होने में तीन-चार साल लग जाते। मैंने LLM की पढ़ाई पूरी कर टीचिंग प्रोफेशन चुना।' वे आगे कहते हैं, 'मेरे सिर में दो प्लेट लगी हैं। अब भी दर्द होता है। मुझे एक्स-ग्रेशिया में 9000 रुपए मिलते हैं। इतने पैसों में किसी की जिंदगी नहीं चलती। सरकार को आर्मी एक्ट में एक अमेंडमेंट करना चाहिए। जिन कैडेट्स को मेडिकल ग्राउंड पर बोर्ड आउट किया गया, उन्हें एक्स सर्विसमैन का दर्जा मिलना चाहिए, ताकि ज्यादा बेनिफिट मिल सकें।' 'UPSC एग्जाम पास करने वाले IAS, IPS बनते हैं। वो ट्रेनिंग के दौरान अगर घायल होते हैं, तो उनकी नौकरी नहीं जाती। हमारी ट्रेनिंग रिस्की है और इस दौरान इंजरी सामान्य है। सीरियस इंजरी से कई बार मौत भी हो जाती है। सरकार को हमारे जैसे कैडेट के लिए री सेटेलमेंट स्कीम बनानी चाहिए। हमें नौकरियों में प्रेफरेंस मिलना चाहिए। जो लोग बिल्कुल दिव्यांग हैं, सरकार को उनका खर्च भी उठाना चाहिए।'राजस्थान के कोटा की रहने वाली अनुयाया BSc करने के साथ NCC में शामिल हो गईं। इसके बाद उन्होंने आर्मी में जाने का मन बनाया, लेकिन एक इंजरी के चलते सफर पूरा नहीं हो सका। अनुयाया बताती हैं, 'BSc करते वक्त मुझे CDS के बारे में पता चला। सेकेंड अटेंप्ट में एग्जाम पास कर लिया। अक्टूबर 2009 में ट्रेनिंग जॉइन की। ये फिजिकल से ज्यादा मेंटल ट्रेनिंग थी।' 'लड़कों की तरह लड़कियों के लिए भी 11 महीने की सख्त ट्रेनिंग होती है। थकने का भी समय नहीं मिलता। मेरा रनिंग का टेस्ट था। उस दौरान मुझे पैर में स्ट्रेस फ्रैक्चर हुआ। मुझे कुछ दिनों के लिए फिजिकल ट्रेनिंग करने से मना कर दिया गया, ताकि मेरी चोट ठीक हो जाए। मैंने फिर से 2.4 किलोमीटर रनिंग का टेस्ट दिया। आखिरी 100 मीटर में हमें तेज भागना होता है। जैसे ही मैंने पैर जमीन पर रखा मुझे कुछ टूटने की तेज आवाज आई। मैं वहीं गिर गई। 'चेक-आप के बाद मुझे चेन्नई मेडिकल हॉस्पिटल भेजा गया। वहां पता चला कि फ्रैक्चर है और तुरंत सर्जरी करनी पड़ेगी। बैंगलोर एमएल में मेरा इलाज हुआ। उसके बाद सिक लीव पर रही। फिर दिल्ली एमएल में मेरा छह महीने इलाज चला। मेरी बोन में इंप्लांट डाला गया। तीन सर्जरी भी हुई। मुझे सामान्य रूप से चलने में डेढ़ साल लग गए। मुझे डर लगता था कि मैं कभी अपने पैरों पर चल भी पाऊंगी या नहीं।' वे आगे बताती हैं, 'हमारी दो टर्म में ट्रेनिंग होती है। मैंने 5 महीने का पहला टर्म पूरा कर लिया था। बैंगलोर एमएल में इलाज के दौरान पता चला कि मुझे होल्ड पर रखा है। मुझे दूसरा टर्म रिपीट करना होगा। फिर दिल्ली में इलाज के दौरान पता चला कि इंजरी ठीक नहीं हो रही है, इसलिए मुझे बोर्ड आउट कर दिया गया। पापा मेरे साथ थे। मैंने उन्हें पहली बार रोते देखा। 'मैं सिर्फ 22 साल की थी। उन्होंने मेरे लिए बहुत संघर्ष किया। सब मना करते थे कि लड़की को फौज में क्यों भेज रहे हो लेकिन पापा ने हमेशा मेरे लिए स्टैंड लिया। ये मेरे लिए बहुत इमोशनल टाइम था।' सरकार से अपील करते हुए अनाया कहती हैं, 'मुझे 40% दिव्यांग बताया गया। सामान्य जीवन में ऐसे दिव्यांगों को सरकारी सुविधाएं और आरक्षण मिलता है, लेकिन कैडेट्स को किसी भी सरकारी एग्जाम या सुविधाओं के लिए दिव्यांग नहीं माना जाता। हम ओपन कैटेगरी में ही एग्जाम देते हैं। इसलिए हमें एक्स-सर्विसमैन का पूरा दर्जा मिलना चाहिए। हमें आर्मी में कहीं एडजस्ट करना चाहिए।'‘हमारा परिवार बंगाल से दिल्ली काम करने के लिए आया, लेकिन यहां हमें परेशान किया जा रहा है। हम बंगाली बोलते हैं और मुस्लिम भी हैं। भाषा और धर्म के आधार पर हमें टारगेट किया जा रहा है। हमें बांग्लादेशी बताकर बेदखल क्यों किया जा रहा है। हम तो अपने देश में ही सुरक्षित नहीं हैं।‘ अमानुर शेख पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से 20 साल पहले दिल्ली आ गए थे। अचानक बदले माहौल से परेशान हैं।झज्जर में स्कूल-आंगनबाड़ी केंद्रों में 2 दिन छुट्‌टीतेज बारिश से नदियां उफनी, टीकमगढ़ में 20 लोगों फंसेगाजियाबाद में मार्च के बाद पहली बार तापमान 29 डिग्री

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