'राम-रहीम' को SIR में फंसाने वाला कौन, ममता बनर्जी से क्या कनेक्शन, बंगाल में होगा ध्रुवीकरण?

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'राम-रहीम' को SIR में फंसाने वाला कौन, ममता बनर्जी से क्या कनेक्शन, बंगाल में होगा ध्रुवीकरण?
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Madan Mitra Ram Controversy: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के बीच TMC नेता मदन मित्रा के 'राम-रहीम' बयान ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है. बीजेपी ने इसे हिंदू विरोधी करार दिया है. ममता बनर्जी की चुप्पी सवालों के घेरे में है. यह विवाद बंगाल की राजनीति में नए धार्मिक ध्रुवीकरण की आहट दे रहा है.

Madan Mitra Ram Controversy: पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया चल रही है. लेकिन मतदाता सूची के तकनीकी पुनरीक्षण से ज्यादा चर्चा एक सियासी बयान की हो रही है. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मित्रा के ‘राम और रहीम’ वाले बयान ने सियासत को धार्मिक मोड़ पर ला खड़ा किया है.

सवाल सिर्फ बयान का नहीं है. सवाल इसके पीछे की सोच का है. और सवाल इस बात का भी है कि क्या यह सब पार्टी की सहमति से हो रहा है. उका यह बयान अचानक नहीं आया. यह बयान उस समय आया, जब पश्चिम बंगाल में चुनावी तापमान बढ़ रहा है. जब SIR को लेकर पहले से राजनीतिक तनाव है. और जब धार्मिक पहचान सबसे संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है. ऐसे में मदन मित्रा का बयान आग में घी का काम करता दिख रहा है. मदन मित्रा कौन हैं? मदन मित्रा पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अनुभवी विधायक हैं. वे कोलकाता के कमरहाटी विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक चुने जा चुके हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते हैं. पार्टी के शुरुआती दिनों से ही वे TMC की आक्रामक राजनीतिक लाइन का चेहरा रहे हैं. मदन मित्रा पार्टी के प्रमुख प्रवक्ताओं में शामिल रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी बेहद सक्रिय रहते हैं, जहां वे बेबाक अंदाज में अपनी बात रखते हैं. पढ़ें- किसने बताया श्रीराम का धर्म? ममता के विधायक को राम मुस्लिम लगते हैं! अपनी साफगोई और विवादास्पद बयानों के कारण मदन मित्रा अक्सर सुर्खियों में रहते हैं. राजनीतिक करियर से पहले वे एक सफल व्यवसायी रहे हैं. साल 2011 में वाम शासन के खिलाफ ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन में उनकी भूमिका को अहम माना जाता है. हालांकि उनका राजनीतिक सफर विवादों से भी अछूता नहीं रहा है. साल 2016 में उन पर कथित तौर पर सरकारी फंड के दुरुपयोग से जुड़े आरोप लगे थे, जिस पर मामला अभी अदालत में विचाराधीन है. मदन मित्रा अक्सर बीजेपी और अन्य विपक्षी दलों पर तीखे और आक्रामक हमले करते रहे हैं. हाल ही में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर दिया गया उनका ‘राम-रहीम’ वाला बयान भी इसी कड़ी में बड़ा विवाद बन गया. ममता बनर्जी के करीबी होने के कारण उनके हर बयान को पार्टी की आधिकारिक सोच से जोड़कर देखा जाता है. इससे कई बार TMC की छवि पर भी सीधा असर पड़ता है. कुल मिलाकर मदन मित्रा को TMC की मुखर, आक्रामक और विवादों में रहने वाली राजनीति का प्रमुख चेहरा माना जाता है. SIR के बीच TMC नेता मदन मित्रा के ‘राम-रहीम’ बयान से पश्चिम बंगाल की राजनीति गरमा गई है. मदन मित्रा का वह बयान जिसने आग लगा दी मदन मित्रा ने कहा कि SIR में ‘राम को नहीं, रहीम को ढूंढा जाता है.’ यही एक लाइन पूरे विवाद की जड़ बन गई. बयान को बीजेपी ने सीधे तौर पर हिंदू विरोधी बताया. सोशल मीडिया पर इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला करार दिया गया. बयान ने SIR को प्रशासनिक प्रक्रिया से हटाकर धार्मिक बहस में बदल दिया. हालांकि वायरल वीडियो पर मदन मित्रा ने सफाई देते बुए कहा ‘वीडियो पूरी तरह से एडिटेड, AI-जनरेटेड और मनगढ़ंत है.’ बीजेपी का हमला: TMC पर हिंदू विरोधी राजनीति का आरोप बीजेपी ने बयान को हाथों-हाथ लिया. अमित मालवीय ने TMC को हिंदू विरोधी करार दिया. शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी की चुप्पी पर सवाल उठाया. पार्टी ने कहा कि यह बयान TMC की असली सोच दिखाता है. बीजेपी इसे बंगाल में बड़े मुद्दे के तौर पर पेश कर रही है. ममता बनर्जी की चुप्पी क्यों बन रही है सवाल? सबसे बड़ा सवाल यही है कि ममता बनर्जी अब तक चुप क्यों हैं. मदन मित्रा उनके करीबी माने जाते हैं. वे पार्टी के वरिष्ठ विधायक हैं. पहले भी विवादित बयान दे चुके हैं. लेकिन इस बार मामला सीधे धार्मिक पहचान से जुड़ा है. ऐसे में चुप्पी को सहमति के तौर पर देखा जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR का विरोध अब प्रशासनिक तर्क से हटकर भावनात्मक और धार्मिक रंग ले रहा है. ‘राम-रहीम’ वाला बयान उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. इससे एक खास वोट बैंक को संदेश देने की कोशिश दिखती है. क्या बंगाल में धार्मिक ध्रुवीकरण तय है? बयान चुनावी माहौल में आया. SIR पहले से विवादित मुद्दा है. ममता बनर्जी की चुप्पी संदेह बढ़ा रही है. बीजेपी इसे बड़ा चुनावी हथियार बना रही है. इन चार कारणों से साफ है कि यह विवाद आगे और बढ़ सकता है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह सिर्फ एक बयान नहीं है. यह आने वाले चुनावों की दिशा तय कर सकता है. SIR की प्रक्रिया जारी है, लेकिन उससे जुड़ा विवाद अब राजनीतिक और धार्मिक शक्ल ले चुका है. SIR क्या है और क्यों है विवाद में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण होता है. इसका मकसद फर्जी, डुप्लीकेट और गलत नामों को हटाना होता है. चुनाव आयोग इसे नियमित प्रक्रिया बताता है. लेकिन TMC का आरोप है कि SIR के जरिए चुनिंदा समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है. यही वजह है कि पार्टी शुरू से इसका विरोध कर रही है.

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