'ये बुक पर प्रतिबंध नहीं, दहशत फैलाने की साजिश': 25 किताबें क्यों बैन, राइटर्स बोले- कश्मीर की हकीकत सामने ...

Jammu Kashmir Book Ban News

'ये बुक पर प्रतिबंध नहीं, दहशत फैलाने की साजिश': 25 किताबें क्यों बैन, राइटर्स बोले- कश्मीर की हकीकत सामने ...
Why Book BannedRundhati RoyNoorani
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Jammu Kashmir Book Banned Controversy; Follow Arundhati Roy Azadi, AG.

25 किताबें क्यों बैन, राइटर्स बोले- कश्मीर की हकीकत सामने आने से डर रही सरकार'अंग्रेजों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की किताब 'द इंडियन स्ट्रगल' भारत में बैन की थी। उसमें ब्रिटिश सरकार की आलोचना थी। आज 90 साल बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने मेरी किताब बैन की है। हमें लोकतांत्रिक देश में सरकार की नीतियों की आलोचना करने का हक है, लेकिनजम्मू-कश्मीर सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पोते सुमंत्र बोस की दो किताबों पर बैन लगाया है। इनमें से एक किताब को पब्लिश हुए 18 साल बीत चुके हैं। सुमंत्र अकेले राइटर नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार ने 5 अगस्त को 25 किताबों पर बैन लगाया है। इनमें बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की 'आजादी' समेत कई मशहूर किताबें हैं। सरकार का तर्क है कि ये किताबें आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं। ये कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती हैं। अब इन किताबों का पब्लिकेशन, बिक्री और डिस्ट्रीब्यूशन जम्मू-कश्मीर में गैरकानूनी होगा। इस आदेश के बाद पुलिस ने यहां के बुक स्टोर्स में रेड डाली और बैन की गईं किताबें जब्त कर लीं। वहीं, राइटर्स का कहना है कि ये सिर्फ बुक पर प्रतिबंध नहीं है, इसके जरिए सरकार दहशत पैदा करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि कश्मीर की हकीकत सामने आए, इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार के किताबों को बैन करने के आदेश के बाद श्रीनगर में पुलिस ने कई बुक स्टोर्स पर रेड डाली और प्रतिबंधित किताबें जब्त कीं। दैनिक भास्कर ने बैन की गई किताबों में से कुछ के राइटर्स से बात कर समझने की कोशिश की कि किताबों में ऐसा क्या है, जो इन पर बैन लगाना पड़ा। साथ ही इस आदेश के बाद जम्मू-कश्मीर के बुक स्टोर्स का हाल भी जाना।इस बैन को लेकर सबसे पहले हम जम्मू-कश्मीर के बुक स्टोर्स का हाल जानने पहुंचे। श्रीनगर में हमने कुछ दुकानदारों से बात करने की कोशिश की, लेकिन डर के कारण वे कैमरे पर आने को राजी नहीं हुए। एक दुकानदार ने ऑफ द कैमरा हमें बताया, जिन किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया है, वो सभी किताबें यहां काफी लोकप्रिय हैं। खासकर अरुंधति रॉय की किताब 'आजादी' बहुत बिकती थी। 'जैसे ही सरकार का आदेश आया, हमने अपनी दुकानों से इन सभी किताबों का बचा स्टॉक निकाल दिया। हमें डर है कि अगर पुलिस को एक भी किताब मिली तो हमें सजा हो सकती है। जो हुआ वो गलत है, लेकिन हमें इस बारे में बात करने से भी मना किया गया है।'बुक पर बैन पहली बार नहीं, ये कश्मीर की हकीकत छिपाने की साजिश सबसे पहले हमने राइटर अथर जिया से बात की। उनकी बुक 'रेजिस्टिंग डिसअपीयरेंस' बैन की गई 25 किताबों में शामिल हैं। इसमें उन्होंने कश्मीर में एसोसिएशन ऑफ द पेरेंट्स ऑफ डिसअपीयर्ड पर्सन के साथ 10 साल की अपनी स्टडी लिखी है। ये ऐसी महिलाओं की जिंदगी और संघर्ष को दर्ज कराती है, जिनके पति-बेटे लापता हो गए या कर दिए गए। ये किताब जम्मू-कश्मीर में पुरुषों की संदिग्ध गुमशुदगी के मामलों को चुनौती देती है। किताब पर लगे बैन को लेकर अथर कहती हैं, 'साहित्य पर ये बैन कोई पहली बार नहीं लगा है। कश्मीर में कई सालों से बुक शॉप्स पर रेड पड़ती रही है। इस साल की शुरुआत में अघा शाहिद अली और बशरत पीर की किताबें कश्मीर यूनिवर्सिटी के सिलेबस से हटा दी गईं। इसके बाद जमात-ए-इस्लामी का लिटरेचर और उर्दू किताबों पर रेड पड़ी।' 'कश्मीर में बुक बैन को उन सभी चीजों के साथ जोड़कर देखना होगा, जो आज वहां घट रहा है। ये सिर्फ उसका एक हिस्सा हैं। मेरी किताब में कश्मीर की जमीनी हकीकत है। बल्कि सभी बैन की गई किताबों में कश्मीर का डिस्प्यूट, वहां के लोग क्या चाहते हैं, उनका जज्बा और कश्मीर के इतिहास पर बात हुई है।' 'मेरी किताब में APDP के साथ रही एक्टिविस्ट महिलाओं की कहानियां हैं। कश्मीरियों के साथ अन्याय की हकीकत पर बात हुई है। हर राइटर ने ऐसी ही बातें लिखी हैं। कश्मीर में सिर्फ किताबों पर बैन नहीं हुआ है। पत्रकारों पर बैन है। मीडिया कश्मीर में अपनी मर्जी से रिपोर्ट नहीं कर सकती। वहां लोग खुलकर बात नहीं कर सकते।' '2014 से पहले भी ऐसा ही होता आया है। उसके बाद से ये सब बढ़ गया है। कश्मीर में लोगों की आवाज को आजादी के वक्त से ही दबाया जा रहा है। सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होना और अब धार्मिक आजादी भी खत्म होती जा रही है।'क्या आर्टिकल-370 के हटने के बाद से इस तरह के बैन ज्यादा हो गए हैं। इसके जवाब में अथर कहती हैं, 'अब जो भी फैसले हो रहे हैं, वो दिल्ली में लिए जाते हैं और कश्मीर में लागू कर दिए जाते हैं। आर्टिकल- 370 से पहले कश्मीर में पब्लिक सेफ्टी एक्ट और प्रशासनिक हिरासत का गलत इस्तेमाल हुआ।' अथर का मानना है कि किताबों पर बैन लगाने से इन्हें पढ़ने का क्रेज बढ़ेगा। वे कहती हैं, ‘आज के वक्त में किताबों पर बैन लगाना बड़ी बात नहीं है। वैसे भी अब सब ऑनलाइन मिल जाती हैं। इसलिए लोग वहां भी पढ़ सकते हैं।‘ वो कहती हैं, ‘किताबों पर बैन सिर्फ इसलिए लगाया जा रहा है, जिससे खौफ पैदा हो। मतलब कि अगर आपके पास मेरी किताब है तो आपके घर पुलिस जा सकती है। रेड डाल सकती है। ये सब खौफ और दहशत फैलाने के लिए किया गया है।'अनुराधा भसीन की किताब 'ए डिस्मेंटल्ड स्टेट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370' को भी बैन किया गया है। इस बैन के मायने समझने के लिए हमने अनुराधा से भी बात की। वो कहती हैं, ‘जम्मू-कश्मीर में जितनी भी किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वो सभी नामी पब्लिशर्स की हैं। पब्लिशर भी किताब लिखे जाने के बाद कई बार उसे क्रॉसचेक करते हैं। कई लेवल पर किताब के कंटेट, फैक्ट्स और डेटा की जांच की जाती है। जब पब्लिशर और राइटर दोनों बुक के कंटेंट से संतुष्ट हो जाते हैं, तभी किताब छपती है।‘‘2019 में जब आर्टिकल-370 हटाया गया। उसके बाद 2019 से 2021 तक मैं कश्मीर में ही रही। मैंने वहां फील्ड पर जो काम किया, पब्लिक डोमेन में जो बातें देखीं और सुनी, उन सबको एनालाइज करके किताब लिखी। ‘आर्टिकल-370 हटने के बाद सरकार के किए दावों में कितना सच है। ग्राउंड पर हकीकत क्या है। इसका यहां की जनता पर क्या असर हुआ है, किताब में इसी बारे में बताया गया। ये सब सरकार के प्रति आलोचनात्मक रहा है। शायद यही बात सरकार को पसंद नहीं आई। इसलिए बैन जैसा कदम उठाया गया।‘ वे आगे कहती हैं, ‘एक तरफ सरकार कहती है कि उसने 2019 के बाद कश्मीर से आतंकवाद खत्म कर दिया। दूसरी तरफ कह रही है कि किताबें आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा दे रही हैं। सरकार बताए कि मेरी किताब का आतंक से क्या लेना-देना है? 'अनुराधा आगे कहती हैं, 'कश्मीर में अस्थिरता से जुड़ा इतिहास 70 साल से भी ज्यादा पुराना है। अगर आप यहां की बारीकियां नहीं समझेंगे तो इसके बिना कोई हल नहीं निकल सकता। यहां ग्राउंड पर क्या हो रहा है, लोगों की क्या समस्याएं हैं, इसका पाकिस्तान से कैसे जुड़ाव है, इस मुद्दे की कई सामजिक और राजनीतिक परतें हैं। पहले इसे समझना जरूरी है। यहां जोर- जबरदस्ती, मिलिट्री और पाबंदियां लगाने से किसी का भला नहीं होगा।' 'पहलगाम में जो कुछ हुआ, वो एक वॉर्निंग सिग्नल है कि कश्मीर में कुछ गलत हो रहा है और सरकार उस पर ध्यान नहीं दे रही। पहले सरकार ने कश्मीर में मीडिया की आजादी खत्म कर दी, ताकि कश्मीर में जो कुछ रोजाना घट रहा है, उसकी खबर बाकी देश को न मिल सके। अब सरकार अपनी आलोचना के हर निशान मिटा देना चाहती है। जो सरकार की बात से सहमत नहीं, उसे ऐसे ही बेदखल किया जा रहा है।' 'मेरी किताब में क्या गलत लिखा है, सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। मैं चाहती हूं प्रशासन के लोग मेरी किताब में एक भी शब्द ऐसा ढूंढकर बताएं, जो आतंकवाद और अलगाववाद का समर्थन करता हो, क्योंकि मेरी किताब में ऐसा कुछ है ही नहीं।'नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पोते राइटर सुमंत्र बोस की भी दो किताबों पर बैन लगाया गया है। वो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर हैं। वो पॉलिटिकल साइंस और इंटरनेशनल रिलेशंस के एक्सपर्ट माने जाते हैं। उनकी पहली किताब 'कंटेस्टेड लैंड’ एक कम्पैरिजन स्टडी पर आधारित है। ये उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां जातीय-राष्ट्रीय संघर्ष काफी ज्यादा गहरा गए हैं, जैसे-कश्मीर, इजराइल-फिलिस्तीन, बोस्निया, साइप्रस और श्रीलंका। इस किताब का मुख्य मकसद ये समझना है कि इन विवादित इलाकों में स्थायी तौर पर शांति कैसे लाई जा सकती है। बैन को लेकर सुमंत्र बोस कहते हैं, 'मेरी दो किताबें बैन की गई हैं। पहली किताब 'द कंटेस्टेड लैंड' 2007 में पब्लिश हुई थी। उसे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने पब्लिश किया था। ये दुनिया का सबसे बड़ा पब्लिशिंग हाउस है। इस किताब को पब्लिश हुए 18 साल बीत चुके हैं।' 'इसमें कश्मीर के अलावा दुनियाभर के कॉन्फ्लिक्ट जोन के बारे में लिखा गया है। इसमें इजराइल-फिलिस्तीन, कश्मीर, श्रीलंका, साइप्रस और बोस्निया के बारे में लिखा है। किताब का मकसद था कि कैसे संघर्ष में जूझ रहे इन क्षेत्रों में शांति कायम की जा सकती है। इसमें कश्मीर तो सिर्फ एक हिस्सा है।' 'मैंने इसमें कश्मीर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष का एसेसमेंट किया। मैं गांधीवादी नहीं हूं, लेकिन शांति चाहता हूं। लिहाजा अपनी किताब में मैंने शांति स्थापित करने और बनाए रखने की चुनौती के बारे में भी बात की है। मेरा मकसद ही यही है कि सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बल्कि इन सभी जगहों के लिए किस तरह शांतिपूर्ण समाधान खोजा जा सकता है।'आर्टिकल-370 को लेकर सरकार को आलोचना नहीं पसंद आई सुमंत्र बोस की दूसरी किताब 'कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स' पर भी बैन लगाया गया है। किताब कश्मीर विवाद की गहराइयों में जाकर उसका ऐतिहासिक, पॉलिटिकल और सोशल एनालिसिस करती है। वे बताते हैं, ‘कश्मीर का संकट सिर्फ 1947 के बंटवारे के बाद का मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज्यादा पुराना और जटिल है। किताब में कश्मीर की रियासत के भारत में विलय, 1947-48 की जंग, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और उसके बाद के दशकों की राजनीति को डिटेल में समझाया गया है।‘ ‘इस किताब में कश्मीर के आम लोगों की तकलीफ, नाराजगी और राजनीतिक आकांक्षाओं को जगह दी है। किताब में आजादी की मांग, पाकिस्तान के साथ रिश्ते और भारतीय लोकतंत्र से मोहभंग तक सबका जिक्र है। ये किताब 2021 में पब्लिश हुई थी। इसमें भी मैंने इसी बारे में लिखा है कि कैसे हिंसा, मिलिटेंसी और संघर्ष खत्म हो सकता है।' बैन की वजह पर बात करते हुए सुमंत्र कहते हैं, 'अगस्त 2019 में आर्टिकल-370 के बाद जम्मू कश्मीर में बहुत दिनों तक इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क बंद कर दिया गया। करीब सैकड़ों लोगों को उनके घर से उठाकर ले जाया गया। राजनीतिक आवाजें दबाई गईं। मीडिया को लिखने-बोलने की आजादी नहीं दी गई। इसके कारण डर पैदा हो गया, जो एक लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए।' 'मेरी किताब कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स में आर्टिकल- 370 के बाद कश्मीर की स्थिति को लेकर सरकार की आलोचना भी है। एक राइटर होने के नाते ये मेरा अधिकार है कि मैं जमीन पर जो देखता हूं, उसे लिखूं। चाहे वो सरकार की आलोचना ही क्यों न हो। शायद सरकार को यही पसंद नहीं आया।'सुमंत्र बैन को लेकर आगे कहते हैं, 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस की किताब 'द इंडियन स्ट्रगल' को भारत में अंग्रेजों ने बैन किया था। उन्होंने किताब में ब्रिटिश सरकार की आलोचना की थी। आज 90 साल बाद मेरी किताब बैन की गई। हालांकि, मैं इस प्रतिबंध को गौरव की तरह देखता हूं।' वे आगे कहते हैं, 'किताबों पर बैन लगाना सेंसरशिप का सबसे क्रूर रूप है। ऑटोक्रेसी में लोगों की आवाज दबाने का काम किया जाता है। भारत ऐसा राष्ट्र नहीं था और यहां ऐसा होना भी नहीं चाहिए। आज जम्मू-कश्मीर में किताबों पर बैन लगाया जा रहा है। कल पूरे देश में ऐसा होने लगेगा। लोगों को इसका विरोध करना चाहिए।’‘हमारा परिवार बंगाल से दिल्ली काम करने के लिए आया, लेकिन यहां हमें परेशान किया जा रहा है। हम बंगाली बोलते हैं और मुस्लिम भी हैं। भाषा और धर्म के आधार पर हमें टारगेट किया जा रहा है। हमें बांग्लादेशी बताकर बेदखल क्यों किया जा रहा है। हम तो अपने देश में ही सुरक्षित नहीं हैं।‘ अमानुर शेख पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से 20 साल पहले दिल्ली आ गए थे। अचानक बदले माहौल से परेशान हैं।वाराणसी में रातभर हुई झमाझम बारिशमेरठ में आज सुबह से हल्की धूप निकली हैलखनऊ में 3 दिन तेज बारिश का अलर्टवाराणसी में बारिश के बीच एनकाउंटर.

25 किताबें क्यों बैन, राइटर्स बोले- कश्मीर की हकीकत सामने आने से डर रही सरकार'अंग्रेजों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की किताब 'द इंडियन स्ट्रगल' भारत में बैन की थी। उसमें ब्रिटिश सरकार की आलोचना थी। आज 90 साल बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने मेरी किताब बैन की है। हमें लोकतांत्रिक देश में सरकार की नीतियों की आलोचना करने का हक है, लेकिनजम्मू-कश्मीर सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पोते सुमंत्र बोस की दो किताबों पर बैन लगाया है। इनमें से एक किताब को पब्लिश हुए 18 साल बीत चुके हैं। सुमंत्र अकेले राइटर नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार ने 5 अगस्त को 25 किताबों पर बैन लगाया है। इनमें बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की 'आजादी' समेत कई मशहूर किताबें हैं। सरकार का तर्क है कि ये किताबें आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देती हैं। ये कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती हैं। अब इन किताबों का पब्लिकेशन, बिक्री और डिस्ट्रीब्यूशन जम्मू-कश्मीर में गैरकानूनी होगा। इस आदेश के बाद पुलिस ने यहां के बुक स्टोर्स में रेड डाली और बैन की गईं किताबें जब्त कर लीं। वहीं, राइटर्स का कहना है कि ये सिर्फ बुक पर प्रतिबंध नहीं है, इसके जरिए सरकार दहशत पैदा करना चाहती है। सरकार नहीं चाहती कि कश्मीर की हकीकत सामने आए, इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कर रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार के किताबों को बैन करने के आदेश के बाद श्रीनगर में पुलिस ने कई बुक स्टोर्स पर रेड डाली और प्रतिबंधित किताबें जब्त कीं। दैनिक भास्कर ने बैन की गई किताबों में से कुछ के राइटर्स से बात कर समझने की कोशिश की कि किताबों में ऐसा क्या है, जो इन पर बैन लगाना पड़ा। साथ ही इस आदेश के बाद जम्मू-कश्मीर के बुक स्टोर्स का हाल भी जाना।इस बैन को लेकर सबसे पहले हम जम्मू-कश्मीर के बुक स्टोर्स का हाल जानने पहुंचे। श्रीनगर में हमने कुछ दुकानदारों से बात करने की कोशिश की, लेकिन डर के कारण वे कैमरे पर आने को राजी नहीं हुए। एक दुकानदार ने ऑफ द कैमरा हमें बताया, जिन किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया है, वो सभी किताबें यहां काफी लोकप्रिय हैं। खासकर अरुंधति रॉय की किताब 'आजादी' बहुत बिकती थी। 'जैसे ही सरकार का आदेश आया, हमने अपनी दुकानों से इन सभी किताबों का बचा स्टॉक निकाल दिया। हमें डर है कि अगर पुलिस को एक भी किताब मिली तो हमें सजा हो सकती है। जो हुआ वो गलत है, लेकिन हमें इस बारे में बात करने से भी मना किया गया है।'बुक पर बैन पहली बार नहीं, ये कश्मीर की हकीकत छिपाने की साजिश सबसे पहले हमने राइटर अथर जिया से बात की। उनकी बुक 'रेजिस्टिंग डिसअपीयरेंस' बैन की गई 25 किताबों में शामिल हैं। इसमें उन्होंने कश्मीर में एसोसिएशन ऑफ द पेरेंट्स ऑफ डिसअपीयर्ड पर्सन के साथ 10 साल की अपनी स्टडी लिखी है। ये ऐसी महिलाओं की जिंदगी और संघर्ष को दर्ज कराती है, जिनके पति-बेटे लापता हो गए या कर दिए गए। ये किताब जम्मू-कश्मीर में पुरुषों की संदिग्ध गुमशुदगी के मामलों को चुनौती देती है। किताब पर लगे बैन को लेकर अथर कहती हैं, 'साहित्य पर ये बैन कोई पहली बार नहीं लगा है। कश्मीर में कई सालों से बुक शॉप्स पर रेड पड़ती रही है। इस साल की शुरुआत में अघा शाहिद अली और बशरत पीर की किताबें कश्मीर यूनिवर्सिटी के सिलेबस से हटा दी गईं। इसके बाद जमात-ए-इस्लामी का लिटरेचर और उर्दू किताबों पर रेड पड़ी।' 'कश्मीर में बुक बैन को उन सभी चीजों के साथ जोड़कर देखना होगा, जो आज वहां घट रहा है। ये सिर्फ उसका एक हिस्सा हैं। मेरी किताब में कश्मीर की जमीनी हकीकत है। बल्कि सभी बैन की गई किताबों में कश्मीर का डिस्प्यूट, वहां के लोग क्या चाहते हैं, उनका जज्बा और कश्मीर के इतिहास पर बात हुई है।' 'मेरी किताब में APDP के साथ रही एक्टिविस्ट महिलाओं की कहानियां हैं। कश्मीरियों के साथ अन्याय की हकीकत पर बात हुई है। हर राइटर ने ऐसी ही बातें लिखी हैं। कश्मीर में सिर्फ किताबों पर बैन नहीं हुआ है। पत्रकारों पर बैन है। मीडिया कश्मीर में अपनी मर्जी से रिपोर्ट नहीं कर सकती। वहां लोग खुलकर बात नहीं कर सकते।' '2014 से पहले भी ऐसा ही होता आया है। उसके बाद से ये सब बढ़ गया है। कश्मीर में लोगों की आवाज को आजादी के वक्त से ही दबाया जा रहा है। सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होना और अब धार्मिक आजादी भी खत्म होती जा रही है।'क्या आर्टिकल-370 के हटने के बाद से इस तरह के बैन ज्यादा हो गए हैं। इसके जवाब में अथर कहती हैं, 'अब जो भी फैसले हो रहे हैं, वो दिल्ली में लिए जाते हैं और कश्मीर में लागू कर दिए जाते हैं। आर्टिकल- 370 से पहले कश्मीर में पब्लिक सेफ्टी एक्ट और प्रशासनिक हिरासत का गलत इस्तेमाल हुआ।' अथर का मानना है कि किताबों पर बैन लगाने से इन्हें पढ़ने का क्रेज बढ़ेगा। वे कहती हैं, ‘आज के वक्त में किताबों पर बैन लगाना बड़ी बात नहीं है। वैसे भी अब सब ऑनलाइन मिल जाती हैं। इसलिए लोग वहां भी पढ़ सकते हैं।‘ वो कहती हैं, ‘किताबों पर बैन सिर्फ इसलिए लगाया जा रहा है, जिससे खौफ पैदा हो। मतलब कि अगर आपके पास मेरी किताब है तो आपके घर पुलिस जा सकती है। रेड डाल सकती है। ये सब खौफ और दहशत फैलाने के लिए किया गया है।'अनुराधा भसीन की किताब 'ए डिस्मेंटल्ड स्टेट: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370' को भी बैन किया गया है। इस बैन के मायने समझने के लिए हमने अनुराधा से भी बात की। वो कहती हैं, ‘जम्मू-कश्मीर में जितनी भी किताबों पर प्रतिबंध लगाया गया है। वो सभी नामी पब्लिशर्स की हैं। पब्लिशर भी किताब लिखे जाने के बाद कई बार उसे क्रॉसचेक करते हैं। कई लेवल पर किताब के कंटेट, फैक्ट्स और डेटा की जांच की जाती है। जब पब्लिशर और राइटर दोनों बुक के कंटेंट से संतुष्ट हो जाते हैं, तभी किताब छपती है।‘‘2019 में जब आर्टिकल-370 हटाया गया। उसके बाद 2019 से 2021 तक मैं कश्मीर में ही रही। मैंने वहां फील्ड पर जो काम किया, पब्लिक डोमेन में जो बातें देखीं और सुनी, उन सबको एनालाइज करके किताब लिखी। ‘आर्टिकल-370 हटने के बाद सरकार के किए दावों में कितना सच है। ग्राउंड पर हकीकत क्या है। इसका यहां की जनता पर क्या असर हुआ है, किताब में इसी बारे में बताया गया। ये सब सरकार के प्रति आलोचनात्मक रहा है। शायद यही बात सरकार को पसंद नहीं आई। इसलिए बैन जैसा कदम उठाया गया।‘ वे आगे कहती हैं, ‘एक तरफ सरकार कहती है कि उसने 2019 के बाद कश्मीर से आतंकवाद खत्म कर दिया। दूसरी तरफ कह रही है कि किताबें आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा दे रही हैं। सरकार बताए कि मेरी किताब का आतंक से क्या लेना-देना है? 'अनुराधा आगे कहती हैं, 'कश्मीर में अस्थिरता से जुड़ा इतिहास 70 साल से भी ज्यादा पुराना है। अगर आप यहां की बारीकियां नहीं समझेंगे तो इसके बिना कोई हल नहीं निकल सकता। यहां ग्राउंड पर क्या हो रहा है, लोगों की क्या समस्याएं हैं, इसका पाकिस्तान से कैसे जुड़ाव है, इस मुद्दे की कई सामजिक और राजनीतिक परतें हैं। पहले इसे समझना जरूरी है। यहां जोर- जबरदस्ती, मिलिट्री और पाबंदियां लगाने से किसी का भला नहीं होगा।' 'पहलगाम में जो कुछ हुआ, वो एक वॉर्निंग सिग्नल है कि कश्मीर में कुछ गलत हो रहा है और सरकार उस पर ध्यान नहीं दे रही। पहले सरकार ने कश्मीर में मीडिया की आजादी खत्म कर दी, ताकि कश्मीर में जो कुछ रोजाना घट रहा है, उसकी खबर बाकी देश को न मिल सके। अब सरकार अपनी आलोचना के हर निशान मिटा देना चाहती है। जो सरकार की बात से सहमत नहीं, उसे ऐसे ही बेदखल किया जा रहा है।' 'मेरी किताब में क्या गलत लिखा है, सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। मैं चाहती हूं प्रशासन के लोग मेरी किताब में एक भी शब्द ऐसा ढूंढकर बताएं, जो आतंकवाद और अलगाववाद का समर्थन करता हो, क्योंकि मेरी किताब में ऐसा कुछ है ही नहीं।'नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पोते राइटर सुमंत्र बोस की भी दो किताबों पर बैन लगाया गया है। वो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर हैं। वो पॉलिटिकल साइंस और इंटरनेशनल रिलेशंस के एक्सपर्ट माने जाते हैं। उनकी पहली किताब 'कंटेस्टेड लैंड’ एक कम्पैरिजन स्टडी पर आधारित है। ये उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जहां जातीय-राष्ट्रीय संघर्ष काफी ज्यादा गहरा गए हैं, जैसे-कश्मीर, इजराइल-फिलिस्तीन, बोस्निया, साइप्रस और श्रीलंका। इस किताब का मुख्य मकसद ये समझना है कि इन विवादित इलाकों में स्थायी तौर पर शांति कैसे लाई जा सकती है। बैन को लेकर सुमंत्र बोस कहते हैं, 'मेरी दो किताबें बैन की गई हैं। पहली किताब 'द कंटेस्टेड लैंड' 2007 में पब्लिश हुई थी। उसे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने पब्लिश किया था। ये दुनिया का सबसे बड़ा पब्लिशिंग हाउस है। इस किताब को पब्लिश हुए 18 साल बीत चुके हैं।' 'इसमें कश्मीर के अलावा दुनियाभर के कॉन्फ्लिक्ट जोन के बारे में लिखा गया है। इसमें इजराइल-फिलिस्तीन, कश्मीर, श्रीलंका, साइप्रस और बोस्निया के बारे में लिखा है। किताब का मकसद था कि कैसे संघर्ष में जूझ रहे इन क्षेत्रों में शांति कायम की जा सकती है। इसमें कश्मीर तो सिर्फ एक हिस्सा है।' 'मैंने इसमें कश्मीर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष का एसेसमेंट किया। मैं गांधीवादी नहीं हूं, लेकिन शांति चाहता हूं। लिहाजा अपनी किताब में मैंने शांति स्थापित करने और बनाए रखने की चुनौती के बारे में भी बात की है। मेरा मकसद ही यही है कि सिर्फ कश्मीर ही नहीं, बल्कि इन सभी जगहों के लिए किस तरह शांतिपूर्ण समाधान खोजा जा सकता है।'आर्टिकल-370 को लेकर सरकार को आलोचना नहीं पसंद आई सुमंत्र बोस की दूसरी किताब 'कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स' पर भी बैन लगाया गया है। किताब कश्मीर विवाद की गहराइयों में जाकर उसका ऐतिहासिक, पॉलिटिकल और सोशल एनालिसिस करती है। वे बताते हैं, ‘कश्मीर का संकट सिर्फ 1947 के बंटवारे के बाद का मुद्दा नहीं है, बल्कि इससे कहीं ज्यादा पुराना और जटिल है। किताब में कश्मीर की रियासत के भारत में विलय, 1947-48 की जंग, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और उसके बाद के दशकों की राजनीति को डिटेल में समझाया गया है।‘ ‘इस किताब में कश्मीर के आम लोगों की तकलीफ, नाराजगी और राजनीतिक आकांक्षाओं को जगह दी है। किताब में आजादी की मांग, पाकिस्तान के साथ रिश्ते और भारतीय लोकतंत्र से मोहभंग तक सबका जिक्र है। ये किताब 2021 में पब्लिश हुई थी। इसमें भी मैंने इसी बारे में लिखा है कि कैसे हिंसा, मिलिटेंसी और संघर्ष खत्म हो सकता है।' बैन की वजह पर बात करते हुए सुमंत्र कहते हैं, 'अगस्त 2019 में आर्टिकल-370 के बाद जम्मू कश्मीर में बहुत दिनों तक इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क बंद कर दिया गया। करीब सैकड़ों लोगों को उनके घर से उठाकर ले जाया गया। राजनीतिक आवाजें दबाई गईं। मीडिया को लिखने-बोलने की आजादी नहीं दी गई। इसके कारण डर पैदा हो गया, जो एक लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए।' 'मेरी किताब कश्मीर एट द क्रॉसरोड्स में आर्टिकल- 370 के बाद कश्मीर की स्थिति को लेकर सरकार की आलोचना भी है। एक राइटर होने के नाते ये मेरा अधिकार है कि मैं जमीन पर जो देखता हूं, उसे लिखूं। चाहे वो सरकार की आलोचना ही क्यों न हो। शायद सरकार को यही पसंद नहीं आया।'सुमंत्र बैन को लेकर आगे कहते हैं, 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस की किताब 'द इंडियन स्ट्रगल' को भारत में अंग्रेजों ने बैन किया था। उन्होंने किताब में ब्रिटिश सरकार की आलोचना की थी। आज 90 साल बाद मेरी किताब बैन की गई। हालांकि, मैं इस प्रतिबंध को गौरव की तरह देखता हूं।' वे आगे कहते हैं, 'किताबों पर बैन लगाना सेंसरशिप का सबसे क्रूर रूप है। ऑटोक्रेसी में लोगों की आवाज दबाने का काम किया जाता है। भारत ऐसा राष्ट्र नहीं था और यहां ऐसा होना भी नहीं चाहिए। आज जम्मू-कश्मीर में किताबों पर बैन लगाया जा रहा है। कल पूरे देश में ऐसा होने लगेगा। लोगों को इसका विरोध करना चाहिए।’‘हमारा परिवार बंगाल से दिल्ली काम करने के लिए आया, लेकिन यहां हमें परेशान किया जा रहा है। हम बंगाली बोलते हैं और मुस्लिम भी हैं। भाषा और धर्म के आधार पर हमें टारगेट किया जा रहा है। हमें बांग्लादेशी बताकर बेदखल क्यों किया जा रहा है। हम तो अपने देश में ही सुरक्षित नहीं हैं।‘ अमानुर शेख पश्चिम बंगाल के नदिया जिले से 20 साल पहले दिल्ली आ गए थे। अचानक बदले माहौल से परेशान हैं।वाराणसी में रातभर हुई झमाझम बारिशमेरठ में आज सुबह से हल्की धूप निकली हैलखनऊ में 3 दिन तेज बारिश का अलर्टवाराणसी में बारिश के बीच एनकाउंटर

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