Chandrayaan2: चांद पर जब चंद्रयान 2 उतरेगा तो क्या होगा
चंद्रयान-2 का विक्रम लैंडर, शनिवार को तड़के 1 बज कर चालीस मिनट के आस-पास चंद्रमा पर उतरने का प्रयास करेगा. इसरो के चीफ़ डॉक्टर के. सिवन इसे 'मिशन का सबसे डरावना पल' कहते रहे हैं. लेकिन, बंगलुरू के प्रोफ़ेसर यूआर राव सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक डॉक्टर टी के एलेक्स ने बीबीसी से कहा है कि,"निश्चिंत रहिए.
लैंडिंग के वक़्त कुछ भी डरावना नहीं होगा. ये किसी एयरपोर्ट पर विमान के उतरने जैसा ही होगा. इसमें कुछ भी नाटकीय नहीं होगा. ये इस मिशन के एक हिस्से का अंत होगा और पूरी तरह से अपनी योजना के मुताबिक़ होगा."डॉक्टर मयिलस्वामी अन्नादुरै कहते हैं,"अभी ये कहना ठीक होगा कि हम शायद चंद्रयान-3 के दौरान विक्रम लैंडर को वापस धरती पर लाने की कोशिश करेंगे. हो सकता है कि हम मंगलयान-2 मिशन के दौरान विक्रम लैंडर को मंगल ग्रह की सतह पर उतारने की कोशिश करें. अभी विक्रम लैंडर का चंद्रमा पर उतरना चंद्रयान-1 और मंगलयान से आगे का वाजिब क़दम है. इसी कड़ी में अगला क़दम चंद्रमा पर उतरने का है." डॉक्टर एलेक्स कहते हैं कि,"चंद्रमा पर मानवयुक्त मिशन भेजने पर काम पहले से ही शुरू हो चुका है और अगले साल हम सूरज के अध्ययन के लिए मिशन भेजने वाले हैं. हम एक बार में एक ही मिशन पर ध्यान लगा रहे हैं." प्रोफ़ेसर यू आर राव सैटेलाइट सेंटर के एक और पूर्व निदेशक डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन श्रीहरिकोटा सैटेलाइट लॉन्च सेंटर के भी प्रमुख रहे हैं.अरावमुदन कहते हैं,"दूसरे देशों के पास ताक़तवर रॉकेट हैं, जो उनके स्पेसक्राफ्ट को चांद तक पहुंचा सकते हैं. लेकिन हमने सीमित संसाधनों की मदद से अपना मिशन भेजा है. और कम ऊर्जा में चांद तक पहुंचने के अपने मिशन को क़ामयाब होने लायक़ बनाया है." डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन कहते हैं,"चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट इस बात की शानदार मिसाल है कि हमने रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट संचार के उपलब्ध हार्डवेयर और तकनीक की मदद से चंद्रमा पर भेजा जाने वाला मिशन तैयार किया है. इसके लिए हमने उपलब्ध तकनीक में थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ अंतरिक्षयान को चंद्रमा पर उतरने के लिए तैयार किया है."डॉक्टर रामभद्रन अरावमुदन कहते हैं,"अभी तो नहीं, लेकिन, आगे चलकर, शायद आज से 50 साल बाद हमारे पास ऐसी तकनीक होगी जिसकी मदद से हम लोगों को चांद की सैर पर ले जा सकेंगे." डॉक्टर अन्नादुरै कहते हैं,"हमारे पहले के मिशन यानी चंद्रयान-1 और मंगलयान से बहुत से युवाओं को प्रेरणा मिली है. इससे भारत की कम पैसे और कम समय में स्पेस मिशन बनाने वाले देश की छवि बनती है. इससे हमें उन देशों के अंतरिक्ष मिशन भेजने का मौक़ा मिलता है, जिनके पास ख़ुद की तकनीक और सुविधाएं नहीं हैं." चंद्रयान-1 मिशन ने चंद्रमा के ध्रुवीय इलाक़े में मून इम्पैक्ट प्रोब को उतारा था. पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम का सुझाव था कि इस पर भारत का तिरंगा लगा होना चाहिए.इस प्रोब में नासा का एम-3 नाम का एक यंत्र था, जिसका पूरा नाम द मून मिनरोलॉजी मैपर था. इसी की मदद से इस बात की पुष्टि हुई थी कि चंद्रमा की मिट्टी पर पानी है.
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