हिंदू और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म के बारे में क्या कहते हैं
राजकुमार सिद्धार्थ जिन्हें बाद में चलकर बुद्ध के नाम से दुनिया ने जाना, उनका जन्म 2500 साल पहले एक शाही परिवार में हुआ था. ये जगह अब नेपाल में है. एक राज परिवार में पैदा होने के बावजूद एक घटना से उद्वेलित होकर उन्होंने राज-पाठ, विशेषाधिकार, भोग-विलास सबकुछ का त्याग कर दिया और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति में निकल पड़े.
सालों के तप के बाद वह 'बुद्ध' हुए. एक अनुमान के मुताबिक़,मौजूदा समय में दुनिया भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या 370 मिलियन से अधिक है और थेरावाडा जैसे कई स्कूल हैं.दूसरी ज़ुबान या भाषा औरवह कहते हैं, "अपनी ज़ुबान और शरीर के माध्यम से हर दूसरों से संपर्क करते हैं और हम अपने अच्छे कर्म कर सकते हैं या हम चाहें तो बुरे कर्म कर सकते हैं और दूसरों को पीड़ा और नुकसान पहुंचा सकते हैं."बौद्ध भिक्षु के मुताबिक़, "हर बार जब हम अपने शरीर के द्वार से, भाषा के द्वार से या फिर चित्त के द्वार से कोई क्रिया करते हैं तो यह कर्म है."एक जानकार के मुताबिक़, "कल्पना कीजिए कि एक मौखिक या शारीरिक क्रिया के दौरान, जो किसी एक निश्चित समय तक हो सकती है, उस दौरानअनगिनत विचार पनपते हैं जो हमें उस क्रिया को पूरा करने के लिए प्रेरित करते हैं."यानी की, हर वक़्त जब हम यह कहते हैं कि कुछ करो या कुछ सोचो तो उसमें हमारी एक नीयत होती है और हम एक क्षमता पैदा करते हैं.जब हम कोई क्रिया करते हैं, मसलन, वो चाहे दया और करुणा की क्रिया हो या भी किसी अन्य प्राणी को नुकसान पहुंचाने की तो हमारी निरंतरता में एक क्षमता उत्पन्न होती है. और यह क्षमता तब तक बनी रहती है जब तक की परिणाम मिलने तक के लिए परिस्थितियां और शर्तें पूरी नहीं होतीं. वह कहते हैं, "आज के समय में कर्म के बारे में बहुत से लोग परिणाम की बात करते हैं और कहते हैं कि यह मेरा कर्म है या फिर मेरे साथ ऐसा हुआ." "लेकिन दरअसल, कर्म वास्तविक रूप से एक क्रिया है और उस क्रिया और उस क्रिया के परिणाम के बीच के संबंध को ही कर्म या कर्म का नियम कहा जाता है."बौद्ध भिक्षु के मुताबिक़, हमारे आस-पास कुछ ऐसे गुण और भौतिक क्रियाएं ऐसी होती हैं जो हमारी अंतरात्मा की आवाज़ का आधार होते हैं. हम सभी के शरीर में छह अलग-अलग तरह की जागृति होती है. आंख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श और मन. और ये सभी गुणधर्मों के आधार पर बढ़ते हैं.लेकिन मानसिक जागृति, मृत्यु के तुरंत बाद ही एक क्रिया का अनुसरण करती है और यह जीवन के पनपने से जुड़ा होता है. बौद्ध धर्म के अनुसार, जिस समय पुरुष के शुक्राण और मादा के अंडाणु मिलते हैं, तो सिर्फ़ माता और पिता के अतिरिक्त एक बाहरी आरोपण भी होता है जिसे हम री-कनेक्शन कहते हैं.यह वह समय होता है जब चेतना का आधार बनता है, जिसके विकास के लिए कई तरह की सेंसरी फ़ैकल्टी विकसित होती हैं. उनके मुताबिक़, "हम पुनर्जन्म शब्द का इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं होता है, जो एक क्षण से दूसरे तक हो. यह एक निरंतरता है, लेकिन इसकी कोई पहहचान नहीं है. पिछली जागृति से जुड़ा ऐसा कुछ भी नहीं होता है जो एक साल के तौर पर अगली जागृति को मिलता है." हालांकि वह मानते हैं कि बौद्ध धर्म की कुछ शाखाएं ऐसी हैं जो पुनर्जन्म जैसे शब्द का इस्तेमाल करती हैं लेकिन वह आगे कहते हैं, "तकनीकी तौर पर हम री-कनेक्शन शब्द का इस्तेमाल करते हैं जो सीधे तौर पर पाली के एक शब्द का शाब्दिक अनुवाद है. हालांकि पुनर्जन्म शब्द का इस्तेमाल करना, लोगों को अधिक समझ में आता है."जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है. इसलिए जो अटल है, अपरिहार्य है उसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए- भागवत गीता बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के संस्कृत भाषाशास्त्र के शोधकर्ता ऑस्कर पुजोल ने बीबीसी मुंडो को बताया, "प्राचीन भारतीय दर्शन और विचारों में कर्म और पुनर्जन्म के अस्तित्व को लेकर पूर्ण सहमति है."वह कहते हैं, "यह अजीब लग सकता है लेकिन प्राचीन भारतीय इतिहास में इसे इतने स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि इसके लिए शायद ही किसी प्रमाण की ज़रूरत हो." दुनिया भर में क़रीब 900 मिलियन से अधिक लोग हिंदू धर्म को मानने वाले हैं. भारत और नेपाल हिंदू बहुल देश हैं.बीबीसी रिलीजियस यूनिट के मुताबिक़, "दूसरे कई धर्मों की तरह हिंदू धर्म का कोई एक संस्थापक, एक ही धर्मग्रंथ और एक जैसी ही सर्व स्वीकृत शिक्षा नहीं है."यह मौजूदा पाकिस्तान में सिंधु घाटी के आसपास उत्पन्न हुआ.कई विद्वान हिंदू धर्म को किसी एक धर्म के रूप में मानने के बजाय 'जीवन जीने का सार' या फिर 'धर्मों का परिवार' बताते हैं.पुजोल के मुताबिक़, हिंदू दृष्टिकोण से कर्म एक तरह का नियम है. ख़ासतौर पर इस भौतिक दुनिया के लिए, इस दुनिया में रहने वाले लोगों के लिए.कर्म को समझना, कारण और उसके प्रभाव के नियम जितना ही आसान है. एक कारण और उससे उत्पन्न प्रभाव. जो किसी दूसरे प्रभाव के लिए कारण का काम करता है.और यही कारण और प्रभाव की निरंतर चलती प्रक्रिया ब्रह्मांण और मनुष्य के अस्तित्व की रचना करती है. लेकिन यह सिर्फ़ भौतिक क्रिया तक ही सीमित नहीं है, इसके नैतिक आयाम भी हैं.Getty Imagesविशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके पास जो विभिन्न प्रकार की शक्तियां होती हैं, उससे वापस ले ली जाती है. "पहले शरीर मर जाता है, फिर इंद्रियां, फिर सांसें और फिर अति सूक्ष्म हिस्सा जो पुनर्जन्म लेने वाला होता है. वही बचता है."'डुग डुग': राजस्थान के 'बुलेट वाले देवता' पर बन गई फ़िल्म जानकारों के मुताबिक़, अपने बारे में जानकारी पुनर्जन्म नहीं लेती है. तो नए जीवन में हमें नहीं पता होता है कि हम इससे पहले के जन्म में क्या थे. हम अपने पुराने जीवन की पहचान को खो चुके होते हैं.हालांकि इस संबंध में कई तरह के प्रचलित विचार हैं लेकिन पुजोल के मुताबिक़, आमतौर पर यह माना जाता है कि एक मनुष्य अपने अगले जन्म में किसी भी रूप में जन्म ले सकता है और यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि वह मनुष्य ही बने.
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