हर्ड इम्युनिटी के बाद अब कोविड-19 के लिए इम्यूनिटी पासपोर्ट की चर्चा, जानें क्या है

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हर्ड इम्युनिटी के बाद अब कोविड-19 के लिए इम्यूनिटी पासपोर्ट की चर्चा, जानें क्या है
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कोरोना पर इम्यूनिटी पासपोर्ट की तैयारी, क्यों डर? CoronavirusOutbreak Lockdown4 CautionYesPanicNo

कोविड-19 को फैलने से रोकते हुए अनिवार्य गतिविधियां शुरू करने के उपायों पर मंथन के बीच 'इम्यूनिटी पासपोर्ट' को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है। कुछ देश इस तरह के दस्तावेज पर जोर दे रहे हैं जो किसी व्यक्ति को रोग के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करता हो। कोरोना वायरस के टीके के विकास में अभी कई महीने लग सकते हैं, ऐसे में किसी व्यक्ति के संक्रमित होने और SARS-COV- 2 के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने का प्रमाण देने के प्रस्ताव पर गहन मंथन चल रहा है।दरअसल, उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को लॉकडाउन की पाबंदियों से छूट देने की तरकीब पर चर्चा हो रही है। इसके तहत, जिस व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होगी, उसे 'इम्यूनिटी पासपोर्ट' देकर उसे शारीरिक दूरी की पाबंदियों से छूट दी जा सकती है और वह कामकाज पर लौट सकता है, बच्चे स्कूल जा सकते हैं। विषाणु विज्ञानी उपासना रे ने कहा, 'एक इम्यूनिटी पासपोर्ट इस बात का प्रमाणपत्र है कि कोई व्यक्ति सार्स-सीओवी-2 संक्रमण को लेकर प्रतिरक्षा क्षमता रखता है।'इससे पहले हर्ड इम्यूनिटी की चर्चा जोर पकड़ी थी। हर्ड इम्यूनिटी का कॉन्सेप्ट इस बात पर आधारित है कि अगर 60% से ज्यादा आबादी में ऐंटीबॉडी विकसित हो जाए तो फिर कोरोना वायरस के संक्रमण का दायरा यूं ही सीमित हो जाएगा। हालांकि, इम्यूनिटी पासपोर्ट की अवधारणा में उच्च प्रतिरक्षा वाले लोगों की पहचानकर उन्हें सर्टिफिकेट देने की बात है। बहरहाल, ध्यान रहे कि चिली, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई देशों की सरकारों ने इम्यूनिटी पासपोर्ट के इस्तेमाल का सुझाव दिया है।इस देश का नाम है यूनाइटेड किंगडम। जिसके मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार हैं सर पैट्रिक वैलेंस। सर पैट्रिक वैलेंस ने ही यह हैरतअंगेज और डरावनी सलाह दी थी। लेकिन उनकी इस सलाह के पीछे एक बड़ी मेडिकल प्रक्रिया छिपी थी। इस प्रक्रिया को हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। हर्ड इम्यूनिटी मेडिकल साइंस का एक बहुत पुरानी प्रक्रिया है। इसके तहत देश की आबादी का एक तय हिस्से को वायरस से संक्रमित कर दिया जाता है। ताकि वो इस वायरस से इम्यून हो जाएं। यानी उनके शरीर में वायरस को लेकर एंटीबॉडीज बन जाएं। इससे भविष्य में कभी भी वो वायरस परेशान नहीं करेगा। अगर हर्ड इम्यूनिटी लागू किया जाता तो यूनाइटेड किंगडम की 60 फीसदी आबादी को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता। इसके बाद जब वे इस बीमारी से इम्यून हो जाते तब उनके शरीर से एंटीबॉडीज निकाल कर इस वायरस के लिए वैक्सीन तैयार किया जाता। फिर इसी वैक्सीन से बाकी लोगों का इलाज किया जाता। अगर हर्ड इम्यूनिटी लागू किया जाता तो यूनाइटेड किंगडम की 60 फीसदी आबादी को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता। इसके बाद जब वे इस बीमारी से इम्यून हो जाते तब उनके शरीर से एंटीबॉडीज निकाल कर इस वायरस के लिए वैक्सीन तैयार किया जाता। फिर इसी वैक्सीन से बाकी लोगों का इलाज किया जाता।रिपोर्ट के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम की सरकार देश की पूरी आबादी के किसी एक हिस्से को कोरोना से संक्रमित कर हर्ड इम्यूनिटी लागू नहीं करना चाहती थी। सरकार चाहती थी कि यह पूरे देश में लागू हो। ताकि, ज्यादा से ज्यादा आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद इम्यून हो जाए। हर्ड इम्यूनिटी की प्रक्रिया लागू होने के बाद पूरे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कोरोना संक्रमण से मुक्त हो जाता। इससे वायरस के फैलाव को रोकने में मदद मिलती। इससे उन्हें फायदा होता जो वायरस के हमले से अब तक बचे हुए हैं। अगर कोई वायरस से संक्रमित हो भी जाता तो इम्यून लोगों की एंटीबॉडीज से बनाई गई वैक्सीन से इलाज हो जाता। हर्ड इम्यूनिटी की प्रक्रिया लागू करने से यह भी पता चल जाता कि देश की कितनी बड़ी आबादी इससे प्रभावित हो रही है। साथ ही इस वायरस की फैलने की क्षमता कितनी है। यानी अगर एक व्यक्ति को संक्रमित किया जाता वायरस से तो उस आदमी से और कितने लोग संक्रमित हो रहे हैं।जैसे मीसल्स से बीमार एक व्यक्ति करीब 12 से 18 लोगों को संक्रमित कर सकता है। इनफ्लूएंजा से पीड़ित आदमी 1 से 4 लोगों को बीमार कर सकता है। ये निर्भर करता है कि मौसम कैसा है, साथ ही वायरस जिस व्यक्ति को संक्रमित कर रहा है, उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कितनी है। कोरोना वायरस एक आदमी से 2 या 3 लोगों को संक्रमित कर सकता है। वायरस तीन तरीके से बड़ी आबादी को संक्रमित करता है। पहला - वह समुदाय या समूह जो वायरस से इम्यून न हो यानी प्रतिरोधक क्षमता कम हो। दूसरा - ये हो सकता है कि कुछ लोग इम्यून हो लेकिन समुदाय में बाकी लोग इम्यून न हों। तीसरा - पूरे समुदाय को इम्यून कर दिया जाए ताकि जब वायरस फैलने की कोशिश करे तो वह इक्का-दुक्का लोगों को ही संक्रमित कर पाए। जी हां, पूरी दुनिया में हर्ड इम्यूनिटी का सबसे बेहतरीन उदाहरण है पोलियो। दुनिया की लगभग पूरी आबादी पोलियो से इम्यून हो चुकी है। पोलियो को रोकने के लिए पूरी दुनिया में अभियान चला क्योंकि इसका वायरस 90 फीसदी आबादी को संक्रमित कर सकता था।सीएसआईआर के कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायॉलजी की वरिष्ठ वैज्ञानिक उपासना ने बताया कि लोगों को प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करने के पीछे तर्क है कि ऐसे लोगों में वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी बने हैं और मौजूद हैं। हालांकि, इस संबंध में भारत का रुख बहुत सावधानी वाला है। आईसीएमआर के चेन्नै स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के निदेशक मनोह मुरहेकर ने कहा, 'इस बात के अभी तक कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति को दोबारा संक्रमण नहीं हो सकता। दक्षिण कोरिया से लोगों को पुन: संक्रमण होने की खबरें हैं, इसलिए खून में सार्स-सीओवी-2 एंटीबॉडी होने के आधार पर इम्यूनिटी पासपोर्ट देना व्यावहारिक नहीं है।'हालांकि, भारत में उन लोगों को यात्रा की अनुमति है जिनके मोबाइल फोन में आरोग्य सेतु ऐप हरे रंग के साथ उनके सुरक्षित होने का संकेत करता है। यह पूरी तरह खुद की घोषणा पर आधारित है। दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले 56 लाख की संख्या को पार कर गए हैं और साढ़े तीन लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं, ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोई व्यक्ति कोविड-19 से ठीक हो चुका है और उसके शरीर में एंटीबॉडी हैं तो वह दूसरी बार संक्रमण से बचा रहेगा।अप्रैल महीने में यूपी की राजधानी लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में भर्ती ढाई साल के बच्चे ने कोरोना को हरा दिया। सिर्फ पांच दिनों में बच्चा पूरी तरह से ठीक हो गया और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। खास बात यह है कि बच्चे ने बिना किसी दवा के ही कोरोना को मात दी। अप्रैल महीने की शुरुआत में कोरोना वायरस तेजी के फैलना शुरू ही हुआ था। उसी वक्त मुंबई में एक पांच दिन के एक बच्चे ने कोरोना को मात दी। चेंबूर के इस बच्चे की कोरोना रिपोर्ट दो दिन पहले पॉजिटिव आई थी। तब वह केवल तीन दिन का और देश का सबसे छोटा कोरोना पॉजिटिव बच्चा था। दोबारा कस्तूरबा अस्पताल में जांच करने पर बच्चे और उसकी मां की रिपोर्ट निगेटिव आ गई। देश में कोरोना वायरस से दूसरे सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य गुजरात में पंचमहाल जिले के एक परिवार के पांच सदस्‍य कोरोना संक्रमित पाए गए थे, उनसे परिवार का 6 माह का बच्‍चा भी संक्रमित हो गया था। दस दिन वडोदरा के अस्‍पताल में भर्ती रहने के बाद रविवार को इस नन्‍हे कोरोना वॉरियर को डिस्‍चार्ज कर दिया गया। मई के पहले हफ्ते में कोरोना वायरस को दिल्ली के 106 वर्षीय बुजुर्ग मुख्तार अहमद ने केवल 17 दिन में मात दे दी। बुजुर्ग की इस जीत पर सभी लोग हैरानी के साथ खुशी जता रहे हैं और इसे मिसाल मान रहे हैं। मुख्तार 14 अप्रैल को दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती थे। उनकी जांच रिपोर्ट में जब इस बात की पुष्टि हो गई कि उनका संक्रमण खत्म हो गया है तो एक मई को उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीकी जटिलताओं के साथ ही इम्यूनिटी पासपोर्ट से नियामक और नैतिकता संबंधी चिंताएं भी हैं। प्रतिरक्षा विज्ञानी सत्यजीत रथ ने कहा, 'इम्यूनिटी पासपोर्ट का विचार प्रशासनिक क्रियान्वन में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है और इसका कई तरीके से खासकर गरीबों और वंचित समूहों के लिए व्यापक दुरुपयोग भी होने की आशंकाएं हैं।' अमेरिका के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के अलेक्जेंड्रा एल फेलान ने द लांसेट पत्रिका में लिखा है कि इम्यूनिटी पासपोर्ट से इस तरह का कृत्रिम प्रतिबंध लग जाएगा कि कौन सामाजिक, नागरिक और आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकता है और कौन नहीं। इससे लोग खुद को संक्रमित दिखाना चाह सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी पैदा होंगे।.

कोविड-19 को फैलने से रोकते हुए अनिवार्य गतिविधियां शुरू करने के उपायों पर मंथन के बीच 'इम्यूनिटी पासपोर्ट' को लेकर चर्चा जोर पकड़ रही है। कुछ देश इस तरह के दस्तावेज पर जोर दे रहे हैं जो किसी व्यक्ति को रोग के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करता हो। कोरोना वायरस के टीके के विकास में अभी कई महीने लग सकते हैं, ऐसे में किसी व्यक्ति के संक्रमित होने और SARS-COV- 2 के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखने का प्रमाण देने के प्रस्ताव पर गहन मंथन चल रहा है।दरअसल, उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को लॉकडाउन की पाबंदियों से छूट देने की तरकीब पर चर्चा हो रही है। इसके तहत, जिस व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होगी, उसे 'इम्यूनिटी पासपोर्ट' देकर उसे शारीरिक दूरी की पाबंदियों से छूट दी जा सकती है और वह कामकाज पर लौट सकता है, बच्चे स्कूल जा सकते हैं। विषाणु विज्ञानी उपासना रे ने कहा, 'एक इम्यूनिटी पासपोर्ट इस बात का प्रमाणपत्र है कि कोई व्यक्ति सार्स-सीओवी-2 संक्रमण को लेकर प्रतिरक्षा क्षमता रखता है।'इससे पहले हर्ड इम्यूनिटी की चर्चा जोर पकड़ी थी। हर्ड इम्यूनिटी का कॉन्सेप्ट इस बात पर आधारित है कि अगर 60% से ज्यादा आबादी में ऐंटीबॉडी विकसित हो जाए तो फिर कोरोना वायरस के संक्रमण का दायरा यूं ही सीमित हो जाएगा। हालांकि, इम्यूनिटी पासपोर्ट की अवधारणा में उच्च प्रतिरक्षा वाले लोगों की पहचानकर उन्हें सर्टिफिकेट देने की बात है। बहरहाल, ध्यान रहे कि चिली, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई देशों की सरकारों ने इम्यूनिटी पासपोर्ट के इस्तेमाल का सुझाव दिया है।इस देश का नाम है यूनाइटेड किंगडम। जिसके मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार हैं सर पैट्रिक वैलेंस। सर पैट्रिक वैलेंस ने ही यह हैरतअंगेज और डरावनी सलाह दी थी। लेकिन उनकी इस सलाह के पीछे एक बड़ी मेडिकल प्रक्रिया छिपी थी। इस प्रक्रिया को हर्ड इम्यूनिटी कहते हैं। हर्ड इम्यूनिटी मेडिकल साइंस का एक बहुत पुरानी प्रक्रिया है। इसके तहत देश की आबादी का एक तय हिस्से को वायरस से संक्रमित कर दिया जाता है। ताकि वो इस वायरस से इम्यून हो जाएं। यानी उनके शरीर में वायरस को लेकर एंटीबॉडीज बन जाएं। इससे भविष्य में कभी भी वो वायरस परेशान नहीं करेगा। अगर हर्ड इम्यूनिटी लागू किया जाता तो यूनाइटेड किंगडम की 60 फीसदी आबादी को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता। इसके बाद जब वे इस बीमारी से इम्यून हो जाते तब उनके शरीर से एंटीबॉडीज निकाल कर इस वायरस के लिए वैक्सीन तैयार किया जाता। फिर इसी वैक्सीन से बाकी लोगों का इलाज किया जाता। अगर हर्ड इम्यूनिटी लागू किया जाता तो यूनाइटेड किंगडम की 60 फीसदी आबादी को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता। इसके बाद जब वे इस बीमारी से इम्यून हो जाते तब उनके शरीर से एंटीबॉडीज निकाल कर इस वायरस के लिए वैक्सीन तैयार किया जाता। फिर इसी वैक्सीन से बाकी लोगों का इलाज किया जाता।रिपोर्ट के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम की सरकार देश की पूरी आबादी के किसी एक हिस्से को कोरोना से संक्रमित कर हर्ड इम्यूनिटी लागू नहीं करना चाहती थी। सरकार चाहती थी कि यह पूरे देश में लागू हो। ताकि, ज्यादा से ज्यादा आबादी कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद इम्यून हो जाए। हर्ड इम्यूनिटी की प्रक्रिया लागू होने के बाद पूरे देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कोरोना संक्रमण से मुक्त हो जाता। इससे वायरस के फैलाव को रोकने में मदद मिलती। इससे उन्हें फायदा होता जो वायरस के हमले से अब तक बचे हुए हैं। अगर कोई वायरस से संक्रमित हो भी जाता तो इम्यून लोगों की एंटीबॉडीज से बनाई गई वैक्सीन से इलाज हो जाता। हर्ड इम्यूनिटी की प्रक्रिया लागू करने से यह भी पता चल जाता कि देश की कितनी बड़ी आबादी इससे प्रभावित हो रही है। साथ ही इस वायरस की फैलने की क्षमता कितनी है। यानी अगर एक व्यक्ति को संक्रमित किया जाता वायरस से तो उस आदमी से और कितने लोग संक्रमित हो रहे हैं।जैसे मीसल्स से बीमार एक व्यक्ति करीब 12 से 18 लोगों को संक्रमित कर सकता है। इनफ्लूएंजा से पीड़ित आदमी 1 से 4 लोगों को बीमार कर सकता है। ये निर्भर करता है कि मौसम कैसा है, साथ ही वायरस जिस व्यक्ति को संक्रमित कर रहा है, उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कितनी है। कोरोना वायरस एक आदमी से 2 या 3 लोगों को संक्रमित कर सकता है। वायरस तीन तरीके से बड़ी आबादी को संक्रमित करता है। पहला - वह समुदाय या समूह जो वायरस से इम्यून न हो यानी प्रतिरोधक क्षमता कम हो। दूसरा - ये हो सकता है कि कुछ लोग इम्यून हो लेकिन समुदाय में बाकी लोग इम्यून न हों। तीसरा - पूरे समुदाय को इम्यून कर दिया जाए ताकि जब वायरस फैलने की कोशिश करे तो वह इक्का-दुक्का लोगों को ही संक्रमित कर पाए। जी हां, पूरी दुनिया में हर्ड इम्यूनिटी का सबसे बेहतरीन उदाहरण है पोलियो। दुनिया की लगभग पूरी आबादी पोलियो से इम्यून हो चुकी है। पोलियो को रोकने के लिए पूरी दुनिया में अभियान चला क्योंकि इसका वायरस 90 फीसदी आबादी को संक्रमित कर सकता था।सीएसआईआर के कोलकाता स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायॉलजी की वरिष्ठ वैज्ञानिक उपासना ने बताया कि लोगों को प्रतिरोधक क्षमता रखने वाला प्रमाणित करने के पीछे तर्क है कि ऐसे लोगों में वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडी बने हैं और मौजूद हैं। हालांकि, इस संबंध में भारत का रुख बहुत सावधानी वाला है। आईसीएमआर के चेन्नै स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी के निदेशक मनोह मुरहेकर ने कहा, 'इस बात के अभी तक कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोविड-19 से संक्रमित व्यक्ति को दोबारा संक्रमण नहीं हो सकता। दक्षिण कोरिया से लोगों को पुन: संक्रमण होने की खबरें हैं, इसलिए खून में सार्स-सीओवी-2 एंटीबॉडी होने के आधार पर इम्यूनिटी पासपोर्ट देना व्यावहारिक नहीं है।'हालांकि, भारत में उन लोगों को यात्रा की अनुमति है जिनके मोबाइल फोन में आरोग्य सेतु ऐप हरे रंग के साथ उनके सुरक्षित होने का संकेत करता है। यह पूरी तरह खुद की घोषणा पर आधारित है। दुनियाभर में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले 56 लाख की संख्या को पार कर गए हैं और साढ़े तीन लाख से अधिक मौत हो चुकी हैं, ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि कोई व्यक्ति कोविड-19 से ठीक हो चुका है और उसके शरीर में एंटीबॉडी हैं तो वह दूसरी बार संक्रमण से बचा रहेगा।अप्रैल महीने में यूपी की राजधानी लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में भर्ती ढाई साल के बच्चे ने कोरोना को हरा दिया। सिर्फ पांच दिनों में बच्चा पूरी तरह से ठीक हो गया और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। खास बात यह है कि बच्चे ने बिना किसी दवा के ही कोरोना को मात दी। अप्रैल महीने की शुरुआत में कोरोना वायरस तेजी के फैलना शुरू ही हुआ था। उसी वक्त मुंबई में एक पांच दिन के एक बच्चे ने कोरोना को मात दी। चेंबूर के इस बच्चे की कोरोना रिपोर्ट दो दिन पहले पॉजिटिव आई थी। तब वह केवल तीन दिन का और देश का सबसे छोटा कोरोना पॉजिटिव बच्चा था। दोबारा कस्तूरबा अस्पताल में जांच करने पर बच्चे और उसकी मां की रिपोर्ट निगेटिव आ गई। देश में कोरोना वायरस से दूसरे सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य गुजरात में पंचमहाल जिले के एक परिवार के पांच सदस्‍य कोरोना संक्रमित पाए गए थे, उनसे परिवार का 6 माह का बच्‍चा भी संक्रमित हो गया था। दस दिन वडोदरा के अस्‍पताल में भर्ती रहने के बाद रविवार को इस नन्‍हे कोरोना वॉरियर को डिस्‍चार्ज कर दिया गया। मई के पहले हफ्ते में कोरोना वायरस को दिल्ली के 106 वर्षीय बुजुर्ग मुख्तार अहमद ने केवल 17 दिन में मात दे दी। बुजुर्ग की इस जीत पर सभी लोग हैरानी के साथ खुशी जता रहे हैं और इसे मिसाल मान रहे हैं। मुख्तार 14 अप्रैल को दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में भर्ती थे। उनकी जांच रिपोर्ट में जब इस बात की पुष्टि हो गई कि उनका संक्रमण खत्म हो गया है तो एक मई को उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।विशेषज्ञों ने कहा कि तकनीकी जटिलताओं के साथ ही इम्यूनिटी पासपोर्ट से नियामक और नैतिकता संबंधी चिंताएं भी हैं। प्रतिरक्षा विज्ञानी सत्यजीत रथ ने कहा, 'इम्यूनिटी पासपोर्ट का विचार प्रशासनिक क्रियान्वन में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकता है और इसका कई तरीके से खासकर गरीबों और वंचित समूहों के लिए व्यापक दुरुपयोग भी होने की आशंकाएं हैं।' अमेरिका के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के अलेक्जेंड्रा एल फेलान ने द लांसेट पत्रिका में लिखा है कि इम्यूनिटी पासपोर्ट से इस तरह का कृत्रिम प्रतिबंध लग जाएगा कि कौन सामाजिक, नागरिक और आर्थिक गतिविधियों में भाग ले सकता है और कौन नहीं। इससे लोग खुद को संक्रमित दिखाना चाह सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी पैदा होंगे।

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