सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 85 के तहत सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 85 सिविल अदालतों के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह से समाप्त नहीं करती है और वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार सीमित है। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के दायरे, संपत्ति के वक्फ होने या न होने के निर्धारण और अधिनियम के लागू होने के प्रभावों पर भी स्पष्टीकरण दिया है।
नई दिल्ली. वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 85 सिविल अदालत ों के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है. इस धारा के तहत कहा गया है कि जिन मामलों पर वक्फ न्यायाधिकरण को निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है, उन मामलों में सिविल अदालत ें हस्तक्षेप नहीं करेंगी.
लंबे समय से इस धारा की व्याख्या को लेकर विवाद रहा है. कई मामलों में यह तर्क दिया गया कि वक्फ से जुड़े किसी भी विवाद में सिविल अदालत का अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है. इसी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने अब एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने हबीब अलादीन बनाम मोहम्मद अहमद मामले में बुधवार को निर्णय देते हुए कहा कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 85 के तहत सिविल अदालतों का अधिकार क्षेत्र अपने आप समाप्त नहीं हो जाता. जस्टिस विनोद चंद्रन और संजय कुमार की पीठ ने साफ शब्दों में कहा कि धारा 85 कोई पूर्ण और सर्वव्यापी रोक नहीं लगाती. न्यायालय ने क्या स्पष्ट किया? 1. वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार सीमित है :- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल केवल उन्हीं मामलों पर फैसला कर सकता है, जो उसे कानून द्वारा विशेष रूप से सौंपे गए हैं. न्यायालय ने कहा कि धारा 83 केवल ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान है, न कि वक्फ से जुड़े सभी विवादों को सुनने का सर्वसाधारण अधिकार. 2. धारा 83 का दायरा क्या नहीं है? :- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वक्फ ट्रिब्यूनल को किरायेदार को बेदखल करने, पट्टेदार और पट्टेदार के अधिकारों/कर्तव्यों का निर्धारण, सामान्य दीवानी निषेधाज्ञा देने का स्वतः अधिकार नहीं है. 3. संपत्ति वक्फ है या नहीं-कब ट्रिब्यूनल सुनेगा? :- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति के वक्फ होने या न होने का सवाल तभी वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आएगा, जब वह संपत्ति अधिनियम के तहत तैयार की गई ‘वक्फ की सूची’ में दर्ज हो या विधिवत रूप से अधिनियम के तहत पंजीकृत हो. यदि संपत्ति न सूची में है और न ही पंजीकृत, तो ट्रिब्यूनल उस पर फैसला नहीं कर सकता. 4. केवल अधिनियम के लागू होने से अधिकार तय नहीं होता :- न्यायालय ने कहा कि धारा 2 के तहत अधिनियम का सभी औकाफों पर लागू होना या धारा 3 के तहत ‘वक्फ’ की परिभाषा अपने आप ट्रिब्यूनल को अधिकार क्षेत्र नहीं देती. 5. अतिक्रमण हटाने की शक्ति किसके पास? :- कोर्ट ने बताया कि अतिक्रमण हटाने की शक्ति धारा 54 और 54 के तहत वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के निर्देश पर प्रयोग की जाती है, न कि धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल द्वारा 2013 संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पीठ ने कहा कि 2013 के संशोधन ने पहले के रमेश गोबिंदराम फैसले को केवल सीमित हद तक बदला है. साल 2013 संशोधन ने ट्रिब्यूनल को केवल अतिक्रमण हटाने के सीमित अधिकार दिए हैं, लेकिन ट्रिब्यूनल के व्यापक अधिकार क्षेत्र का विस्तार नहीं किया. मामला किससे जुड़ा था? यह मामला एक आवासीय अपार्टमेंट परिसर के भूतल पर स्थित एक स्थान को मस्जिद बताए जाने और वहां नमाज में हस्तक्षेप रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की मांग से जुड़ा था. प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि संपत्ति न तो वक्फ सूची में थी न ही अधिनियम के तहत पंजीकृत इसलिए ट्रिब्यूनल को अधिकार नहीं था. सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट दोनों के आदेश रद्द कर दिए और कहा कि ट्रिब्यूनल के समक्ष साधारण निषेधाज्ञा का मामला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. हालांकि, कोर्ट ने यह सवाल खुला छोड़ा कि संबंधित संपत्ति वक्फ है या नहीं-इस पर कानून के अनुसार उचित मंच पर विचार किया जा सकता है.
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