सुप्रीम कोर्ट का पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव पर सख्त रुख

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सुप्रीम कोर्ट का पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव पर सख्त रुख
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सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव के मामलों पर गंभीर रुख अपनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से इन मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए ठोस नीति बनाने का अनुरोध किया है। कोर्ट ने संवेदनशील मामलों को प्राथमिकता देने और तय समय सीमा में निपटाने पर जोर दिया है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव के मामलों पर गंभीर रुख अपनाया है। बुधवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान इसने दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि वे पूर्वोत्तर के नागरिकों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव जैसे संवेदनशील मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए एक ठोस नीतिगत निर्णय लें। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इनका 'आउट-आफ-टर्न' फैसला होना चाहिए। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम.

पंचोली भी शामिल थे। लंबित मुकदमों और निदो तानिया मामले का उल्लेख सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट का ध्यान दिल्ली के उस चर्चित 2014 के निदो तानिया मामले की ओर खींचा, जिसमें अरुणाचल प्रदेश के 19 वर्षीय छात्र की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। वकील ने दलील दी कि जिन मामलों में जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, वहां भी ट्रायल पूरा होने में बहुत लंबा समय लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से प्रशासनिक स्तर पर इस मुद्दे पर विचार करने का आग्रह किया। कोर्ट ने कहा कि एक ऐसी ''समग्र नीति'' बनाई जानी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि संवेदनशील मुकदमों का निपटारा एक तय समय सीमा के भीतर हो सके। एंजेल चकमा हत्याकांड और भेदभाव के विरुद्ध रुख यह याचिका त्रिपुरा के 24 वर्षीय एमबीए छात्र एंजेल चकमा की नृशंस हत्या की पृष्ठभूमि में दायर की गई थी। 26 दिसंबर, 2025 को देहरादून के सेलाकुई इलाके में एक कथित नस्लीय हमले में चकमा की मौत हो गई थी। वे अपने छोटे भाई के सामने ही चाकू के वार से घायल हुए थे। हालांकि, कोर्ट ने एक अन्य जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें विशेष रूप से पूर्वोत्तर के नागरिकों के लिए सुरक्षा की मांग की गई थी। कोर्ट का मानना था कि नागरिकों को नस्ल, क्षेत्र, लिंग या जाति के आधार पर अलग श्रेणी में पहचानना एक 'प्रतिगामी मार्ग' पर चलने जैसा होगा। इसके बजाय, पीठ ने अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को मामले को उपयुक्त प्राधिकरण के पास भेजने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय की गति तेज करना ही ऐसे अपराधों को रोकने का प्रभावी तरीका है।

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