राजधानी दिल्ली में एलपीजी गैस की कमी का असर अब छोटी दुकानों और रेस्टोरेंट पर साफ देखा जा सकता है। कई छोटी दुकानें बंद होने की कगार पर आ गई हैं तो कई बंद हो चुकी हैं।
नई दिल्ली: दिल्ली में कमर्शल गैस सिलिंडर की भारी किल्लत और कथित कालाबाजारी ने राजधानी के फूड और रेस्टोरेंट कारोबार को गहरी चोट पहुंचानी शुरू कर दी है। हालत यह है कि जिन चूल्हों से रोजाना सैकड़ों लोगों का पेट भरता था, वहां अब सन्नाटा पसरने लगा है। कहीं खाने की रेहड़ियां बंद हो रही हैं, तो कहीं मशहूर रेस्टोरेंट्स के शटर गिरने लगे हैं।LPG गैस की कमी की वजह की 20 से ज्यादा दुकानें बंद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने पहाड़गंज की मुख्य सड़क पर कई रेस्टोरेंट संचालक अब अपना कारोबार पूरी तरह समेटने की कगार पर हैं। रेस्टोरेंट मैनेजर अशोक बताते हैं कि गैस की आपूर्ति न होने से पिछले कुछ दिनों में अकेले इसी इलाके की 20 से ज्यादा दुकानें बंद हो चुकी हैं। उनके पास भी अब केवल एक आखिरी कमर्शल सिलिंडर बचा है और उसके खत्म होते ही उन्हें भी मजबूरन अपनी दुकान बंद करनी पड़ेगी।युद्ध कहीं और यहां गरीबों पर पड़ रही उसकी मारकुछ कर्मचारियों को पहले ही भेजा घर रेस्टोरेंट संचालक रितेश का कहना है कि रोजी-रोटी का सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता, एक व्यक्ति कहीं भी अपना पेट भर सकता है, लेकिन उसके पीछे पूरा परिवार जुड़ा होता है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि युद्ध कहीं और हो रहा है और मार यहां गरीबों पर पड़ रही है। रितेश के रेस्टोरेंट में करीब SO लोग काम करते हैं, जिसका सीधा मतलब है कि रेस्टोरेंट बंद होने से 80 परिवारों की कमाई रुक जाएगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि उन्होंने कुछ कर्मचारियों को पहले ही घर भेज दिया है।कई ने मजबूरी में बदला अपना कामवहीं, अजमेरी गेट इलाके में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। यहां खाने-पीने की कई रेहड़ियां पहले ही बंद हो चुकी है और कई रेहड़ी वाले बंद करने की तैयारी में हैं। कुछ दुकानदारों ने तो गैस न मिलने के कारण हार मानकर अपना काम ही बदल दिया है। एक चाय बेचने वाले ने मजबूरी में चाय का काम बंद कर दही की लस्सी बनाकर बेचना शुरू कर दिया है, जबकि कई रेहड़ी वालों को अपना सामान समेटकर लौटना पड़ा है।'पूरी तरह ठप हो सकता है छोटा फूड कारोबार' दुकानदार गौरव का कहना है कि LPG गैस की कमी के बीच बाजार में कालाबाजारी भी तेजी से बढ़ी है, जिससे छोटे कारोबारियों के लिए सिलिंडर खरीदना लगभग नामुमकिन हो गया है। दुकानदारों का मानना है कि यदि जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली का छोटा फूड कारोबार पूरी तरह ठप हो सकता है। फिलहाल, गैस की किल्लत और बढ़ती लागत के बीच छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले सबसे ज्यादा संकट में हैं और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि चूल्हा कैसे जलेगा और परिवार का पेट कैसे भरेगा।ढाबे पर तवा रोटी और पराठा बनना बंद गैस की किल्लत से छोटे रेस्टोरेंट और ढाबों का कारोबार प्रभावित हो रहा है। चाणक्यपुरी में होटल अशोक के पास अरुणाचल भवन के बाहर एक मशहूर ढाबे पर तवा रोटी और पराठे बनाना बंद करना पड़ा है। कोयले की मदद से आधे-अधूरे मेन्यू के साथ किसी तरह ढाबा चलाया जा रहा है। इस ढाबे से 10 से 12 लोगों का रोजगार जुड़ा है, जिन पर अब बेरोजगारी के बादल मंडरा रहे हैं। '4 हजार रुपये में मिल रहा सिलिंडर'ढाबा मालिक ने बताया कि 5-6 दिनों से काम ठप होने की कगार पर है। सिलिडर 4-4 हजार रुपये में मिल रहा है। हमारी रोजाना तीन सिलिंडरों की खपत है। अब काम जारी रखना संभव नहीं है।' सुबह के पराठे और तवा रोटी का काम बंद कर दिया गया है। केवल कोयले से तंदूरी रोटी ही बनाई जा रही है।खर्च निकालना भी हुआ मुश्किल उन्होंने कहा, रोटी के दाम एक रुपये बढ़ाए है। इसके बावजूद ढाबे का खर्च नहीं निकल रहा है। हम पूरा मेन्यू तैयार भी नहीं कर पा रहे है। ग्राहक को पसंद का खाना नहीं मिलने पर लौट रहे हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर कोयले की भट्टी शुरू की है, लेकिन कोयला भी 40 रूपये किलो के मिल रहा है।स्टाफ को सता रही है छंटनी की चिंताढाबे पर काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि काम सीमित होने से ग्राहकों की सख्या घट गई है। जब लोग आते हैं और उन्हें मेन्यू के अनुसार खाना नहीं मिलता, तो वे वापस चले जाते है। ऐसे में कर्मचारियों को डर सता रहा है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो उनका रोजगार छिन सकता है।छोटी दुकानों पर दिख रहा साफ असर'अरे भाई साहब, घर की गृहस्थी टूट चुकी है। यह दिल्ली शहर है। गांव नहीं, जो जंगल से लकड़ी काट लाएं। दिल्ली वाले अब क्या करेंगे? कहां जाए?' यूपी के हमीरपुर जिले से दिल्ली आकर पिछले 4 साल से चाय बेच रहीं खुशबू झुंझलाहट के साथ अपनी तकलीफ बताने लगती हैं। वह कहती हैं कि एक-दो दिन की गैस बची है। हम भी काम बंद करके चले जाएंगे। पूर्वी दिल्ली से लेकर साउथ दिल्ली तक फुटपाथ पर चल रहे ढाबे और रेहड़ी पर चाय बेचने वालों का यही हाल है। किसी को ब्लैक में गैस सिलिंडर मिल भी रहा है तो 3500 से 4000 रुपये तक देने पड़ रहे हैं। इस कारण उन्हें खाना महंगा करना पड़ा है।फूड आइटम के दाम बढ़े गांधी नगर से शाहदरा जाने वाली सड़क पर महिला कॉलोनी स्कूल के सामने फुटपाथ पर पिछले 10 साल से ढाबा चला रहे विनीत वर्मा बताते हैं कि 4 रोटी, चावल और एक कटोरी दाल की कीमत पहले 35 रुपये थी, लेकिन गैस की किल्लत के कारण कीमत बढ़कर 70-80 रुपये हो गई है। गीता कॉलोनी यमुना पुश्ता पर रेहड़ी पर चाय बेच रहे नरेंद्र और छतरपुर 100 फुटा रोड पर यही काम करने वाले तपे सिंह बताते हैं कि 5 रुपये वाली चाय 10 रुपये में बेचनी पड़ रही है। कई जगह छोटे कप में चाय की कीमत 15 रुपये तक भी हो गई है। दाम बढ़ने से ग्राहकों की संख्या 15 से 20 फीसदी तक कम हो गई है।धीरे से पलायन शुरूसीलमपुर से गांधी नगर, कैलाश नगर और कृष्णा नगर में नॉर्मल रिक्शा चलाने वाले ऐटा के विजय बताते हैं कि उनके कई साथी गांव चले में एक कमरे का किराया कम से कम गए हैं। SO रुपये का एक टाइम का खाना। इतना ही रिक्शा का किराया और 600 रुपये कमरे का किराया देते हैं। झुग्गी-बस्ती 3000 रुपये महीना है। वे 5 लोग उस कमरे में रहते हैं। हर रोज 250 रुपये से अधिक खर्च हो जाते हैं। सुबह से रात तक रिक्शा चलाने में 600 रुपये से ज्यादा नहीं मिलते हैं। हालात ठीक होने के बाद लौटेंगे।.
नई दिल्ली: दिल्ली में कमर्शल गैस सिलिंडर की भारी किल्लत और कथित कालाबाजारी ने राजधानी के फूड और रेस्टोरेंट कारोबार को गहरी चोट पहुंचानी शुरू कर दी है। हालत यह है कि जिन चूल्हों से रोजाना सैकड़ों लोगों का पेट भरता था, वहां अब सन्नाटा पसरने लगा है। कहीं खाने की रेहड़ियां बंद हो रही हैं, तो कहीं मशहूर रेस्टोरेंट्स के शटर गिरने लगे हैं।LPG गैस की कमी की वजह की 20 से ज्यादा दुकानें बंद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने पहाड़गंज की मुख्य सड़क पर कई रेस्टोरेंट संचालक अब अपना कारोबार पूरी तरह समेटने की कगार पर हैं। रेस्टोरेंट मैनेजर अशोक बताते हैं कि गैस की आपूर्ति न होने से पिछले कुछ दिनों में अकेले इसी इलाके की 20 से ज्यादा दुकानें बंद हो चुकी हैं। उनके पास भी अब केवल एक आखिरी कमर्शल सिलिंडर बचा है और उसके खत्म होते ही उन्हें भी मजबूरन अपनी दुकान बंद करनी पड़ेगी।युद्ध कहीं और यहां गरीबों पर पड़ रही उसकी मारकुछ कर्मचारियों को पहले ही भेजा घर रेस्टोरेंट संचालक रितेश का कहना है कि रोजी-रोटी का सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं होता, एक व्यक्ति कहीं भी अपना पेट भर सकता है, लेकिन उसके पीछे पूरा परिवार जुड़ा होता है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि युद्ध कहीं और हो रहा है और मार यहां गरीबों पर पड़ रही है। रितेश के रेस्टोरेंट में करीब SO लोग काम करते हैं, जिसका सीधा मतलब है कि रेस्टोरेंट बंद होने से 80 परिवारों की कमाई रुक जाएगी। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि उन्होंने कुछ कर्मचारियों को पहले ही घर भेज दिया है।कई ने मजबूरी में बदला अपना कामवहीं, अजमेरी गेट इलाके में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। यहां खाने-पीने की कई रेहड़ियां पहले ही बंद हो चुकी है और कई रेहड़ी वाले बंद करने की तैयारी में हैं। कुछ दुकानदारों ने तो गैस न मिलने के कारण हार मानकर अपना काम ही बदल दिया है। एक चाय बेचने वाले ने मजबूरी में चाय का काम बंद कर दही की लस्सी बनाकर बेचना शुरू कर दिया है, जबकि कई रेहड़ी वालों को अपना सामान समेटकर लौटना पड़ा है।'पूरी तरह ठप हो सकता है छोटा फूड कारोबार' दुकानदार गौरव का कहना है कि LPG गैस की कमी के बीच बाजार में कालाबाजारी भी तेजी से बढ़ी है, जिससे छोटे कारोबारियों के लिए सिलिंडर खरीदना लगभग नामुमकिन हो गया है। दुकानदारों का मानना है कि यदि जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली का छोटा फूड कारोबार पूरी तरह ठप हो सकता है। फिलहाल, गैस की किल्लत और बढ़ती लागत के बीच छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले सबसे ज्यादा संकट में हैं और उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि चूल्हा कैसे जलेगा और परिवार का पेट कैसे भरेगा।ढाबे पर तवा रोटी और पराठा बनना बंद गैस की किल्लत से छोटे रेस्टोरेंट और ढाबों का कारोबार प्रभावित हो रहा है। चाणक्यपुरी में होटल अशोक के पास अरुणाचल भवन के बाहर एक मशहूर ढाबे पर तवा रोटी और पराठे बनाना बंद करना पड़ा है। कोयले की मदद से आधे-अधूरे मेन्यू के साथ किसी तरह ढाबा चलाया जा रहा है। इस ढाबे से 10 से 12 लोगों का रोजगार जुड़ा है, जिन पर अब बेरोजगारी के बादल मंडरा रहे हैं। '4 हजार रुपये में मिल रहा सिलिंडर'ढाबा मालिक ने बताया कि 5-6 दिनों से काम ठप होने की कगार पर है। सिलिडर 4-4 हजार रुपये में मिल रहा है। हमारी रोजाना तीन सिलिंडरों की खपत है। अब काम जारी रखना संभव नहीं है।' सुबह के पराठे और तवा रोटी का काम बंद कर दिया गया है। केवल कोयले से तंदूरी रोटी ही बनाई जा रही है।खर्च निकालना भी हुआ मुश्किल उन्होंने कहा, रोटी के दाम एक रुपये बढ़ाए है। इसके बावजूद ढाबे का खर्च नहीं निकल रहा है। हम पूरा मेन्यू तैयार भी नहीं कर पा रहे है। ग्राहक को पसंद का खाना नहीं मिलने पर लौट रहे हैं। वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर कोयले की भट्टी शुरू की है, लेकिन कोयला भी 40 रूपये किलो के मिल रहा है।स्टाफ को सता रही है छंटनी की चिंताढाबे पर काम करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि काम सीमित होने से ग्राहकों की सख्या घट गई है। जब लोग आते हैं और उन्हें मेन्यू के अनुसार खाना नहीं मिलता, तो वे वापस चले जाते है। ऐसे में कर्मचारियों को डर सता रहा है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो उनका रोजगार छिन सकता है।छोटी दुकानों पर दिख रहा साफ असर'अरे भाई साहब, घर की गृहस्थी टूट चुकी है। यह दिल्ली शहर है। गांव नहीं, जो जंगल से लकड़ी काट लाएं। दिल्ली वाले अब क्या करेंगे? 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