किसान अजोला घास की खेती खुद भी कर सकते हैं. इसके लिए ज्यादा जगह या खर्च की जरूरत नहीं होती. इसे पानी की टंकी, टब या छोटे गड्ढे में भी लगाया जा सकता है. एक बार अजोला लगा देने के बाद यह अपने आप बढ़ती रहती है और इसे रोजाना निकाला जा सकता है.
पोल्ट्री फॉर्म चलाने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ा खर्च दाने का होता है. दाना न सिर्फ महंगा है बल्कि कई बार उसकी क्वालिटी भी सही नहीं मिल पाती है. ऐसे में मुर्गियों की ग्रोथ और अंडा उत्पादन दोनों पर असर पड़ता है लेकिन अब इसका एक देसी और सस्ता उपाय सामने आया है.
पोल्ट्री फार्मिंग करने वाले किसान एक खास घास का इस्तेमाल करने लगे हैं, जिससे 70 परसेंट तक उनके दाने का खर्च बच जाता है और उत्पादन भी ज्यादा होता है. हम बात कर रहे हैं अजोला घास की. यह एक ऐसी हरी घास है, जिसे बहुत आसानी से उगाया जा सकता है और यह मुर्गियों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रही है. मध्य प्रदेश के खंडवा के कृषि विज्ञान केंद्र में अजोला घास को बढ़ावा दिया जा रहा है और किसानों को इसकी ट्रेनिंग भी दी जा रही है. लोकल 18 से बातचीत में डॉ आशीष बोबडे बताते हैं कि अजोला घास से दाने पर होने वाला खर्च काफी कम किया जा सकता है. वह कहते हैं, ‘कई पोल्ट्री किसान आज सिर्फ 30 प्रतिशत दाना देते हैं और 70 प्रतिशत अजोला घास का उपयोग कर रहे हैं. इससे मुर्गियों को नैचुरल आहार मिलता है और वे जल्दी बढ़ती हैं.’ डॉ बोबडे बताते हैं कि अजोला घास में प्रोटीन, मिनरल और विटामिन भरपूर मात्रा में होते हैं, जिससे मुर्गियों की सेहत अच्छी रहती है और अंडा देने की क्षमता भी बढ़ती है. कड़कनाथ को कृषि विज्ञान केंद्र खंडवा में अजोला घास खिलाई जाती है,जिससे कड़कनाथ जल्दी बड़ा होता है. मिलावटी दानों के दौर में अजोला घास पोल्ट्री किसानों के लिए एक सुरक्षित और सस्ता विकल्प बनकर सामने आई है, जिससे खर्च भी घटेगा और मुनाफा भी बढ़ेगा. अजोला की खेती किसान खुद भी कर सकते हैं. इसके लिए ज्यादा जगह या खर्च की जरूरत नहीं होती है. इसे पानी की टंकी, टब या छोटे गड्ढे में भी लगाया जा सकता है. एक बार अजोला घास लगा देने के बाद यह अपने आप बढ़ती रहती है और इसे रोजाना निकाला जा सकता है.
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