विकसित भारत: एक दीर्घकालिक संकल्पना

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विकसित भारत: एक दीर्घकालिक संकल्पना
विकसित भारतराष्ट्रीय विकासप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
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लेख 'विकसित भारत' शब्द के अर्थ, महत्व और उसका भारत के भविष्य पर प्रभाव पर चर्चा करता है। यह तीन परिवर्तनकारी दीर्घ क्षणों में से एक है, जो राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को परिभाषित करता है। विकसित भारत, आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और ज्ञान के क्षेत्र में प्रगति का प्रतीक है। यह विकास की विभिन्न परिभाषाओं को समाहित करता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, खुशी, समरसता और आध्यात्मिक उन्नयन शामिल हैं।

बद्री नारायण। आजकल विकसित भारत शब्द विमर्श के केंद्र में है। प्रश्न उठता है कि विकसित भारत क्या है? क्या यह मात्र एक शब्द है? या राजनीति क प्रतीक है? क्या यह नारा है? क्या यह एक भविष्यपरक लक्ष्य है? क्या यह राष्ट्र निर्माण का एक परिवर्तनकारी मिशन है? गहराई से व्याख्या करें तो भारतीय आधुनिक इतिहास में तीन परिवर्तनकारी दीर्घ क्षण दिखते है-पहला गांधीजी का भारत की आजादी का मिशन, आजादी के बाद राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के लक्ष्यों को लागू करने का मिशन और तीसरा क्षण है विकसित भारत का मिशन, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संकल्पित किया है। विकसित भारत एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। यदि इसे प्रतीक के रूप में देखें तो यह एक विकासपरक प्रतीक है, जिसमें विकसित देशों की श्रेणी में आना एक लक्ष्य है। विकसित देशों में विकास के जितने भी मानक हैं- स्वास्थ्य , शिक्षा , गुणात्मक जीवन, सुख, खुशी, समरसता इत्यादि के आधार पर शीर्ष पर पहुंचने की प्रतिबद्धता के भाव इस संकल्पना में समाहित हैं। विकसित भारत के इस प्रतीक में विकास की आधारभूत संरचनाओं के निर्माण के साथ ही समाज की बेहतरी के लिए सुविधाएं, संचार एवं बाजार का जनोपयोगी विकास भी करना होगा। इस प्रकार, एक प्रतीक के रूप में विकसित भारत विकास के अनेक रूपों यथा आर्थिक विकास , सांस्कृतिक विकास, सुख एवं संतोष की प्राप्ति, आध्यात्मिक उन्नयन, ज्ञान जगत में शीर्ष कोटि प्राप्त करने के लक्ष्य को खुद में शामिल किए हुए है। अगर आप विकसित भारत की इस प्रक्रिया को देखेंगे तो जाहिर होगा कि सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिये जहां शिक्षा के मोर्चे पर आशातीत परिणाम हासिल करने की प्रतिबद्धता प्रदर्शित हो रही है, वहीं जन स्वास्थ्य के स्तर पर सभी कड़ियों को मजबूत बनाने के लिए कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाकर स्वस्थ भारत के लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। आधारभूत संरचना के लिए भी हाईवे और एक्सप्रेसवे निर्माण से देश के कोने-कोने को जोड़ने का काम द्रुत गति से जारी है। धार्मिक एवं अध्यात्मिक स्थलों को विकसित कर श्रद्धालुओं की सुविधाजनक तीर्थ यात्रा को संभव किया जा रहा है। विकसित भारत मिशन के लिए समर्पित रणनीतियों से जाहिर है कि आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सैन्य शक्ति से युक्त भारत ही विकसित भारत का आधार बनेगा। विकसित भारत पीएम मोदी के ‘पंच प्रण’ पर आधारित है। इस पंच प्रण में विकसित भारत का लक्ष्य, गुलामी की हर एक स्मृति एवं प्रतीक से मुक्ति, अपनी विरासत पर गर्व, एकता की शक्ति, नागरिकों में कर्तव्य बोध जागरण जैसे तत्व समाहित हैं। हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डा.

मोहन भागवत ने सांस्कृतिक आजादी की बात की तो कुछ वर्गों ने उनकी आलोचना की। इस प्रक्रिया में हम भूल गए कि दुनिया की हर राजनीतिक आजादी धीरे-धीरे अपने लिए विभिन्न चरणों में सामाजिक एवं सांस्कृतिक आजादी प्राप्त कर एक प्रभावी एवं विकसित राष्ट्र का निर्माण करती ही है। दुनिया भर के देशों की मुक्ति का इतिहास देखें तो जाहिर होगा कि आजादी प्राप्ति के बाद भी ऐसे अनेक औपनिवेशिक राष्ट्रों को अपने मानस, संस्कृति एवं समाज को विऔपनिवेशीकृत करने के लिए प्रयास करने पड़े। ऐसे तमाम विवरण केन्या के प्रसिद्ध लेखक आंगुगी बाच्योंगो की पुस्तक ‘डिकोलोनाइजिंग माइंड’ में उल्लिखित हैं। स्पष्ट है कि विकसित भारत मिशन एवं गुलामी की संस्कृति से सांस्कृतिक मुक्ति का अभियान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विकसित भारत एक सुखद भविष्य की आशा का प्रतीक है, जिसमें भारत के भविष्य की दीर्घकालिक दृष्टि दिखती है। वस्तुतः भारतीय इतिहास का यह तीसरा चरण, जो विकसित भारत का चरण है, इस रूप में महत्वपूर्ण है कि इसमें पहली बार महात्मा गांधी के बाद किसी भारतीय राजनेता ने देश के भविष्य की दीर्घकालिक संकल्पना प्रस्तुत की है। अतीत में नेताओं ने ‘भारत भविष्य’ को पंचवर्षीय योजनाओं में बांट रखा था। यह खंडित भविष्य की संकल्पना थी, जिसे पीएम मोदी ने विकसित भारत के एक दीर्घकालीन सुसंगत भविष्य की रूपरेखा एवं कार्ययोजना के रूप में प्रस्तुत किया है। विकसित भारत की संकल्पना मुख्य रूप से दो आधारों पर टिकी है। इसमें पहला आधार है आकांक्षी भारत और दूसरा आशाओं से उद्भूत भारत। विकसित होने की आकांक्षा ही वह भावनात्मक शक्ति होती है, जो किसी भी राष्ट्र को विकसित बनाती है। बीते एक दशक में पीएम मोदी के अनेक संबोधनों एवं कार्यों ने जनता में विकसित होने की अदम्य अभिलाषा विकसित की है। यह अभिलाषा आधार तल से शीर्ष तक सभी जनसमूहों में समान रूप से दिखती है। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं ने भी गरीब एवं अति पिछड़े लोगों में आकांक्षा की भावना पैदा की है। यही आकांक्षा भाव लोगों में विकास के परम लक्ष्य के लिए समर्पित होने की कामना पैदा करता है। इस प्रकार विकसित भारत के दो मूल तत्व आशा एवं आकांक्षा हैं। आशा एवं आकांक्षा मिलकर लोगों में भविष्य का बोध जागृत करती हैं। यही भविष्य का बोध आज के विकसित भारत का मूलाधार है, जो आर्थिक, सांस्कृतिक, ज्ञान एवं अध्यात्म के क्षेत्र में भारत की प्रगति में परिलक्षित हो रहा है।

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