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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मलयालम भाषा के संवर्धन और पोषण के लिए केरल विधानसभा द्वारा पारित भाषाई विधेयक को मंजूरी देने से इनकार कर दिया है.हालांकि, राष्ट्रपति द्वारा इस विधेयक को मंजूरी देने से इनकार करने का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है.
लेकिन इस निर्णय से मलयालम भाषा को लेकर लगभग एक दशक पहले शुरू हुए विधायी प्रयास का अंत हो गया है. मूल रूप से दिसंबर 2015 में पारित इस विधेयक में 1969 के आधिकारिक भाषा अधिनियम के प्रावधानों को बदलने की मांग की गई थी, जो मलयालम या अंग्रेजी को केरल की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देता है. विधेयक में इसे निरस्त कर केवल मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाने पर जोर दिया गया था. इस संबंध में राजभवन के उप सचिव आरके मदु ने साउथ फर्स्ट को बताया कि राष्ट्रपति द्वारा सीधे राज्यपाल को सूचना दी गई है. उन्होंने कहा, ‘हम मेल का विश्लेषण करने के बाद अधिक विवरण साझा करेंगे.’ इस मामले पर कवि और मुख्यमंत्री की प्रेस सचिव प्रभा वर्मा ने कहा कि सरकार विधेयक को मंजूरी न देने के फैसले के पीछे के सटीक कारण को समझने के बाद प्रतिक्रिया देगी.इस विधेयक में कई सुधारों का प्रस्ताव किया गया है, जिसमें स्कूलों में मलयालम को पहली भाषा बनाना, राज्यपाल द्वारा जारी किए गए विधेयकों, कानूनों और आदेशों में इसका उपयोग अनिवार्य करना और अर्ध-न्यायिक निकायों और राज्य लोक सेवा आयोग परीक्षाओं में इसे आधिकारिक भाषा के रूप में पेश करना आदि शामिल हैं. इस प्रस्ताव में सचिवालय के सिविल सेवा सुधार विभाग के तहत मलयालम भाषा विकास विभाग के निर्माण की भी मांग की गई है.मालूम हो कि राज्य में भाषाई अल्पसंख्यकों, खास तौर पर तमिल और कन्नड़ बोलने वालों के लिए बिल के निहितार्थों पर चिंता जताते हुए तत्कालीन राज्यपाल जस्टिस पी. सदाशिवम ने इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था. विधि विभाग ने भी इस तरह के कदम की सलाह दी थी, जिसमें तर्क दिया गया था कि बिल के कुछ हिस्से भाषाई अधिकारों की रक्षा करने वाले मौजूदा संसदीय कानूनों के साथ टकराव कर सकते हैं. गृह मंत्रालय द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब में केरल सरकार ने 1 अप्रैल 2024 को राज्यपाल के माध्यम से स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया था. इसके बावजूद राष्ट्रपति ने आखिरकार इस विधेयक को मंजूरी नहीं देने का फैसला किया. अब राज्यपाल से उम्मीद की जा रही है कि वे राष्ट्रपति के फैसले के साथ विधेयक को राज्य सरकार को वापस कर देंगे. उल्लेखनीय है कि केरल में लगातार सरकारों ने समय-समय पर आधिकारिक संचार के लिए मलयालम का उपयोग करने के आदेश जारी किए हैं. इसी उद्देश्य से ‘भरणभाषा मलयालम’ नीति लागू की गई थी.इस संंबंध में थुंचत एझुथचन मलयालम विश्वविद्यालय में भाषा अनुसंधान केंद्र की निदेशक स्मिता के. नायर ने बिना कोई स्पष्टीकरण दिए विधेयक को अस्वीकार करने के राष्ट्रपति के फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है. साउथ फर्स्ट से बात करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अस्वीकृति में औचित्य का अभाव है, खासकर भाषाई समावेशिता के लिए केरल की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को देखते हुए. उन्होंने कहा, ‘केरल आधिकारिक भाषा अधिनियम 1969 ने मलयालम और अंग्रेजी को राज्य की आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता दी. हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 1973 में एक संशोधन पारित किया गया था, जिसमें तमिल और कन्नड़ बोलने वालों जैसे भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए प्रावधान शामिल थे, जिससे उन्हें राज्य सरकार के साथ अपनी संबंधित भाषाओं में संवाद करने की अनुमति मिली. इसलिए भाषाई बहिष्कार के आधार पर विधेयक को खारिज करना सही नहीं है.’स्मिता ने तमिलनाडु के आधिकारिक अनुवाद विभाग द्वारा निभाई गई सक्रिय भूमिका पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा, ‘वहां, हर नए शब्द का, यहां तक कि प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों में भी, जल्दी से अनुवाद और मानकीकरण किया जाता है. दुर्भाग्य से केरल इस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है.’ वास्तविक दुनिया का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे मोटर वाहन विभाग के संबंध में ‘स्पीड गवर्नर’ शब्द का व्यापक रूप से उपयोग होने पर विभिन्न मलयालम अनुवाद प्रस्तावित किए गए थे. उन्होंने कहा, ‘शुरू में ‘वेगा मापिनी’ और ‘वेगा मापकम’ जैसे शब्द अलग-अलग मीडिया आउटलेट्स द्वारा सुझाए गए थे, लेकिन वे लोकप्रिय नहीं हुए. अंत में, ‘वेगा पूट’ शब्द सामने आया और इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया गया और आज भी इसका उपयोग किया जाता है. यह दर्शाता है कि मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए सुलभ और समय-प्रासंगिक अनुवादों को गढ़ना कितना महत्वपूर्ण है.’ स्मिता ने विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में इस्तेमाल किए जाने वाले मलयालम शब्दों की जटिलता की भी आलोचना की. उन्होंने सुझाव दिया कि अधिक पाठक-अनुकूल शब्दावली सीखने के परिणामों और भाषा में रुचि को बढ़ा सकती है. उन्होंने मलयालम को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार के चल रहे प्रयासों को स्वीकार किया. उनके अनुसार, ‘2015 में जब विधेयक पारित हुआ था, तब भी लगभग 77 सरकारी विभागों, 65 सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और 31 स्वायत्त निकायों में मलयालम आधिकारिक भाषा थी. ये महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन सभी क्षेत्रों में मलयालम की भूमिका को मजबूत करने के लिए हमें अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है.’उत्तराखंड: अंकिता भंडारी हत्याकांड में भाजपा के पूर्व मंत्री के बेटे समेत तीन दोषी क़रार, उम्रक़ैदकर्नाटक हाईकोर्ट ने भाजपा नेता से पाकिस्तान संबंधी टिप्पणी पर पुलिस अधिकारी से माफ़ी मांगने को कहा
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