संपादकीय: राजनीति की भाषा
संपादकीय: राजनीति की भाषा जनसत्ता March 9, 2019 2:56 AM सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। राजनीतिक दलों का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और व्यंग्य बाण चलाना कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में असहमति बड़ा गुण माना जाता है, पर कई बार जब राजनेता दुर्भावनावश या घृणाभाव से अपने प्रतिपक्षी के प्रति अशोभन भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो स्वाभाविक ही उनके आचरण पर अंगुलियां उठने लगती हैं। चुनाव के वक्त राजनेताओं की भाषा अक्सर तल्ख हो उठती है, पर पिछले कुछ सालों से इसमें जिस तरह की तल्खी देखी जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। बहुत सारे लोग उससे प्रेरणा लेते और फिर उसके आचरण को समाज के निचले स्तर पर प्रसारित करते हैं। मगर अफसोस कि कई राजनेता अपने विपक्षी पर वार करने की धुन में अपने पद की गरिमा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाते। इस बार आसन्न चुनाव के मद्देनजर यह प्रवृत्ति कुछ अधिक उभर कर आई दिखती है। इस पर उचित ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने एतराज जताया है। हालांकि उनका आरोप सत्तापक्ष पर ऐसी भाषा के उपयोग को लेकर है, पर ध्यान देने की बात है कि इस मामले में शायद ही कोई राजनीतिक दल पीछे है। जब पड़ोसी देश पर टिप्पणी करनी हो तो जैसे सबकी पौ-बारह हो जाती है। हमारे यहां ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का जनाधार जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता पर टिका हुआ है। वे उन्हीं की राजनीति करते हैं। इसलिए केंद्र या राज्य में अपने प्रतिद्वंद्वी दल की सरकार पर अक्सर उनका तल्खी भरा बयान ही सुनने को मिलता है। उत्तर प्रदेश, बिहार के क्षेत्रीय दल इस मामले में ज्यादा मुखर नजर आते हैं। चाहे सपा-बसपा-राजद हों या दूसरे दल, उनके नेता कड़वी भाषा का इस्तेमाल करके ही अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करते हैं। इस तरह यह परिपाटी-सी बनती गई कि अपने प्रतिपक्षी पर प्रहार करना है, तो कड़वी और अशोभन भाषा का उपयोग करना ही चाहिए। ऐसी भाषा जब छुटभैए नेता ग्रहण करते हैं, तो उसे और विकृत करते हैं। विवेकहीन तरीके से तथ्यों को पेश करते, मतदाताओं को बरगलाने का प्रयास करते और कई बार गाली-गलौज तक की भाषा बोलने लगते हैं। यह लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली प्रवृत्ति है। मगर हैरानी की बात कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को भाषा के मामले में संयम और शालीनता बरतने की सीख नहीं देता। कई बार ऐसे नेता अपने वरिष्ठों से पुरस्कृत होते देखे जाते हैं, जो अपने विपक्षी के खिलाफ तल्ख और अशोभन भाषा का उपयोग करते हैं। आम जनजीवन की भाषा को बनाना अच्छी बात है, पर उसकी मर्यादा का ध्यान न रखना असंवैधानिक है। मगर शायद हमारे राजनेताओं ने मान लिया है कि मतदाताओं को वही भाषा पसंद आती है, उसी भाषा में दिए बयान उन्हें प्रभावित करते हैं, जिसमें कुछ अशोभन और तल्ख शब्दों का समावेश हो। नहीं तो कोई और कारण नहीं हो सकता कि सत्ता के शीर्ष नेतृत्व की भाषा में भी संयम नहीं दिखाई देता। भाषा में भड़काऊपन, आक्रामकता और अशालीनता कहीं न कहीं राजनीति को कमजोर करते हैं। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App.
संपादकीय: राजनीति की भाषा जनसत्ता March 9, 2019 2:56 AM सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। राजनीतिक दलों का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप और व्यंग्य बाण चलाना कोई नई बात नहीं है। लोकतंत्र में असहमति बड़ा गुण माना जाता है, पर कई बार जब राजनेता दुर्भावनावश या घृणाभाव से अपने प्रतिपक्षी के प्रति अशोभन भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो स्वाभाविक ही उनके आचरण पर अंगुलियां उठने लगती हैं। चुनाव के वक्त राजनेताओं की भाषा अक्सर तल्ख हो उठती है, पर पिछले कुछ सालों से इसमें जिस तरह की तल्खी देखी जा रही है, वह लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। सार्वजनिक जीवन में नेता का आचरण काफी मायने रखता है। बहुत सारे लोग उससे प्रेरणा लेते और फिर उसके आचरण को समाज के निचले स्तर पर प्रसारित करते हैं। मगर अफसोस कि कई राजनेता अपने विपक्षी पर वार करने की धुन में अपने पद की गरिमा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रख पाते। इस बार आसन्न चुनाव के मद्देनजर यह प्रवृत्ति कुछ अधिक उभर कर आई दिखती है। इस पर उचित ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डीपी त्रिपाठी ने एतराज जताया है। हालांकि उनका आरोप सत्तापक्ष पर ऐसी भाषा के उपयोग को लेकर है, पर ध्यान देने की बात है कि इस मामले में शायद ही कोई राजनीतिक दल पीछे है। जब पड़ोसी देश पर टिप्पणी करनी हो तो जैसे सबकी पौ-बारह हो जाती है। हमारे यहां ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का जनाधार जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता पर टिका हुआ है। वे उन्हीं की राजनीति करते हैं। इसलिए केंद्र या राज्य में अपने प्रतिद्वंद्वी दल की सरकार पर अक्सर उनका तल्खी भरा बयान ही सुनने को मिलता है। उत्तर प्रदेश, बिहार के क्षेत्रीय दल इस मामले में ज्यादा मुखर नजर आते हैं। चाहे सपा-बसपा-राजद हों या दूसरे दल, उनके नेता कड़वी भाषा का इस्तेमाल करके ही अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास करते हैं। इस तरह यह परिपाटी-सी बनती गई कि अपने प्रतिपक्षी पर प्रहार करना है, तो कड़वी और अशोभन भाषा का उपयोग करना ही चाहिए। ऐसी भाषा जब छुटभैए नेता ग्रहण करते हैं, तो उसे और विकृत करते हैं। विवेकहीन तरीके से तथ्यों को पेश करते, मतदाताओं को बरगलाने का प्रयास करते और कई बार गाली-गलौज तक की भाषा बोलने लगते हैं। यह लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली प्रवृत्ति है। मगर हैरानी की बात कि कोई भी राजनीतिक दल अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को भाषा के मामले में संयम और शालीनता बरतने की सीख नहीं देता। कई बार ऐसे नेता अपने वरिष्ठों से पुरस्कृत होते देखे जाते हैं, जो अपने विपक्षी के खिलाफ तल्ख और अशोभन भाषा का उपयोग करते हैं। आम जनजीवन की भाषा को बनाना अच्छी बात है, पर उसकी मर्यादा का ध्यान न रखना असंवैधानिक है। मगर शायद हमारे राजनेताओं ने मान लिया है कि मतदाताओं को वही भाषा पसंद आती है, उसी भाषा में दिए बयान उन्हें प्रभावित करते हैं, जिसमें कुछ अशोभन और तल्ख शब्दों का समावेश हो। नहीं तो कोई और कारण नहीं हो सकता कि सत्ता के शीर्ष नेतृत्व की भाषा में भी संयम नहीं दिखाई देता। भाषा में भड़काऊपन, आक्रामकता और अशालीनता कहीं न कहीं राजनीति को कमजोर करते हैं। Hindi News से जुड़े अपडेट और व्यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App
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