Uttar Pradesh (UP) Rajneeti Ki Rangbhoomi Kalyan Singh Political Controversy Explained; राजनीति में कुछ नेता इतिहास बना देते हैं और कुछ खुद इतिहास पुरुष बन जाते हैं। खेत की मिट्टी ने निकला एक किसान का बेटा सत्ता के शिखर पर पहुंच गया। एक नेता जिसकी पहचान सीधे बोलने वाले और फैसलों पर अडिग रहने वाले राजनेता की...
कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद बचाने का वादा किया, गिरने पर तिहाड़ गए; लिखकर दिया- कारसेवकों पर गोली नहीं चलेगीराजनीति में कुछ नेता इतिहास बना देते हैं और कुछ खुद इतिहास पुरुष बन जाते हैं। खेत की मिट्टी ने निकला एक किसान का बेटा सत्ता के शिखर पर पहुंच गया। एक नेता, जिसकी पहचान सीधे बोलने वाले और फैसलों पर अडिग रहने वाले राजनेता की रही, नाम है कल्याण सिंह।‘राजनीति की रंगभूमि’ में आज कहानी उस नेता की, जिसने 'मंडल-कमंडल' की राजनीति साधकर यूपी में पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उतार-चढ़ाव आए, रास्ते बदले, लेकिन कल्याण सिंह की पहचान हमेशा बनी रही…शाम ढल चुकी थी, लेकिन भाजपा दफ्तर में सियासी हलचल तेज थी। उत्तर प्रदेश में पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था। ये सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि समूचे भारत की राजनीति में एक बड़ा मोड़ था। पार्टी दफ्तर के कमरे में देर रात तक बैठक चल रही थी। ये जश्न नहीं, सत्ता और जिम्मेदारी तय करने का वक्त था।दूसरे ने तुरंत जोड़ा-बैठक में भाजपा के सभी सीनियर नेता मौजूद थे। लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी। यूपी भाजपा के अध्यक्ष कल्याण सिंह भी कमरे में थे। चेहरा शांत, नजर नीचे।एक पल के लिए खामोशी छा गई। फिर किसी ने मंडल कमीशन का जिक्र छेड़ दिया।“मंदिर आंदोलन भी आगे बढ़ाना है। बदले समीकरणों में ये सब आसान नहीं होगा।”कई निगाहें एक साथ कल्याण सिंह पर टिक गईं, लेकिन वो अब भी शांत थे। तभी कुर्सी खिसकने की आवाज आई। अटल बिहारी वाजपेयी खड़े हो गए। कमरे में अचानक सन्नाटा गहरा गया। अटल जी मुस्कुराए और टेबल पर रखे मिठाई के डिब्बे की तरफ बढ़े।“बैठे रहिए।”कल्याण सिंह एक पल के लिए ठिठक गए, फिर लड्डू खाया। न कोई प्रस्ताव रखा गया, न वोटिंग हुई। एक लड्डू ने सब साफ कर दिया। संदेश स्पष्ट था, उत्तर प्रदेश की कमान अब किसके हाथ में जाने वाली है।को लखनऊ राजभवन में कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री की शपथ ली। राजभवन का गांधी सभागार भरा हुआ था। शपथ के बाद कल्याण सिंह ने हाथ जोड़कर कहा-लखनऊ राजभवन में शपथ लेने के बाद कल्याण सिंह पूरे मंत्रिमंडल के साथ अयोध्या रवाना हो गए और वहां राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया। कुछ ही घंटों में ये दिखने भी लगा। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह शपथ लेने के बाद पूरे मंत्रिमंडल समेत अयोध्या पहुंच गए। एक मंत्री ने धीरे से पूछा-“जिस संकल्प पर सरकार बनी है, वो याद दिलाना जरूरी है।”“कानून के दायरे में रहकर जो होगा, वही होगा।”“कारसेवा रुकी, तो बेकार सेवा शुरू होगी।”की जुलाई आ गई। अयोध्या समेत पूरे देश में हलचल तेज हो गई थी। विश्व हिंदू परिषद ने 9 जुलाई को चबूतरा बनाने के लिए कारसेवा शुरू कर दी। मामला गरमाता जा रहा था। 15 जुलाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्काल कारसेवा रोकने का आदेश कर दिया।VHP प्रमुख अशोक सिंघल को विश्वास दिलाया गया कि प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव खुद मामले को देखेंगे। तीन महीने में बातचीत करके मुद्दे का हल निकाला जाएगा। तमाम मान-मनौव्वल के बाद 26 जुलाई को कारसेवा रोक दी गई।देखते-देखते तीन महीने बीत गए, अक्टूबर आ गया। अशोक सिंघल ने साफ कह दिया-अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं था। माहौल इतना गरमा गया कि दिल्ली तक हलचल मच गई। सुप्रीम कोर्ट में जज ने सख्त आवाज में पूछा-लखनऊ में खलबली मच गई। सचिवालय में अधिकारियों के दिमाग में बस एक ही सवाल गूंज रहा था।केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रवाई न होने पर VHP प्रमुख अशोक सिंघल ने 6 दिसंबर, 1992 से कारसेवा दोबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। कल्याण सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा पेश किया। सरकार के वकील ने कहा- “बाबरी मस्जिद को कुछ नहीं होगा। हम इसकी पूरी गारंटी लेते हैं।”“सरकार गारंटी ले रही है तो ठीक है…।”“बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होगी। एक पत्थर भी गिरा, तो जवाबदेही होगी।” उधर, कारसेवा को लेकर VHP को रोकने या कम से कम उसकी दिशा मोड़ने की कोशिशें चलती रहीं। बातचीत का सहारा लिया गया, आश्वासन दिए गए। फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ। 3 दिसंबर से ही हजारों कारसेवकों का हुजूम अयोध्या पहुंचने लगा। 5 दिसंबर तक भाजपा-VHP के लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी, विनय कटियार जैसे नेता अयोध्या पहुंच चुके थे।मुख्यमंत्री आवास के गेस्ट रूम में खामोशी थी। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आ रही थी। वो अखबार पलटते हुए बुदबुदाए-फिर अपने पीए की तरफ देखा और बोले-“सर, स्थिति कंट्रोल में है। आप चिंता मत कीजिए।”घड़ी पर नजर गई। 10 बज चुके थे। इतने में दरवाजा खुला। स्वास्थ्य मंत्री सूर्यप्रताप शाही कमरे में दाखिल हुए-उनके साथ राजस्व राज्य मंत्री बालेश्वर त्यागी भी आए थे। उन्हें देखते ही कल्याण सिंह बोले-तीनों पहली मंजिल पर बने टिनशेड में बैठ गए। दिसंबर की हल्की धूप थी। सूर्यप्रताप ने कहा-बातचीत चल ही रही थी कि दो अन्य मंत्री राजेंद्र गुप्ता और लालजी टंडन भी आ पहुंचे। गुप्ता ने CM को देखते ही कहा-“सुना है कुछ कारसेवक गुंबद पर चढ़ गए हैं।”3-4 दिसंबर से ही अयोध्या में कारसेवक जमा होने लगे थे। 6 दिसंबर को भीड़ इतनी बढ़ गई कि पुलिस के काबू से बाहर हो गई। “यहां फोन नहीं है। चलिए नीचे चलते हैं।”“जी सर।”फोन रखते ही दूसरा फोन बजा। एक अधिकारी ने कंफर्म किया-कमरे का माहौल भारी हो गया। कल्याण सिंह ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-“भाईसाब, अटल जी का फोन है।”“कल्याण सिंह जी, खबरें ठीक नहीं हैं। कोई भी कदम बहुत संभलकर उठाइएगा।” कुछ देर बात हुई और फोन कट गया। कुछ देर बाद फिर घंटी बजी। कल्याण सिंह ने खुद फोन उठाया। उधर से लालकृष्ण आडवाणी की आवाज आई-फोन कटा तो कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर मंत्रियों और विधायकों की आवाजाही बढ़ चुकी थी। अंदर फैसलों का बोझ और भारी होता जा रहा था। हर फोन के साथ कमरे की हवा और तल्ख हो रही थी, जैसे इतिहास करवट लेने वाला हो। उधर, अयोध्या में कारसेवकों की भीड़ उग्र होती जा रही थी। कुछ लोग बाबरी मस्जिद के ऊपर चढ़ गए। उनके हाथों में हथौड़े, कुदालें, लोहे की रॉड थीं। प्रदेश के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस एसएन त्रिपाठी को इसकी खबर मिली तो तुरंत CM आवास पहुंचे।“मुझे मुख्यमंत्री जी से तुरंत मिलना है।” उन्हें थोड़ी देर रुकने के लिए कहा गया। कुछ देर बाद कल्याण सिंह से उनकी मुलाकात हुई। कमरे का माहौल बोझिल था। त्रिपाठी ने बोलना शुरू किया तो उनकी आवाज में घबराहट साफ झलक रही थी-पलभर चुप रहकर कल्याण सिंह बोले- “जैसी खबरें आ रही हैं, मुझे नहीं लगता कि वहां जाकर कोई ठोस कार्रवाई हो सकेगी। मेरा सुझाव है, आप यहीं से निर्देश दें।” इसी बीच गृह सचिव और मुख्य सचिव भी पहुंच चुके थे। अब बारी फैसले की थी। अधिकारियों ने एक-एक करके सुझाव देने शुरू किए। DGP त्रिपाठी ने साफ कहा-कल्याण सिंह चुपचाप सुनते रहे। DGP ने जैसे ही ये बात कही उन्होंने सख्त आवाज में कहा-“कागज-पेन लेकर आइए। बाद में कोई परेशानी न हो, इसलिए लिखित आदेश लीजिए।” गृह सचिव बाहर गए। कुछ देर बाद एक फाइल लेकर लौटे। कल्याण सिंह ने फाइल खोली, पेन उठाया साइन कर दिए। कागज पर साफ लिखा था-फैसला हो चुका था। अब बहस की कोई जगह नहीं थी। इसके बाद सभी अधिकारी उस फैसले को लागू करने के लिए निकल गए, जो इतिहास का हिस्सा बनने वाला था। कल्याण सिंह के प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण उस दिन सीएम हाउस में थे। कल्याण सिंह के साथ हालात पर नजर रखे हुए थे।“एसबी चव्हाण बोल रहा हूं। तुरंत मुख्यमंत्री जी से बात कराइए।” दिल्ली से गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने खुद फोन किया था। कुछ ही देर में टेलीफोन कल्याण सिंह के हाथ में था। चव्हाण ने तीखे लहजे में सवाल किया-कल्याण सिंह के इस जवाब से आवाज और ऊंची हो गई। उधर से आवाज आई-फोन के इस सिरे पर एक पल की चुप्पी छा जाती है, फिर कल्याण सिंह ने कहा-इतना सुनते ही चव्हाण लगभग झल्ला पड़े-चव्हाण साब, मेरी ये बात रिकॉर्ड कर लीजिए। रामभक्तों पर गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा, गोली नहीं चलाऊंगा।” कुछ देर बाद खबर मिली कि कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद का एक गुंबद गिरा दिया है। ये सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। उस समय लालजी टंडन समेत कई मंत्री और भाजपा नेता मौजूद थे। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह गुस्से से उबल रहे थे। उन्हें लग रहा था कि बड़े नेताओं ने उनसे बहुत सी बातें छिपाए रखीं। उधर, अयोध्या में पहला गुंबद गिरते ही हालात अचानक बदल गए थे। लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, मुरली मनोहर जोशी और तमाम बड़े नेता कारसेवा वाली जगह से विनय कटियार के घर पहुंच चुके थे। वहां आगे की रणनीति पर चर्चा शुरू हो चुकी थी। तभी फोन की घंटी बजी। कल्याण सिंह ने लालकृष्ण आडवाणी से बात करने के लिए फोन किया था। कल्याण सिंह बोले-आडवाणी ने जवाब दिया-“मैं इस्तीफा देने जा रहा हूं। ये सब मेरी जानकारी के बगैर हुआ है।”नहीं, अभी इस्तीफा मत दीजिए। अगर ऐसा किया तो केंद्र राष्ट्रपति शासन लगा देगा। केंद्रीय बल मोर्चा संभाल लेंगे।फोन कट गया, लेकिन कल्याण सिंह की नाराजगी कम नहीं हुई थी। उनके मन में वही सवाल घूम रहा था। “अगर सब अचानक हुआ, तो बड़े नेता इतनी जल्दी वहां से क्यों निकल गए?” “अगर ये पहले से तय था, तो मुझे क्यों नहीं बताया गया?” कल्याण सिंह ने इस्तीफा देने का मन बना लिया था। कमरे में फिर चर्चा शुरू हुई। फिर भी एक कठिन सवाल खड़ा था, इस्तीफा देने के लिए पत्र में कारण क्या लिखा जाए? बातचीत के बीच किसी ने कहा-“आगे हालात क्या हों, कोई नहीं जानता। मेरी राय है, इस्तीफे में कोई कारण न लिखा जाए।” वो पेशे से वकील थे। उनकी ये बात सबको ठीक लगी। कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथ से इस्तीफा लिखा। साइन कर ही रहे थे कि खबर आई, तीसरा गुंबद भी गिर चुका है।शाम करीब साढ़े पांच बजे। कल्याण सिंह पूरी कैबिनेट के साथ राजभवन पहुंचे और राज्यपाल बी.
सत्यनारायण रेड्डी को इस्तीफा सौंपा दिया। बाहर पत्रकार इंतजार कर रहे थे। ‘पूर्व CM’ बाहर आए तो सवाल उछला-कल्याण सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप गाड़ी में बैठे और CM आवास की ओर रवाना हो गए। कुछ देर बाद खबर आई, केंद्र ने कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त करके प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया है।“जिस मकसद से ये सरकार बनी थी, वो पूरा हुआ। मंदिर के लिए ऐसी एक नहीं, कई सरकारों को ठोकर मारने को तैयार हूं।”“मेरे ऊपर केस करो, जेल भेजो। किसी और को दोषी मत ठहराओ।”की बन गई। कुछ दिन बाद मोहम्मद असलम नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। आरोप लगाया कि तब की कल्याण सिंह सरकार ने कोर्ट के आदेश की अवहेलना की और गंभीर लापरवाही बरती।पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अयोध्या मामले में कोर्ट की अवमानना की थी।”की सजा सुनाई गई। आदेश आ चुका था। अब सवाल था, आदेश लागू कौन करेगा...? सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार एलसी भादू ने दिल्ली पुलिस के DCP एचपीएस वर्क को बुलाया।“माफ कीजिए सर, ये मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।” रजिस्ट्रार ने भौंहें सिकोड़ीं, पलभर सोचा, फिर हां में सिर हिला दिया। अब तिलक रोड थाने के SHO को बुलाया गया। रजिस्ट्रार भादू ने आदेश थमाया-SHO ने टीम तैयार की और सरदार पटेल रोड पर यूपी भवन की ओर बढ़ चले। वहीं से कल्याण सिंह की गिरफ्तारी हुई और उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। उस समय किरण बेदी तिहाड़ जेल की महानिदेशक थीं। उनके सामने एक व्यावहारिक और अहम सवाल था- एक दिन की जेल का मतलब क्या है? किरण बेदी ने सुप्रीम कोर्ट से गाइडेंस मांगी। कोर्ट का जवाब छोटा और सख्त था-जेल मैनुअल के मुताबिक कल्याण सिंह को अगली सुबह तक जेल में रखा गया। इसी के साथ वो दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया।किताब- युद्ध में अयोध्या - हेमंत शर्मा | जो भुला न सका - बालेश्वर त्यागी | जो याद रहा - बालेश्वर त्यागीकल्याण सिंह के साथी- बालेश्वर त्यागी , श्याम नंदन सिंह -----------------------------------------------------------कारसेवकों पर गोली चलवाई तो लोगों ने कार पर थूका, पिछड़ों के मसीहा मुलायम की कहानी उत्तर प्रदेश की मिट्टी ने सिर्फ फसलें नहीं, फौलादी नेता भी पैदा किए हैं। उन्हीं में एक नाम है मुलायम सिंह यादव। पिता की सीख थी- 'उड़ नहीं सकते तो दौड़ो, दौड़ नहीं सकते तो चलो, चल नहीं सकते तो रेंगो, लेकिन रुको नहीं।'राजनीति में कई दिन ऐसे होते हैं, जो दशकों का भविष्य तय कर देते हैं। ये कहानी उस दौर की है, जब सत्ता साझेदारी नहीं, सौदेबाजी पर टिकी थी। एक तरफ मुलायम सिंह सत्ता को सीढ़ी मान रहे थे, दूसरी तरफ कांशीराम आंदोलन की चाबी। बीच में थीं मायावती… जिन्हें पहले दूर रखा गया, फिर कंट्रोल किया गया और आखिर में मिटाने की कोशिश की गई।
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