यूपी के वोट बैंक: चुनावी मंडी में मुसलमानों का क्या है मोल?– News18 हिंदी

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यूपी के वोट बैंक: चुनावी मंडी में मुसलमानों का क्या है मोल?– News18 हिंदी
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UPKEVOTEBANK : यूपी के वोट बैंक: चुनावी मंडी में मुसलमानों का क्या है मोल? UPCasteCalculus francisankit1 samajwadiparty INCIndia Mayawati BJP4India

में क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा मुसलमानों का ही जो है. लेकिन 2014 में पहली बार यह लगा कि मुसलमान न मंडी का माल है और न उसका कोई लेने वाला है. यूपी के 4 करोड़ मुसलमान एक सांसद भी संसद को नहीं दे सके. मोदी की बाढ़ में केवल मुसलमानों के नेताओं की राजनीति ही नहीं, सारी जमी-जमाई थियरी भी बह गई.

मुसलमान की राजनीतिक हैसियत 2014 के आम चुनाव से यूपी के लिए दो नतीजे निकले. पहला, मुसलमान इकतरफ़ा थोक 'वोट बैंक' नहीं है. दूसरा, वो भी उतना ही बंटा हुआ है जितना यूपी का कोई वोटर समूह. 2011 की जनगणना के मुताबिक़ यूपी में 4 करोड़ मुसलमान हैं तो देशभर में 18 करोड़ यानी 14 फ़ीसदी. मगर 2014 में सबसे कम सिर्फ़ 22 मुसलमान लोकसभा पहुंचे. संसद में उनकी मौजूदगी आबादी के अनुपात में महज़ 4% ही है. नेता मानते हैं कि लोकसभा के 218 निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलमानों की वोट में हिस्सेदारी 10% से ज़्यादा है. इस पूरी बात को रामपुर सीट के किस्से से समझें. रामपुर सीट पर मुस्लिमों की आबादी 49.14% है, लेकिन इस सीट के 50 फीसदी मुसलमान भी यहां से किसी मुस्लिम कैंडिडेट को नहीं जिता पाए. बीजेपी के नेपाल सिंह ने सपा के नसीर अहमद खान को करीब 28 हज़ार वोटों से हरा दिया. दरअसल यहां भी वही हुआ जो कि ज्यादातर मुस्लिम बहुल सीटों का हाल होता है. बीजेपी के अलावा सभी ने मुस्लिम कैंडिडेट्स को मैदान में उतारा. नवाब काजिम अली खान आए, जिन्होंने डेढ़ लाख वोट हासिल किए, बसपा से अकबर हुसैन उतरे जिन्हें 81 हज़ार से ज्यादा वोट मिले जबकि ऑल इंडिया माइनोरिटी फ्रंट की कैंडिडेट जन्नत निशाँ भीं पांच हज़ार वोट ले गईं. हुआ यूं कि मुसलमान वोट उन पार्टियों ने ही बाँट दिया जो उनके सबसे बड़े हितैषी होने का दावा कर रहे थे, जिसका नतीजा ये हुआ कि यूपी की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली सीट भी मुसलमान सांसद नहीं चुन पाई. बहरहाल 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी से एक भी मुसलमान सांसद का न चुना जाना बताता है कि सभी मुसलमान सिर्फ़ बीजेपी विरोध के आधार पर वोटिंग नहीं करते. मुस्लिम समाज को इस खांचे में फिट करना असल में गैर बीजेपी पार्टियों की एक सहूलियत है जिसके सहारे वो उनके मुद्दे और अंतर्विरोधों से मुंह फेर पाते हैं. ज़ाहिर है कि ऐसा करके उन्हें वोट बैंक में तब्दील करना आसान हो जाता है.यह सच है कि इस्लाम में किसी भी जातिगत भेदभाव के लिए जगह नहीं. हालांकि हिंदुस्तानी मुसलमानों में जाति व्यवस्था देखने को मिलती है. मगर आमतौर पर बड़ी राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों की जातीय व्यवस्था, फिरक़े और दूसरे समूहों की राजनीति को कहने-सुनने से कतराती रही हैं. मुसलमानों की जाति व्यवस्था पर 1960 में ग़ौस अंसारी ने 'मुस्लिम सोशल डिवीजन इन इंडिया' नाम की एक किताब लिखी थी. इसमें ग़ौस ने उत्तर भारत में मुसलमानों को चार प्रमुख समूहों में बांटा था- सैयद, शेख, मुग़ल और पठान. इस व्यवस्था में सैयद ख़ुद को इसमें सबसे ऊपर रखते हैं और ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद साहब के खानदान से जुड़ा बताते हैं. दूसरे नंबर पर हैं शेख, जो ख़ुद को पैग़ंबर मोहम्मद के क़बीले 'क़ुरैश' से संबंधित बताते हैं. इनमें सिद्दीक़ी, फारूक़ी और अब्बास कुलनाम नाम इस्तेमाल करने वाले लोग हैं. तीसरे पर मुग़ल हैं, जो बाबर के नेतृत्व में भारत आए थे. चौथे नंबर पर पठान हैं जो पश्तो बोलते हैं और फिलहाल पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान के पख़्तूनखा इलाक़े से माने जाते हैं. बहरहाल. इसके अलावा हिंदुओं की तरह ही एक जातीय व्यवस्था भी है, जहां अशराफ, अजलाफ और अरजाल नाम की तीन श्रेणियां हैं.मुग़ल, पठान, सैयद, शेखदर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, हज्जाम , जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, कंजरा, मिरासी, मनिहार, तेलीग़ौस अंसारी के अलावा इम्तियाज़ अहमद ने भी 1978 में 'कास्ट एंड सोशल स्टार्टिफिकेशन अमंग द मुस्लिम्स' में बताया था कि कैसे इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद हिंदू जातीय संरचना ज्यों के त्यों मुस्लिम समाज में भी जगह पा गई. सोशियोलॉजिस्ट एमएन श्रीनिवासन भी मानते हैं कि भारत या दक्षिण एशिया में मौजूद जाति व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि कई बाहर से आए धर्मों ने इसे न चाहते हुए भी अपना लिया. हिंदू धर्म से इस्लाम में आने वाले सामान्य जीवन में इस जाति व्यवस्था के इतने आदी थे तो मुसलमान होने के बाद भी इन्हें इस सिस्टम को मानते रहने में दिक्कत महसूस नहीं हुई. कई जातियां जैसे- आतिशबाज़, बढ़ई, भांड, भातिहारा, भिश्ती, धोबी, मनिहार, दर्जी हिंदुओं और मुसलमानों में एक जैसी हैं. ग़ौस ने बताया कि सैयद और शेख आमतौर सबसे ऊपर माने जाते हैं और धर्म से जुड़े कामों की ज़िम्मेदारी भी इनकी ही होती है. मुग़लों और पठानों को क़रीब-क़रीब हिंदुओं की क्षत्रिय जातियों की तरह ही समझा जाता रहा है. इसके अलावा ग़ौस ने ओबीसी मुस्लिम और दलित मुस्लिम को - क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट और नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में बांटा है. क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में हिंदुओं की ओबीसी जातियों से आए लोग हैं जबकि नॉन-क्लीन ऑक्युपेशनल कास्ट में दलित जातियों से मुस्लिम समाज में आए लोग हैं. हालांकि दलित मुसलमानों को अभी भी एससी रिजर्वेशन हासिल नहीं हो पाया है.एससी कमीशन के सदस्य योगेंद्र पासवान इसकी तस्दीक करते हैं कि फिलहाल दलित मुसलमानों को रिजर्वेशन हासिल नहीं है. हालांकि ऐसी 30 जातियों को ओबीसी रिज़र्वेशन का फ़ायदा ज़रूर मिलता है. बता दें कि ब्रिटिश राज में ही मुस्लिम दलितों को हिंदू दलितों की तरह सरकारी योजनाओं में प्रोत्साहन और रिज़र्वेशन देने जैसी बहस शुरू हो गई थी. सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ 1936 में जब अंग्रेजों के सामने ये मामला गया तो एक इंपीरियल ऑर्डर के तहत सिख, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई दलितों को बतौर दलित मान्यता दी गई लेकिन इन्हें हिंदू दलितों को मिलने वाले फ़ायदों से महरूम कर दिया गया. 1950 में आज़ाद भारत के संविधान में भी व्यवस्था यही रही. हालांकि 1956 में सिख दलितों और 1990 में नव-बौद्धों को दलितों में शामिल तो कर लिया गया पर मुस्लिम दलित जातियों को मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद ओबीसी लिस्ट में ही जगह मिल पाई.इस कमीशन ने 2399 पिछड़ी जातियों की एक लिस्ट बनाई थी जिनमें से 837 जातियों को 'अति पिछड़ा' की श्रेणी में रखा गया था. कमीशन ने पिछड़ी जातियों की इस सूची में न सिर्फ़ हिंदू ओबीसी बल्कि मुस्लिम ओबीसी जातियों को भी जगह दी थी. कमीशन ने इन जातियों को पिछड़ा तो माना, लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों में मौजूद इन जातियों के साथ जातिगत भेदभाव होता है, इसे मानने से इनकार कर दिया था. कमीशन ने माना कि पिछड़ापन है लेकिन ये भी कहा कि जाति आधारित क़ानूनी व्यवस्था या ऐसी कोई सिफ़ारिश इन धर्मों में भी इस 'अनहेल्दी प्रैक्टिस' को बढ़ावा दे सकती है.इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में देश की 3743 जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल किया था. कमीशन ने माना कि जातिगत भेदभाव सिर्फ़ हिंदुओं तक सीमित नहीं बल्कि मुस्लिम, सिख और ईसाइयों में भी है. कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में 82 मुस्लिम जातियों को ओबीसी में जगह दी थी. दलितों से जो मुसलमान बने उन्हें 'अरजाल' और ओबीसी जातियों से मुसलमान बने लोगों को 'अजलाफ' की श्रेणी में रखा गया था. हालांकि कमीशन ने सिफारिश की कि 'अरजाल' को एससी कैटेगरी में फ़ायदा मिलना चाहिए. साथ ही इन्हें एमबीसी कैटेगरी में शामिल कर दिया. इसी के बाद से मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलने लगा. बाद में सच्चर कमेटी रिपोर्ट में भी माना गया कि मुस्लिम ओबीसी में ग़रीबी सबसे ज़्यादा है. सोशल इंडीकेटर्स जैसे कुपोषण, हाउसहोल्ड और सामजिक पिछड़ेपन के मामले में भी मुस्लिम ओबीसी की हालत देश में हिंदू दलितों से भी बदतर है.2014 से पहले संसद में सबसे कम मुस्लिम सांसदों का रिकॉर्ड 1957 में बना था, जब लोकसभा में सिर्फ 23 मुस्लिम सांसद पहुंचे थे. वैसे देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को सबसे अच्छी भागीदारी 1980 की लोकसभा में मिली थी. इंदिरा गांधी की वापसी वाली लोकसभा में सर्वाधिक 49 मुस्लिम सांसद थे. आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2014 में मुस्लिम तबक़े से बीएसपी ने 19, सपा ने 13 और कांग्रेस ने 11 उम्मीदवार उतारे थे. वैसे, उत्तर प्रदेश में कुल 52 मुस्लिम प्रत्याशी थे. बता दें कि देश की 70 और यूपी की 13 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटों की संख्या 30% से ज़्यादा है. अगर 15% को आधार बनाएं, तो यूपी की 32 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी प्रभावी है. 2014 में इन 32 सीटों में से सपा को केवल 2 सीटें मिलीं और 30 सीटों पर बीजेपी जीती. कैराना उपचुनाव में महागठबंधन की उम्मीदवार तब्बसुम हसन अगर चुनाव नहीं जीततीं, तो ये भारतीय इतिहास का पहला चुनाव था जब यूपी से कोई मुस्लिम सांसद जीत नहीं पाया था. सहारनपुर, अमरोहा, श्रावस्ती, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, मुरादाबाद और रामपुर जैसी यूपी की 8 सीटें जहां मुस्लिम आबादी 40% से ज्यादा है सभी जगह बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 428 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से सात मुस्लिम थे, लेकिन एक भी नहीं जीता. दूसरी ओर कांग्रेस ने 464 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से 27 पर मुस्लिम थे, जिसमें से तीन जीते.सीएसडीएस-लोकनीति ने अपने सर्वे में पाया कि मुस्लिम वोटों का सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर नज़र आता है जहां उनकी संख्या 10% के आसपास होती है. ऐसी सीटें जहां मुस्लिम आबादी 20% से ज्यादा हो जाए वहां उनका वोट अक्सर बेअसर हो जाता है. ये ट्रेंड बिलकुल रिज़र्व सीटों पर बसपा के कमज़ोर साबित होने जैसा ही है. इसकी वजह है कई मुस्लिम कैंडिडेट की वजह से वोट बंटना. चुनाव विश्लेषक कहते हैं कि कई बार हिंदू वोटों का काउंटर-पोलराइज़ेशन भी होता है. 2014 के बारे में भी यही राय है कि यूपी, खासकर पश्चिमी यूपी की सीटों पर काउंटर-पोलराइज़ेशन की वजह से बीजेपी को मदद मिली. वो 13 सीटें जहां मुस्लिमों की आबादी 30% से भी ज्यादा है, वहां 1991 के चुनावों से पैटर्न देखें, तो पता चलता है कि 8 सीटें ऐसी हैं जहां बीजेपी हमेशा से ही मजबूत रही है. बरेली जैसी सीट को तो बीजेपी का गढ़ भी माना जा सकता है. 2014 में भी गैर बीजेपी पार्टियों द्वारा मुस्लिम कैंडिडेट के सामने मुस्लिम उतारने के चलते ये वोट बैंक असफल साबित हुआ. अगर उत्तर प्रदेश की सहारनपुर सीट पर नज़र डालें तो मुस्लिम बहुल होने के बावजूद कांग्रेस के इमरान मसूद यहां से इसलिए हारे क्योंकि उनके मुक़ाबले उनके चचेरे भाई शाजान मसूद सपा के टिकट पर लड़ रहे थे. मसूद क़रीब 70,000 वोटों से हारे हैं, जबकि उनके चचेरे भाई को 50,000 से अधिक वोट मिले हैं. कभी मौलाना अबुल कलाम आजाद की सीट रही रामपुर में सपा के नसीर अहमद खान की हार की बड़ी वजह कांग्रेस के नवाब काज़िम अली खान उर्फ नवेद मियां को मिले 1.5 लाख से अधिक वोट हैं. इसके अलावा पार्टियों में भितरघात भी इसकी वजह है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संभल सीट से सपा की टिकट पर हारे शफीक उर रहमान बर्क ने आरोप लगाया कि इकबाल महमूद ने पूरी ताकत और वक्त मुझे हराने पर ही खर्च किया. इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश की श्रावस्ती सीट से सपा प्रत्याशी अतीक अहमद ने एक बयान में कहा कि महमूद खान अपने दोस्त और पीस पार्टी के प्रत्याशी रिजवान जहीर को जितवाने में लगे थे और पार्टी के लिए काम करने का उनके पास वक़्त ही कहां था.बीजेपी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है- विपक्षी दल मुसलमानों को डर दिखाकर उनका वोट हासिल करते हैं, जबकि हम उनके लिए काम करते हैं. मुस्लिम महिलाओं को हमने अधिकार दिया है. इस बार पार्टी को पहले से अधिक मुस्लिम वोट मिलेंगे. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटी ने 2009 के लोकसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं के रुझान की 2014 के रुझान से तुलना की. सीएसडीएस के सर्वे से मिले संकेतों के अनुसार मुसलमानों में भी इस बार कांग्रेस या क्षेत्रीय पार्टियों के पक्ष में कोई विशेष ध्रुवीकरण देखने को नहीं मिला. दरअसल, इस चुनाव में मुसलमानों का थोड़ा वोट बीजेपी की तरफ़ झुका है. बीजेपी को ये वोट उन जनभावनाओं के तहत मिले हैं जो युवा-बुज़ुर्ग, शहरी-ग्रामीण, पुरुष-स्त्री और विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच समान से रूप से मौजूद थे. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के पक्ष में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के बारे में अटकलें लगाई जा रही थीं. चुनाव बाद के सर्वेक्षण के अनुसार इस चुनाव में 38 प्रतिशत मुस्लिम वोट कांग्रेस एवं सहयोगी दलों को मिले हैं. सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटी के मुताबिक़ 2014 के चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम वोटों का क़रीब 8.5% बीजेपी के पक्ष में गया था. बीजेपी को इससे पहले मुस्लिमों का इतना समर्थन कभी नहीं मिला था. यूपी में तो 10% मुस्लिमों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को वोट किया. सीएसडीएस के मुताबिक 2009 में बीजेपी को 3% मुस्लिमों ने वोट किया था. 2014 से पहले बीजेपी को सबसे ज्यादा 7% मुस्लिमों का सपोर्ट 2004 में मिला था. 1998 में 5 और 1999 में 6% मुस्लिम वोट बीजेपी के साथ था. हालांकि यह सच है कि 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा 37.6% मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिला था. जबकि यूपी में 58% मुस्लिमों ने सपा पर भरोसा जताया था. हालांकि वरिष्ठ पत्रकार आलोक भदौरिया का मानना है 'मुस्लिम भी हिंदुओं की तरह उम्मीदों की लहर पर सवार थे. उन्हें लगता था कि बीजेपी और खासतौर पर नरेंद्र मोदी देश के लिए कुछ अच्छा करेंगे, जिससे उनके आर्थिक और सामाजिक स्तर में सुधार आएगा. ऐसे में उन्होंने भाजपा के खिलाफ अपना संकुचित दायरा हटाया. भाजपा को जो मुस्लिम वोट मिले हैं वो कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश के वोट भी हैं. यह उन क्षेत्रीय पार्टियों के भी वोट थे जिनका मुस्लिम जनाधार शायद खिसक गया है. जैसे यूपी में बीएसपी.' सीएसडीएस निदेशक संजय कुमार के मुताबिक- बीजेपी को पिछले तीन-चार इलेक्शन में 7% वोट मिलता रहा है. ऐसे में यह बहुत ज्यादा नहीं कहा जा सकता. 2009 में उसे सबसे कम मुस्लिम वोट मिला था. यह लोकल एवं पर्सनल कंसीडरेशन भी हो सकता है. जहां दो-चार फीसदी ही मुस्लिम हैं. उन्होंने देखा होगा कि हवा के रुख के साथ जाना ठीक होगा. इसलिए भी बीजेपी के पक्ष में पहले के मुताबिक थोड़ा मुस्लिम वोट परसेंट बढ़ा है.' राजनीतिक विश्लेषक एवं '24 अकबर रोड' के लेखक रशीद किदवई का कहना है कि बीजेपी के कुछ नेताओं की मुस्लिमों में अच्छी पैठ है. वो उनकी निजी छवि के नाते. गुजरात के बोहरा मुस्लिमों का वोट पारंपरिक रूप से बीजेपी को मिलता रहा है. मध्य प्रदेश में बीजेपी के पार्षद स्तर के सौ से अधिक मुस्लिम नेता हैं. अगर हम बारीकी से देखें तो पता चलता है कि मुस्लिमों और बीजेपी के बीच विश्वास की कमी है. इसे दूर करने की ज़रूरत है. किदवई के मुताबिक बीजेपी में बहुत कम मुस्लिम नेता हैं. मुख्तार अब्बास नकवी, एमजे अकबर, शहनवाज हुसैन, शाज़िया इल्मी जैसे कुछ ही गिने-चुने नेता हैं. मुस्लिमों को टिकट देने के मामले में बीजेपी अन्य पार्टियों से काफी पीछे है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी ने एक भी मुस्लिम नेता को टिकट नहीं दिया. जब उन्हें भागीदारी दी जाएगी तो वोट भी मिलेगा.उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में भी बीजेपी ने कई मुस्लिम बहुल सीटों पर भी जीत हासिल की. इनमें सबसे ज़्यादा चर्चा देवबंद सीट की हुई, जहां से बीजेपी उम्मीदवार ब्रजेश ने क़रीब 30 हज़ार वोटों से जीत हासिल की थी. इस सीट पर दूसरे नंबर पर बहुजन समाज पार्टी के माजिद अली रहे जबकि तीसरे नंबर पर समाजवादी पार्टी के माविया अली रहे. इसके अलावा मुरादाबाद नगर सीट भी बीजेपी की झोली में आई. यहां से समाजवादी पार्टी के मौजूदा विधायक यूसुफ़ अंसारी को भाजपा के रीतेश कुमार गुप्ता ने क़रीब बीस हज़ार वोटों से हराया. इस सीट पर तीसरे नंबर पर बसपा के अतीक़ सैफ़ी रहे जिन्होंने 24,650 वोट हासिल किए. मुरादाबाद की ही मुस्लिम बहुल कांठ सीट पर बीजेपी के राजेश कुमार चुन्नू ने सपा के अनीसुर्रहमान को 2348 मतों से हराया. इस सीट पर तीसरे नंबर पर बसपा के मोहम्मद नासिर रहे. फ़ैज़ाबाद की रुदौली सीट से भाजपा के रामचंद्र यादव ने सपा के अब्बास अली ज़ैदी को क़रीब तीस हज़ार वोटों से हराया. इस सीट पर बहुजन समाजवादी पार्टी के फ़िरोज़ ख़ान उर्फ़ गब्बर ने 47 हज़ार से अधिक मत हासिल किए. शामली ज़िले की थाना भवन सीट से भी बीजेपी के सुरेश कुमार ने बसपा के अब्दुल वारिस ख़ान को हराया. इस सीट पर दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय लोकदल के जावेद राव रहे. उतरौला सीट से बीजेपी के राम प्रताप ने सपा के आरिफ़ अनवर हाशमी को हराया. इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी के परवेज़ अहमद तीसरे नंबर पर रहे. इन चुनावों में भी गैर-बीजेपी पार्टियों के मुस्लिम कैंडिडेट्स को टिकट देने के चलते मुसलमान वोट बेअसर साबित हो गया.सीएसडीएस में असोसिएट प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद लगातार मुस्लिम वोट बैंक को एक 'मिथ' करार देते रहे हैं. हिलाल कहते हैं कि बाकी सभी धर्मों के लोगों की तरह मुस्लिम समाज को भी क्लास-कास्ट विभाजन के आधार पर ही देखा-समझा जाना चाहिए. किसी भी राजनीतिक पार्टी ने आज तक मुसलमानों को महज एक वोट बैंक से इतर देखने की कोशिश ही नहीं की है, क्योंकि उन सभी का फायदा इसी में है. हिलाल दावा करते हैं कि अगर आप मुस्लिम वोटिंग पैटर्न को करीब से देखेंगे तो पता चलेगा कि कैसे इस समाज को 'वोट बैंक' के नाम पर ठगा जाता रहा है. हिलाल लिखते हैं कि साल 1950 में पहली बार 'मुस्लिम वोट बैंक' की सोच पैदा हुई. सोशियोलॉजिस्ट एमएन श्रीनिवास ने साल 1953 में कर्नाटक में एक फील्ड स्टडी के दौरान पहली बार वोट बैंक शब्द का इस्तेमाल किया, हालांकि उनका इससे मतलब सिर्फ नेताओं और छोटे-छोटे इलाकों के ओपिनियन लीडर्स के रिश्ते से था. श्रीनिवास का मानना था कि यही ओपिनियन लीडर्स किसी भी नेता के लिए एक 'वोट बैंक' तैयार करते हैं. ये अक्सर कास्ट और कम्युनिटी आधारित होते हैं जिसका फायदा चुनावों में नज़र आता है. हिलाल के मुताबिक इस तरह की राजनीति से सोशलिस्ट लीडर जयप्रकाश नारायण भी इत्तेफाक नहीं रखते थे. उन्होंने कई मौकों पर कहा था कि किसी आबादी को वोट बैंक में तब्दील करने से उसके अंदर से आने वाली अलग-अलग तरह की आवाजों की जगह ख़त्म हो जाती है. हिलाल अपनी सीरीज 'सरकारी मुसलमान' में लिखते हैं कि साल 1967 में मुस्लिम वोट बैंक सबसे ज्यादा चर्चाओं में आया. तब गैर-कांग्रेसी दल मज़बूती से मौजूदगी दर्ज करा रहे थे. और कांग्रेस के मुकाबले के लिए माइनॉरिटी, दलित और ओबीसी वोट बैंक का समीकरण तैयार करने लगे. जवाब में कांग्रेस ने सबसे पहले मुस्लिम मौलानाओं को बुलाया और वोट बैंक के इस विचार को जोर-शोर से बढ़ावा दिया गया. यह फ़ॉर्मूला इसलिए भी चला क्योंकि मुस्लिम समाज खुद भी जाति/बिरादरी और स्थानीय राजनीति पर बात किए बिना राष्ट्रीय स्तर की 'मुस्लिम एकता' का सपना देख रहा था. मुस्लिम वोट बैंक को आधार बनाकर 'मुस्लिम मुद्दे' भी अस्तित्व में आए और ऐसी सोच बनाई गई कि मुसलमानों को सिर्फ़ तीन तलाक़, पर्सनल लॉ, उर्दू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बाबरी मस्जिद में ही दिलचस्पी है. इसका फ़ायदा ये हुआ कि इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द इस पूरे समाज को लेकर नज़रिया बनाया गया और लगा कि यह पूरा समाज ही इसी एक लाइन पर सोच रहा है.वरिष्ठ पत्रकार और पसमांदा मुस्लिम फ्रंट के अध्यक्ष रहे यूसुफ़ अंसारी कहते हैं कि इस राजनीति का सबसे ज्यादा नुक़सान ओबीसी और दलित मुसलमानों को हुआ. यूपी की बात करें तो लगातार अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों में रहकर मुसलमानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले लोग जो सभी के सभी अशराफ मुसलमान हैं, इस वोट बैंक का भ्रम बनाए रखने की साज़िश करते रहे, क्योंकि उनका फ़ायदा इसी में था. यूसुफ़ बताते हैं कि कांग्रेस के सलमान खुर्शीद सैयद हैं, गुलाम नबी आज़ाद कश्मीरी ब्राह्मण हैं, सपा के आज़म खान भी सैयद हैं, बसपा के मुनकाद अली भी सैयद हैं तो मामला यह रहा कि शेख, सैयद, मुग़ल और पठान लगातार लीडर रहे लेकिन इन्होंने कभी ओबीसी-दलित मुस्लिम जातियों की आवाज़ नहीं उठाई. मुसलमान समाज में मौजूद जातीय व्यवस्था पर किताब 'मसावत की जंग' के लेखक और पूर्व सांसद अली अनवर का भी मानना है कि भारत में मौजूद मुस्लिम राजनीति में अजलाफ और अरजाल का नेतृत्व सिरे से गायब है. इन दोनों समुदायों से वोट चाहिए लेकिन न तो इन्हें टिकट दिया जाता है. आज़ादी के बाद से एक ख़ास समाज मुद्दे तय करता है और ये बताता रहता है कि इन दोनों समाज के लिए क्या ज़रूरी है. आमतौर पर अशराफ न तो अजलाफ-अरजाल जातियों में शादी करते हैं न उनके साथ किसी तरह का संबंध रखना पसंद करते हैं. बिहार में तो साल 2010 में पिछड़े मुसलमानों के लिए कब्रिस्तान तक अलग कर देने का मामला सामने आया, जो नेशनल मीडिया की सुर्खियां भी बना था. दरअसल इस तरह का कोई सिस्टम इस्लाम में नहीं है इसलिए इस पर बात करने से भी एतराज जताया जाता है और की भी जाए तो ऐसा करने वाले को इस्लाम बांटने वाला करार दिया जाता है.युसूफ कहते हैं कि पसमांदा मुसलमान तो लगातार एक चक्रव्यूह में फंसा है. लगातार 'इस्लाम खतरे में' रहता है जिसके बदले ओबीसी-दलित मुसलमानों को अपने मुद्दों पर बोलने से रोका जाता रहा है. हिंदू दलितों को जब आबादी के हिसाब से रिजर्वेशन मिला है तो मुस्लिमों को इससे महरूम क्यों रखा जा रहा है. अभी कुछ सालों से 'हिंदू' भी खतरे में हैं तो मुसलमानों से उम्मीद की जाती है कि वो एकजुट रहें और इसी नाम पर मुस्लिम समाज का पिछड़ा तबका लगातार ठगा जाता है. जबकि सच तो ये है कि मुस्लिम भी अन्य समुदायों की तरह वोट करते हैं और 2014 में यूपी में एक भी सीट न आना ये साबित करता है. ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के एमए खालिद कहते हैं, '2019 में मुस्लिमों को अपनी स्ट्रैटिजी बदलनी होगी और अपने विकल्प खुले रखने होंगे.' आजमगढ़ के शिबली नेशनल कॉलेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. गयास असद खां कहते हैं, 'राजनीतिक पार्टियों ने मुसलमानों को केवल वोट बैंक के रूप में ही प्रचारित किया, जबकि ऐसा नहीं था. मुसलमान किसी पार्टी से तभी जुड़ा जब उसके पास अपना कोई वोट आधार था. इस बार के चुनाव में पार्टियों ने अपने वोट आधार की चिंता छोड़ सारी कवायद मुसलमानों के वोट पाने में ही लगा दी. इससे जहां एक ओर मुसलमानों में दुविधा पैदा हुई और वहीं दूसरी ओर इसके ख़िलाफ़ हिंदू वोट एकजुट हो गए. इसी का नतीजा चुनाव में दिखाई दिया.' दरअसल, यह आम धारणा है कि जब भी कोई पार्टी बीजेपी से नाता जोड़ती है तो मुस्लिम वोट खो देती है. यह काफी हद तक सही भी है पर अब पूरी तरह सही नहीं है. नीतीश कुमार और मायावती साबित कर चुके हैं कि बीजेपी के साथ होने पर भी उन्हें मुस्लिम वोट मिल सकता है, हालांकि नरेंद्र मोदी के आने से अब इस पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिलेगा. संसद में सपा के इकलौते मुस्लिम नुमाइंदे राज्यसभा सांसद मुनव्वर सलीम इस ट्रेंड को मुख्तलिफ अंदाज से देखते हैं, 'हमने तो आजादी के वक्त भी एक हिंदू को ही अपना बाबा-ए-कौम माना था. उसके बाद से किसी न किसी हिंदू नेता के नीचे ही काम करते रहे हैं. लेकिन लगता है कि हिंदू अब किसी मुसलमान को अपना नेता नहीं बनने देना चाहते. बिना हिंदू वोटों के तो कोई मुसलमान चुनाव जीत ही नहीं सकता.' बता दें कि 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अपनी रणनीति में सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकट देने और मुस्लिम वोटों को बांटने का फैसला किया था. बीजेपी की रिकॉर्ड जीत ने मुसलमानों को टिकट देने वाली पार्टियों का सूपड़ा साफ़ कर दिया. ऐसे में मुस्लिम सांसदों की संख्या लगातार कम होते जाने के पीछे ठोस वजह गैर-बीजेपी पार्टियों की मुस्लिमों को लेकर सीमित सोच का नतीजा है.

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