महिला आरक्षण पर वर्षों के गतिरोध और विवाद के बीच ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनावों में 33 फीसदी सीटें महिला उम्मीदावारों को देने का ऐलान कर खलबली मचा दी है.
अगर महिला उम्मीदवारों के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित कर बीजू जनता दल आम चुनाव लड़ता है तो ऐसा करने वाला वह देश का पहला राजनीतिक दल होगा और नवीन पटनायक पहले नेता. ओडीशा की 21 लोकसभा सीटों में से बीजेडी के पास 20 सीटें हैं.
नवीन पटनायक की घोषणा का अर्थ है कि उन्हें 21 में से सात लोकसभा सीटों पर महिला उम्मीदवारों को टिकट देना होगा. इस समय पार्टी की तीन महिला सांसद हैं. नवीन पटनायक ने चुनाव तारीखों की घोषणा से कुछ ही घंटे पहले ओडीशा के केंद्रपाड़ा जिले और अपने पिता बीजू पटनायक की ‘कर्मभूमि' में इस आशय की घोषणा की. राज्य सरकार ने संसद और विधानसभा में महिला आरक्षण संबंधी प्रस्ताव पिछले साल नवंबर में ही पास करा लिया था. मुख्यमंत्री पटनायक ने अन्य दलों से बाजी हथियाते हुए कहा कि इस बारे में उन्होंने सभी दलों और नेताओं को अपना ये प्रस्ताव भेज दिया था. उनकी घोषणा पर बीजेपी और कांग्रेस जैसी धुरंधर पार्टियां आवाक हैं और उन पर चुनावी हथकंडे के इस्तेमाल का आरोप लगा रही हैं. लेकिन पटनायक ने सही समय पर अपनी ‘साइलेंट पॉलिटिक्स' का आकर्षक उदाहरण भी पेश किया है. ओडीशा के 3.18 करोड़ मतदाताओं में से 1.56 करोड़ महिला मतदाता हैं. 2012 में ओडीशा सरकार ने पंचायतों मे महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण कर दिया था. हालांकि ये भी हैरानी की बात है कि पांचवी बार सरकार बनाने की कोशिशों के तहत चुनाव मैदान में उतर रहे नवीन पटनायक ने विधानसभा चुनावों के लिए ऐसा कोई ऐलान नहीं किया जबकि राज्य में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होंगे. 147 सीटों वाली ओडीशा विधानसभा में सिर्फ 12 महिला विधायक हैं. ओडीशा में किसानों, बेरोजगारों और आदिवासियों के असंतोष बने हुए हैं- स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक कई पैरामीटरों पर राज्य की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है. लेकिन महिला आरक्षण जैसी एक पुरानी और कठिन मांग को निभाने की घोषणा करने वाले पटनायक के इस कदम की तो सभी दाद दे रहे हैं. भारत में महिलाएं कुल जनसंख्या का करीब 48 फीसदी हैं लेकिन रोजगार में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 26 फीसदी की है. न्यायपालिका और केंद्र और राज्य सरकारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है. पंचायतों में जहां राज्यों में महिलाओं के लिये आरक्षण किया गया वहां महिलाओं के नाम पर उनके पति और बेटे निर्वाचन से मिली ताकत का उपयोग कर रहे हैं. ओडीशा के अलावा कर्नाटक और उत्तराखंड जैसे राज्यों में 50 फीसदी आरक्षण का लाभ भी महिलाओं को उस रूप में नहीं मिल पा रहा है जिसकी वो अधिकारी हैं.यह भारतीय संविधान के 85वें संशोधन का विधेयक है. इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान रखा गया है. इसी 33 फीसदी में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी है. महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक राज्यसभा में 2010 में पारित हो चुका. अब लोकसभा में इसे पारित करवाने की बारी है.पहली बार इस बिल को 1996 में एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में पेश किया गया था. तब सत्ता पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी. उस वक्त जेडीयू अध्यक्ष रहे शरद यादव ने इसका विरोध किया था. 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरई खड़े हुए थे. तब संसद में बड़ा हंगामा हुआ और हाथापाई भी हुई उसके बाद उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया गया.आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव का मानना है कि यह बिल लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश है. देश में महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और देश के भीतर एवं सीमा पर खतरे जैसी समस्याएं हैं. लोगों का ध्यान इन मुद्दों से हटाने के लिए महिला सशक्तीकरण के नाम पर यह बिल लाया जा रहा है.जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव ने संसद में महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यदि ये बिल पारित हो गया तो वह जहर खा लेंगे. यादव का आरोप था कि इस बिल से सिर्फ परकटी औरतों को फायदा पहुंचेगा. उनकी मांग थी कि इस बिल में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को कोटा मिले.सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की यह मांग थी कि महिला आरक्षण बिल को मूल स्वरूप संसद में ना रखा जाए. आरोप लगाया कि इससे देश की अमीर महिलाएं बहुत आगे बढ़ जाएंगी और गरीब वर्ग की औरतें पिछड़ जाएंगी.महिला आरक्षण बिल पास करवाने को लेकर पिछले दिनों लिखे राहुल गांधी के पत्र पर मोदी सरकार ने सियासी पासा फेंका है. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने शर्त रखी है कि राहुल को महिला आरक्षण विधेयक के साथ तीन तलाक और हलाला मामले पर भी सरकार का साथ देना चाहिए. कांग्रेस तीन तलाक और हलाला के मुद्दे पर बंटी हुई है.राज्यसभा में बिल के पारित होने की वजह से यह मुद्दा अभी जिंदा है. मोदी सरकार के पास संख्याबल है और अब कांग्रेस ने बिल को पास करने में दिलचस्पी दिखाई है. अगर लोकसभा इसे पारित कर दे, तो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा. इससे 2019 के लोकसभा चुनाव नए कानून के तहत हो सकेंगे और नई लोकसभा में 33 फीसदी महिलाएं आ सकेंगी.इन सब चिंताओं के बीच यूएनडीपी की वो रिपोर्ट भी है जिसके मुताबिक महिलाओं के सशक्तीकरण में अफगानिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देश भारत से बेहतर हैं. यह भी एक तथ्य है कि संसद में महिला प्रतिनिधित्व के वैश्विक औसत में भारत का स्थान बहुत नीचे है. 543 सीटों वाली लोकसभा में इस समय 62 महिला सांसद हैं, इससे पहले 2009 में 58 महिलाएं थीं. थोड़ा सा ग्राफ बढ़ा लेकिन 33 फीसदी आरक्षण के हवाले से तो ये नगण्य ही कहा जाएगा. 2010 में यूपीए सरकार ने इसे राज्यसभा में पास तो करा दिया था लेकिन पर्याप्त संख्याबल के बावजूद लोकसभा से पास कराने में विफल क्यों रह गई, ये सवाल बना हुआ है. 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में आई बीजेपी भी इसे भूलती चली गई जबकि ये उसके चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था. पितृसत्तात्मक संरचना वाले समाज में घर हो या दफ्तर, सड़क हो या संसद- स्त्रियों के विकास का नारा खूब पीटा जाता है. अफसोस ये है कि कि ये तोतारटंत वाली बातें इतने लंबे समय से आखिरकार कैसे चल पा रही हैं और उन्हें सुना भी जा रहा है, तालियां भी बज रही हैं और वोट भी पड़ रहे हैं. हालांकि महिला हितों को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना या कार्रवाई नहीं दिखती है, जबकि संसद से ही इसकी शुरुआत होती तो ये देश के लिए बड़ा संदेश होता. नवीन पटनायक ने अपनी लोकसभा सीटों की लैंगिक समीकरणों को टटोलते-परखते हुए 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा कर दी लेकिन बीजेपी जैसे अन्य दलों को सांप क्यों सूंघा- ये तो मतदाताओं को पूछना ही चाहिए.
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