महाकुंभ मेला 2025: आस्था और जलवायु परिवर्तन पर पहला सम्मेलन

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महाकुंभ मेला 2025: आस्था और जलवायु परिवर्तन पर पहला सम्मेलन
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महाकुंभ मेला 2025 ने आस्था और जलवायु परिवर्तन पर पहला सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और संत समाज की भूमिका पर चर्चा करता है।

डिजिटल डेस्क, प्रयागराज। महाकुंभ मेला 2025, जो विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम है और जिसने रिकॉर्ड 50 करोड़ लोगों को आकर्षित किया, ने आस्था और जलवायु परिवर्तन पर पहला सम्मेलन आयोजित किया। उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यावरण निदेशालय द्वारा आयोजित और पर्यावरण अनुसंधान संगठन iFOREST के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का शीर्षक ‘कुंभ की आस्था और जलवायु परिवर्तन ’ था, जिसमें 1,000 से अधिक प्रतिभागियों और 30 वक्ताओं ने भाग लिया। इन वक्ताओं में धार्मिक संस्थानों, सरकारी निकायों, नागरिक समाज और शिक्षाविदों के प्रतिनिधि शामिल थे। माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सम्मेलन का उद्घाटन किया और भारत के पर्यावरण से सदैव रहे गहरे और अटूट संबंध को उजागर किया। 3 जनवरी से लेकर 16 फरवरी के बीच 52 करोड़ श्रद्धालु मां गंगा, यमुना और मां सरस्वती की इस पावन त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगा चुके हैं। 52 करोड़ लोग तब यहां डुबकी लगा पा रहे हैं, जब मां गंगा, यमुना और मां सरस्वती की कृपा से यहां अविरल जल उन्हें मिल पा रहा है। जलवायु परिवर्तन का ही कारण है कि धरती माता की धमनियों के रूप में जिन नदियों को अविरल बहना चाहिए था वह सूखती जा रही हैं। अनुमान कीजिए, अगर शरीर की रक्त धमनियां सूख गई तो शरीर की स्थिति क्या होगी। अगर धरती माता की धमनियां सूख गईं या प्रदूषित हो गई तो जिन धमनियों से रक्त का प्रवाह होना चाहिए उसकी क्या स्थिति होगी। उन्होंने कहा, “3 जनवरी से लेकर 16 फरवरी के बीच 52 करोड़ श्रद्धालु मां गंगा, यमुना और मां सरस्वती की इस पावन त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगा चुके हैं। 52 करोड़ लोग तब यहां डुबकी लगा पा रहे हैं, जब मां गंगा, यमुना और मां सरस्वती की कृपा से यहां अविरल जल उन्हें मिल पा रहा है। जलवायु परिवर्तन का ही कारण है कि धरती माता की धमनियों के रूप में जिन नदियों को अविरल बहना चाहिए था वह सूखती जा रही हैं। अनुमान कीजिए, अगर शरीर की रक्त धमनियां सूख गई तो शरीर की स्थिति क्या होगी। अगर धरती माता की धमनियां सूख गईं या प्रदूषित हो गई तो जिन धमनियों से रक्त का प्रवाह होना चाहिए उसकी क्या स्थिति होगी।” जलवायु सम्मेलन ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण ीय समस्याएं वैश्विक स्तर पर बहुत गंभीर हो रहे हैं। पवित्र नदियों और आध्यात्मिक परंपराओं से गहरे संबंध के साथ, कुंभ मेला सामाजिक चेतना को प्रभावित करने के लिए एक असाधारण मंच प्रदान करता है। जलवायु कार्रवाई को प्रोत्साहित करने के इस उपयुक्त अवसर को देखते हुए, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस सम्मेलन का आयोजन किया। हमारे उपनिषद हमें सिखाते हैं कि संपूर्ण विश्व ईश्वर की रचना है। हमें इसका उपयोग करना चाहिए, शोषण नहीं। 'वसुधैव कुटुंबकम' विश्व को एक परिवार के रूप में देखता है। हमारी नदियां, पशु, वन—इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के हर जीव केवल लेते ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को लौटाते भी हैं। यहां तक कि छोटे जीव, जैसे मधुमक्खियां भी योगदान देती हैं। मनुष्य भी इस तंत्र का हिस्सा है। हमें अपने पर्यावरण के प्रति कर्तव्य को समझना चाहिए औरप्रकृति के प्रति अपना योगदान देना चाहिए।” जगद्गुरु कृपालु योग ट्रस्ट के संस्थापक स्वामी मुकुंदानंद ने कहा। धर्म और समाज आपसे में गहरे से जुड़े हैं। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने में संत समाज की भूमिका भी बहुत मायने रखती है। उनके कहे को लोग मानते भी हैं और जीवन मे अपनाते भी हैं। इस सम्मेलन में जो भी निष्कर्ष निकलकर आएंगे, उन्हें यूपी सरकार अपने एक्शन प्लान का हिस्सा बनाएगी। नीति के तौर भी शामिल करेगी, उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने ' जलवायु परिवर्तन पर महाकुंभ घोषणा' जारी करते हुए कहा। यह सम्मेलन पवित्रता और स्थायित्व के बीच सेतु बनाने का प्रयास करता है, यह मान्यता देते हुए कि आस्था समुदाय—अपनी नैतिक शक्ति और लोकप्रिय पहुंच के साथ—जलवायु संकट के खिलाफ संघर्ष में अपरिहार्य सहयोगी हैं। हमने सृष्टिकर्ता की युगों तक पूजा की है, अब सृष्टि को न भूलें। हमें इसे संजोना और संरक्षित करना होगा। यदि हम ऐसे ही चलते रहे, तो न गंगा रहेगी, न यमुना। ये केवल कथाएं बनकर रह जाएंगी। हमारा राष्ट्र तभी प्रगति करेगा जब हमारा पर्यावरण प्रगति करेगा। यह सिर्फ जल नहीं, अमृत है। यदि जलवायु कार्रवाई नहीं हुई, तो अगला कुंभ केवल रेत पर होगा, नदी पर नहीं, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती ने कहा। धर्म और आस्था में समाज को प्रभावित करने की अपार शक्ति है। जलवायु कार्रवाई तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक यह जनमानस से सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ती। वैज्ञानिकों या नीति निर्माताओं के विपरीत, आस्था नेता जानते हैं कि कोई संदेश लोगों तक कैसे पहुंचाना है, iFOREST के अध्यक्ष और सीईओ डॉ.

चंद्र भूषण ने कहा। सम्मेलन का एक प्रमुख आधार उत्तर प्रदेश सरकार की धार्मिक संस्थानों को हरित बनाने की प्रतिबद्धता है। राज्य का लक्ष्य धार्मिक केंद्रों और तीर्थस्थलों को स्थायित्व के मॉडल के रूप में विकसित करना है। इसमें सौर पैनलों की स्थापना, वर्षा जल संचयन प्रणाली, कचरे का पुनर्चक्रण, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध और पवित्र स्थलों के आसपास हरित क्षेत्र बनाना शामिल है। सरकार की प्रतिबद्धता में पर्यावरण और जलवायु शिक्षा, अभियानों और व्यावहारिक कदमों को बढ़ावा देने के लिए आस्था-आधारित संगठनों को वित्तीय सहायता प्रदान करना भी शामिल है। पर्यावरण-अनुकूल तीर्थयात्रा, हरित उत्सव और टिकाऊ मंदिर प्रबंधन जैसी पहलें धार्मिक गतिविधियों के कार्बन उत्सर्जन को कम कर सकती हैं। पैनल सत्रों में शामिल विषय थे: पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण में धार्मिक नेताओं की भूमिका; पवित्र नदियां, जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन; तथा जलवायु कार्रवाई में आस्था-आधारित संगठनों का समर्थन करने में सरकारों की भूमिका। सम्मेलन में वक्ताओं में शालिनी मेहरोत्रा , सिस्टर मनोरमा और शिक्षाविदों में उपेंद्र त्रिपाठी तथा राजेंद्र रत्नू शामिल रहे। इसके अलावा, नागरिक समाज संगठन के नेता डॉ. राजेंद्र सिंह , और उद्योग जगत से अमरेंदु प्रकाश तथा अनिल कुमार जैन भी उपस्थित रहे।

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