elections story of former pm chandrashekhar | चंद्रशेखर यूपी की बलिया सीट से 1977 से 2004 के बीच 8 बार चुनाव जीते जब चंद्रशेखर ने बड़े बेटे पंकज शेखर के सामने रखी दो शर्ते छोटे बेटे नीरज अभी राज्यसभा सदस्य हैं
जब चंद्रशेखर ने बड़े बेटे पंकज शेखर के सामने रखी दो शर्ते राजनीति में अपने बेटे-बेटियों को आगे बढ़ाना आम है लेकिन कई नेता ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने जिंदगी भर वंशवाद से दूरी बनाए रखी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी वीपी सिंह सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री और थोड़े ही दिनों बाद ‘भूतपूर्व प्रधानमंत्री’ बन गए। चंद्रशेखर यूपी की बलिया सीट से 1977 से 2004 के बीच 8 बार जीते। वे सिर्फ 1984 में हारे। वे जनता पार्टी के अध्यक्ष से लेकर समाजवादी जनता पार्टी राष्ट्रीय के अध्यक्ष रहे मगर परिवार को राजनीति से दूर रखा।एक बार चंद्रशेखर के बड़े बेटे पंकज शेखर ने बिहार की महाराजगंज सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई तो उन्होंने उसके सामने दो शर्तें रखीं। 5 साल तक महाराजगंज के मतदाताओं की ऐसी सेवा करे कि उनकी ओर से उसे सांसद बनाने की मांग आए। लेकिन बेटे में इतना धैर्य नहीं था और उसने उनकी शर्तें नहीं मानीं। इससे चंद्रशेखर को वंशवाद के विरोध के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिली।चंद्रशेखर के निधन के बाद 2007 में बलिया में उप चुनाव में पंकज शेखर चुनाव लड़ना चाह रहे थे लेकिन परिवार के दबाव के बाद छोटे बेटे नीरज लड़े थे। पंकज 2013 में भाजपा में गए। उन्हें उम्मीद थी कि बीजेपी सलेमपुर से टिकट देगी लेकिन टिकट उन्हें नहीं मिला। वहीं, नीरज सपा के टिकट पर 2014 चुनाव हार गए। वे अभी राज्यसभा सदस्य हैं।.
जब चंद्रशेखर ने बड़े बेटे पंकज शेखर के सामने रखी दो शर्ते राजनीति में अपने बेटे-बेटियों को आगे बढ़ाना आम है लेकिन कई नेता ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने जिंदगी भर वंशवाद से दूरी बनाए रखी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद बनी वीपी सिंह सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री और थोड़े ही दिनों बाद ‘भूतपूर्व प्रधानमंत्री’ बन गए। चंद्रशेखर यूपी की बलिया सीट से 1977 से 2004 के बीच 8 बार जीते। वे सिर्फ 1984 में हारे। वे जनता पार्टी के अध्यक्ष से लेकर समाजवादी जनता पार्टी राष्ट्रीय के अध्यक्ष रहे मगर परिवार को राजनीति से दूर रखा।एक बार चंद्रशेखर के बड़े बेटे पंकज शेखर ने बिहार की महाराजगंज सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई तो उन्होंने उसके सामने दो शर्तें रखीं। 5 साल तक महाराजगंज के मतदाताओं की ऐसी सेवा करे कि उनकी ओर से उसे सांसद बनाने की मांग आए। लेकिन बेटे में इतना धैर्य नहीं था और उसने उनकी शर्तें नहीं मानीं। इससे चंद्रशेखर को वंशवाद के विरोध के एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद मिली।चंद्रशेखर के निधन के बाद 2007 में बलिया में उप चुनाव में पंकज शेखर चुनाव लड़ना चाह रहे थे लेकिन परिवार के दबाव के बाद छोटे बेटे नीरज लड़े थे। पंकज 2013 में भाजपा में गए। उन्हें उम्मीद थी कि बीजेपी सलेमपुर से टिकट देगी लेकिन टिकट उन्हें नहीं मिला। वहीं, नीरज सपा के टिकट पर 2014 चुनाव हार गए। वे अभी राज्यसभा सदस्य हैं।
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