बेंगलुरु हादसे में भगदड़ में हुई मौतों पर महाकुंभ भगदड़ में लोगों के मारे जाने का जिक्र करना तर्कसंगत नहीं कही जा सकती.
समझ में नहीं आ रहा है कि बेंगलुरु हादसे के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कुंभ का जिक्र क्यों किया. क्या वे ये याद दिलाना चाहते थे कि बीजेपी शासित राज्यों में भी हादसे होते रहे हैं? हद है, लोग मारे गए हैं, चाहे वे प्रयागराज में हों या कर्नाटक में.
समझ में नहीं आता कि सत्तर साल के परिपक्व होते लोकतंत्र में लोगों की जान की कीमत ‘इतनी कम’ क्यों मानी जाती है. एक व्यक्ति की मौत से उसके परिवार पर क्या बीतती है, यह समझना चाहिए. हो सकता है कि मरने वाला व्यक्ति अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला हो या कोई बच्चा या बच्ची हो जो परिवार की उम्मीद हो. यह देखा गया है कि जो दल सत्ता में नहीं होता, वह मारे गए लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता है, चाहे कहीं का भी हादसा हो. आखिर प्रशासन क्यों नहीं अनुमान लगा पाता कि किसी जगह इतनी बड़ी भीड़ जमा होने वाली है. इसके लिए कई स्तर की निगरानी की व्यवस्था होती है. नागरिक सुरक्षा के लिए प्रशासनिक अफसर जिम्मेदार होते हैं, मुख्यमंत्री सबसे ऊपरी स्तर पर आता है. जीत के जश्न में हुई भगदड़ में मौतों से बीसीसीआई और आरसीबी तो पहले ही इन मौतों से अपना पल्ला झाड़ चुका है. लेकिन मुख्यमंत्री तो पूरे प्रदेश की हर व्यवस्था से ऊपर होता है. आखिर उसे तो लोगों की सुरक्षा का जिम्मा लेना ही होगा. मुख्यमंत्री को सबसे जवाब तलब करना चाहिए. भीड़ का पहले से आंकलन करने में विफल रहने वालों के खिलाफ एक्शन लेना चाहिए. बेंगलुरु में जीत के जश्न में आखिरकार 11 लोग मारे गए हैं. उनकी संख्या बढ़ भी सकती है क्योंकि लोग अस्पतालों में भर्ती हैं. कहीं ऐसा तो नहीं हो रहा कि जिम्मेदार अफसर बस राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने में लगे हों. उनका मकसद सिर्फ इतना हो कि राजनीतिक नेतृत्व जब तक मेहरबान है, कुछ भी नहीं हो सकता. हाल के दौर में किसी बड़े से बड़े हादसे पर किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ. 80 के दशक तक मंत्रियों का इस्तीफा होता रहा. इससे अफसरशाही दबाव में रहती थी. उसे लगता था कि जब मंत्री ही हटा दिए गए तो उनकी भी नौकरी जा सकती है. मुकदमे होते थे. कानून में साफ है कि अगर किसी की लापरवाही से भी किसी की जान जाती है तो उस पर मुकदमा हो सकता है. जो लोग सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे, उनकी लापरवाही क्या लोगों की मौत का कारण नहीं है? हर बार यह कैसे कहा जा सकता है कि पहले से अनुमान नहीं लग सका कि इतनी बड़ी भीड़ जमा हो सकती है. पुराने लोग बताते हैं कि 1952 में कुंभ मेले में भगदड़ हुई थी तो उस समय के एसपी ने नौकरी छोड़ संन्यास ले लिया था. संन्यास न ले तो भी किसी की जिम्मेदारी बनती है. कोई आयोजन किसी जिम्मेदार संस्था की ओर से होता है तो उसकी परमिशन पूरे अमले से ली जाती है. परमिशन लेने की प्रक्रिया इसलिए है ताकि प्रशासन पूरी तैयारी कर सके. व्यवस्था न करने की पड़ताल की जगह मुख्यमंत्री का ये कहना कि महाकुंभ भगदड़ में इतने लोग मारे गए थे तो उन्होंने इसकी आलोचना नहीं की थी, हो सकता है कि कांग्रेस ने की हो. किसी भी तरह यह मुख्यमंत्री के पद के अनुरूप नहीं है. महाकुंभ में मारे गए लोगों के लिए भी प्रशासन जिम्मेदार था और बेंगलुरु में स्थिति न संभाल पाने के लिए भी वहां का प्रशासन जिम्मेदार है.
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