कास्ट कार्ड के बाद अब क्या होगा बसपा का फार्मूला?
कांशीराम ने 35 साल पहले सामाजिक परिवर्तन के लिए बसपा की नींव रखी थी. बसपा को अर्श से फर्श तक पहुंचाने के लिए कांशीराम ने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय का कास्ट फॉर्मूला बनाया था. इस फॉर्मूले के जरिए मायावती सूबे में चार बार मुख्यमंत्री तो बनी लेकिन 2007 में पूर्ण बहुमत से आने के बाद बसपा का जातीय समीकरण पूरी तरह से बिखरता चला गया है.
हालत यह है कि बसपा से गैर-जाटव दलित और अति पिछड़ी जातियां पूरी तरह से छिटककर बीजेपी और अन्य दलों से जुड़ गई. इन चुनौतियों के बीच मायावती ने अपनी राजनीतिक विरासत को अपने भाई आनंद कुमार और भतीजे आकाश आनंद को सौंप दी है. इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि आनंद-आकाश बसपा को एक बार फिर से उभार पाएंगे? रविवार को मायावती ने आनंद को बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आकाश को राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी सौंपी है. बसपा में परिवारवाद को तवज्जो देने लिए मायावती ने पार्टी के संविधान को भी बदल दिया है. जबकि इससे पहले था कि बसपा का जो भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाएगा, उसके जीते-जी और उसके न रहने के बाद भी उसके परिवार के किसी भी नजदीकी सदस्य को पार्टी संगठन में किसी भी स्तर के पद पर नहीं रखा जाएगा. बता दें कि साल 2012, 2014, 2017 में हार, और 2019 में बसपा को भी अपेक्षित सफलता न मिलने के बीच पार्टी का समीकरण का बिखर जाना मुख्य वजह रही है. कांशीराम ने बसपा के राजनीतिक आधार को बढ़ाने के लिए जिन जातियों को जोड़ा था वह अब पार्टी के साथ नहीं रह गए हैं. इतना ही नहीं कांशीराम के साथी भी एक-एक कर पार्टी से छोड़ गए या फिर उन्हें मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया. उत्तर प्रदेश में केंद्र की आरक्षण सूची में ओबीसी की 76 जातियां मौजूद हैं, जिनमें से एक अहिर/यादव जाति के नेता अखिलेश यादव हैं. वहीं राज्य की अनुसूचित जाति की सूची में कुल 66 जातियां हैं, जिसमें चमार, धूसिया, झूसिया, जाटव दर्ज है. इसी में से जाटव जाति की मायावती हैं. इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा को 19.36 फीसदी वोट मिले हैं. जबकि सूबे में करीब 22 फीसदी दलित मतदाता हैं. ऐसे में बसपा को मिले वोट में सिर्फ दलित मतदाता ही नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय समेत कई अन्य समुदाय के लोगों ने भी वोट किया है. बसपा की राजनीति को करीब देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि मायावती ने बसपा को एक कंपनी की तरह से इस्तेमाल करते हुए अपने भाई और भतीजे को नियुक्त किया है. 2007 के बाद से मायावती जिन चुनौतियों का सामना नहीं कर सकी हैं, उससे आनंद और आकाश कैसे लड़ पाएंगे. जबकि मायावती तो कांशीराम के साथ संघर्ष किया, लेकिन आनंद-आकाश न तो संघर्ष किया और न ही दलितों के दर्द को महसूस किया है. कासिम कहते हैं कि बहुजन समाज को मायावती ने अपने परिवार और अपनी जाति तक सीमित कर दिया है. जबकि एक दौर में पंजाब से लेकर हरियाणा तक बसपा से सांसद जीतते रहे हैं तो इसके पीछे कांशीराम का जातीय समीकरण था, जिसमें दलित समुदाय के साथ-साथ अतिपिछड़ा की अहम भूमिका रही है. मायावती इसे संभाल नहीं सकी है और बसपा को सिर्फ एक जातीय विशेष की पार्टी बनाकर रख दिया है. इसी का नतीजा है कि पार्टी तीन मंडलों तक सीमित होकर रह गई है. बसपा के संस्थापक सदस्य रहे और कांशीराम के साथी दद्दू प्रसाद कहते हैं कि मायावती ने कांशीराम के अरमानों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है और बहुजन समाज की राजनीति को खत्म करने का काम किया है. मायावती ने बसपा को अपनी निजी प्रॉपर्टी बनाकर रख दिया है, आनंद और आकाश को उसी के तहत नियुक्त किया गया है. जबकि मायावती ने पार्टी में जो वैचारिक और बहुजन हित के लिए लड़ने वाले थे, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया ताकि पार्टी को मनमाने तरीके से चलाया जा सके. दददू प्रसाद ने कहा कि जाटव और चमार बसपा के बेस थे, लेकिन कामयाबी के पीछे अतिपिछड़ी जातियों की अहम भूमिका रही है. ओबीसी समुदाय की कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, प्रजापित, पाल समेत तमाम जातियों को और दलितों में चमार और जाटव के साथ-साथ पासी, धोबी, कोरी समेत जातियों को जोड़ने का काम किया था. लेकिन मायावती इन्हें सहेजकर नहीं रख सकी और बीजेपी इन्हें अपने साथ जोड़कर आज सत्ता पर विराजमान है. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि तीन दशक पहले सोशल जस्टिस के नाम पर बसपा समेत कई दल बने थे, लेकिन मौजूदा समय में इन दलों ने सोशल जस्टिस में से सोशल शब्द को निकाल दिला है और उसे 'फैमली जस्टिस' बनाकर रख दिया है. यही हाल सपा और आरजेडी में भी है, जहां एक राजनेता अपने परिवार से ही लोगों नियुक्त करता है. बसपा में आनंद और आकाश की नियुक्त दुर्भाग्य पूर्ण है. उर्मिलेश कहते हैं कि कांशीराम में बसपा को स्थापित करने के लिए जिस फॉर्मूले का प्रयोग किया था और समाज से तमाम दलित, पिछड़ी और शोषित तबके को अपने साथ जोड़ा था. इतना ही नहीं 1989 में बसपा जब दो सीटें जीती थी, जिसमें एक मायावती और दूसरे रामकृष्ण यादव थे. इससे साफ जाहिर है कि शुरूआती दौर में बसपा के साथ यादव समुदाय भी जुड़ा हुआ था. लेकिन मायावती ने पिछड़ी जातियों से नेतृत्व देने में पूरी तरह से फेल रही, जिसके चलते यह तबका पूरी तरह से छिटक गया. बसपा ही नहीं बल्कि तमाम वह दल जो सामाजिक न्याय के नाम पर बने थे उनके सामने इन्हें वापस लाने की बड़ी चुनौती है. बता दें कि 1991 में देश की राजनीतिक परिस्थिति एक नए दौर में प्रवेश कर रही थी. मण्डल आयोग की सिफारिशों का लागू होना, राम मन्दिर आन्दोलन और नई आर्थिक नीति के नए दौर में कांशीराम ने एक परिवक्व राजनीतिक नेता के तौर पर खुद को प्रस्तुत किया था. 1992 में वे मुलायम सिंह यादव के सहयोग से इटावा से लोकसभा के लिए चुने गए. इसी के बाद दलित-पिछड़ा गठजोड़ का बीज था जिसका प्रभाव भविष्य की भारतीय राजनीति पर पड़ना था. 1993 में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का ऐतिहासिक गठजोड़ हुआ जिसने उत्तर भारत की सामाजिक-राजनीतिक तस्वीर बदल दी. 1993 में यूपी में विधानसभा चुनाव में कांशीराम ने मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश कर चुनाव लड़ा तथा सपा-बसपा गठजोड़ ने 176 सीट जीत कर सरकार बना लिया. हालांकि यह सरकार लंबा सफर तय नहीं कर सकी और 2 जून 1995 में यह गठबंधन टूट गया. 24 साल बाद मायावती ने इसी फॉर्मूले पर गठबंधन किया और बसपा जीरो से 10 सीटें जीतने में कामयाब रही, लेकिन एक बार फिर यह गठबंधन टूट गया.
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